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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

द्वाविंशस्तरङ्गः ५७१ द्वितीयः शोधनप्रकारः तनुपत्रीकृतं तप्तं रजनीरजसा युते । क्षिप्तं निर्गुण्डिकातोये पित्तलं शुद्धिमाप्नुयात् ॥६॥ . भा.टी.—पीतल के पतले-पतले पत्र बनाकर अग्नि में गरम करे, जब अच्छी तरह लाल वर्ण के हो जायें तो उन्हें निर्गुण्डीस्वरस में हल्दी का चूर्ण डाल उसमें बुझा दें । इस प्रकार सात बार करने से पित्तल शुद्ध हो जाता है ॥६॥ अथ पित्तलमारणस्य प्रथमः प्रकारः सूक्ष्मपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं तुल्यगन्धान्वितं खल्वयन्त्रे न्यसेत् । पेषयेद्भास्करक्षीरसंयोजितं शोषितञ्चातपे सम्पुटे विन्यसेत् ॥१०॥ लेपिते मृत्स्नया पङ्कपिण्डाभया त्वग्निवारं पुटेद्वारणाख्ये पुटे । मारितं पित्तलं त्वत्र रीत्यानया जायते सुन्दरं कज्जलाभं परम् ॥११॥ मारणप्रकारः सूक्ष्मेति । भास्करक्षीरं अर्कदुग्धम् । अग्निवारं त्रिवारम् । पङ्कपिण्डाभयेति घनपंकेनेति यावत् । वारणाख्ये गजपुटे ॥ १०, ११ ॥ भा.टी.—शुद्ध पीतल को रेती से रेत कर चूर्ण बना लें । इसको खरल में डालकर उसमें पीतल समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर उसको आक के दूध के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसे एक सम्पुट में बन्द कर दें और इसको गाढ़े-गाढ़े मिट्टी के कीचड़ से लेप करके सुखा लें । सूखने के बाद इस सम्पुट को गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार गन्धक के साथ तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ १०, ११ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः तनुपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं पलपञ्चकम् । समहिङ्गुलतालाभ्यां मर्दितं कन्यकाम्भसा ॥१२॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् । त्रिधैवं पुटितं यत्नात् पित्तलं याति पञ्चताम् ॥१३॥ कज्जलाभं भवेद्भस्म रमणीयतरं शुभम् । इत्थं मृतं पित्तलं तु भवेद्-भ्रान्त्यादिवर्जितम् ॥१४॥ भा.टी—शुद्ध पीतल का चूर्ण पाँच पल लेकर खरल में डालें और इसमें पाँच पल शुद्ध हिंगुल और पाँच पल शुद्ध हरताल भी डाल दें । फिर इसको घीकुंआर के रस से खूब मर्दन करके सुखा लें । इस सूखे हुए चूर्ण को एक

५७२ रसतरङ्गिणी सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँके देवें। इस प्रकार तीन बार गजपुट में फूँकने से पीतल की सुन्दर काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो जाती है। इस भस्म में वान्ति भ्रान्ति आदि ताम्र के आठ दोष नहीं रहते हैं ॥१२-१४॥ तृतीयो मारणप्रकारः पत्रीकृतं पित्तलं तु समगन्धशिलान्वितम्। कन्यानीरेण सम्पिष्टं शोषितं सम्पुटे न्यसेत् ॥१५॥ त्रिवारं पुटयेदेवं भस्म स्यात्कज्जलप्रभम्। एवं मृतं पित्तलं तु वीनशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१६॥ तृतीये प्रकारे—समगन्धशिलान्वितमिति गन्धके शिलया च पृथक् सम- भागेन योजितम् ॥ १५, १६ ॥ भा.टी.—शुद्ध पीतल चूर्ण के समभाग शुद्ध गन्धक और शुद्ध मैनसिल मिलाकर घीकुआर के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस सूखे हुए चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस प्रकार गन्धक और मैनसिल के साथ तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काली भस्म हो जाती है ॥ १५-१६ ॥ मृतपित्तलस्य गुणाः सुमृतं पित्तलं रूक्षं तिक्तं नातिविलेखनम्। कृमिघ्नं कुष्ठशमनं पाण्ड्वामयविनाशनम् ॥१७॥ पित्तलं सम्यङ्ग्मृतं रूक्षादिगुणम्। प्रयोगस्ताम्रवत्। मात्रा तु यशदयोगात् गुञ्जापर्यन्तमपि इति विशेषः ॥ १७ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से बनी हुई पीतल की भस्म रूक्षगुण, तिक्तरस और कुछ लेखन कर्म करनेवाली है। इसके सेवन से उदरकृमि, कुष्ठ रोग तथा पाण्डुरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥ पित्तलस्य प्रयोगमात्रानिरूपणम् पित्तलस्य योगस्तु रविलोहसमो मतः। गुञ्जार्धतस्तु गुञ्जैकमिता मात्रा च युज्यते ॥१८॥ भा.टी.—पीतल की भस्म की प्रयोगविधि ताम्रभस्म के समान ही सम- झनी चाहिये। और इसकी मात्रा आधी रत्ती से लेकर एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ १८ ॥

