भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५७० रसतरङ्गिणी तस्य निर्माणप्रकारो द्विभागिकमिति । सूर्यलोहं ताम्रम् ॥ २-४ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ ताम्र दो भाग और शुद्ध यशद एक भाग लेकर दोनों को एकत्र गारमूषा में रखकर मूषा को कोष्ठी में रखकर तेज अग्नि से तपायें। जब धमन करते हुए दोनों ही पिघलकर एक हो जायें तो इसे ढाल देवें। इस रीति से बनाये हुए पीतल धातु को भस्म करके रसों में काम लाना चाहिए ॥ २-४ ॥ ग्राह्यपित्तलस्य स्वरूपम् प्रखरानलसंतप्तं काञ्जिके परिषेचितम् । ताम्रप्रभं भवेद्यत्तु जात्यं तत्पित्तलं मतम् ॥ ५ ॥ मारणीयस्य ग्राह्यपित्तलस्वरूपं प्रखरानलसन्तप्तमित्यादि सुगमम् ॥ उक्तं हि—"मन्तप्ता काञ्जिके क्षिप्ता ताम्रा स्याद्राजरीतिका । काकतुण्डी तु कृष्णा स्यान्नासौ सेव्या विजानता" इति ॥ ५ ॥ भा.टी.—पित्तल को अति तीव्र कोयलों की अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझाने से यदि वह ताम्र सदृश दिखाई देता हो तो उसे जात्य (उत्तम) पित्तल समझना चाहिए ॥ ५ ॥ हेयपित्तलस्य स्वरूपम् तप्तं यत्पित्तलं वह्नौ निषिक्तं गृहवारिणि । लौहप्रभं भवेत्कामं तद्धेयमिह कीर्तितम् ॥ ६ ॥ भा.टी.—जिस पीतल को अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझा देने पर काले लोहे के सदृश हो जाय तो अग्राह्य पीतल समझना चाहिए ॥ ६ ॥ पित्तलशोधनस्य प्रथमः प्रकारः प्रतनूनि च पत्राणि पैत्तलानि समाहरेत् । स्थाल्यां वङ्गप्रलिप्तायां न्यस्य गोमूत्रसंयुतम् ॥ ७ ॥ प्रखरानलयोगेन पचेद्यामचतुष्टयम् । पित्तलं पक्वमेवन्तु शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ८ ॥ पित्तलशोधनं ताम्रवद् गोमूत्रे पाचनात् । अथवा हरिद्राचूर्णयुते निर्गुण्डी- कषाये निर्वापणात् ॥ ७-८ ॥ भा.टी.—पीतल के बहुत बारीक-बारीक पत्र बना लें। अब इनको रांगे की कलई किये हुए एक पात्र में डालकर उसमें गोमूत्र भी डाल दें। पात्र को चूल्हे पर चढ़ाकर चार पहर तक तेज अग्नि से पकावैं तो इस प्रकार पीतल उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ ७-८ ॥