द्वाबिंशस्तरङ्गः ५७३ पित्तलरसायनम् पित्तलं कान्तकं व्योमसत्त्वं मृतं कीटविद्वेषणं त्र्यूषणं तुल्यकम् । होमधान्याजमोदाग्निभल्लातकब्रह्मबीजोद्भवत्क्षोदसंयोजितम् ॥१६॥ रक्तिकाद्धोन्मितं मासमासेवितं नाशयेद् दारुणां श्वेतकुष्ठव्यथाम् । बह्निसन्दीपनं त्वामसम्पाचनं शूलनिर्मूलनं कीटकोत्सादनम् ॥२०॥ अथ पित्तलरसायनम्—व्योमसत्त्वमभ्रसत्त्वम्, कीटविद्वेषणं विडङ्गम्, होम- धान्यं तिलाः, अग्निः चित्रकः, ब्रह्मबीजम् पलाशबीजम् ॥ १६-२० ॥ भा.टी.-पित्तलभस्म, कान्तलौहभस्म, अभ्रकसत्वभस्म, विडङ्ग, सोंठ, पीपर, मरिच, तिल, अजमोदा, चित्रक, शुद्ध भेलावा और पलास का बीज, ये सब समान भाग लेकर आधी रत्ती की मात्रा से मास पर्यन्त खाने से भयंकर श्वेतकुष्ठ दूर होता है और अग्निवृद्धि, आमदोष का पाचन, शूल का नाश तथा कीटों का नाश करता है ॥ १६, २० ॥ अथ कांस्यस्य नामानि कंसोयं कांस्यक कास्यं घोषपुष्पञ्च घोषकम् । घोषो घोषं वह्निलोहं तदेव परिकीर्तितम् ॥ २१ ॥ भा.टी.-कंसीय, कांस्यक, कांस्य, घोषपुष्प, घोषक, वह्निलोह, घोष, ये सब नाम काँसे के कहे जाते हैं ॥ २१ ॥ कांस्यस्य निर्माणप्रकारः रविलोहं वेदभागमितं विधिविशोधितम् । आगिकं विमलं वङ्गं गाढं मूषागतं धमेत् ॥ २२ ॥ विद्रुतं जायते रम्यं वरघोषं तु कांस्यकम् । एवं विनिर्मितं कांस्यं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ भा.टी.-अच्छी तरह शुद्ध ताम्र चार भाग और शुद्ध वंग एक भाग लेकर दोनों को एक मूषा में रखकर तीव्र गति से तपायें। जब दोनों पिघलकर एक हो जायँ तो इसको ढाल लें। इस प्रकार करने से सुन्दर उत्तम काँसा बन जाता है। इसी काँसे को भस्म करने के काम में लाना चाहिए ॥२२, २३॥ ग्राह्यकांस्यस्य स्वरूपम् सुनादं भास्वरं स्निग्धं श्वेतं मृदु च निर्मलम् । घनाग्निसहमत्यन्तं कांस्यं ग्राह्यमिहोच्यते ॥ २४ ॥ ग्राह्यकांस्यं सुनादमिति। उक्तं हि-"श्वेतं दीप्तं मृदु ज्योतिः शब्दाढ्यं स्निग्धनिर्मलम् । घनाग्निसहसूत्राङ्गं कांस्यमुत्तममीरितम् ॥” इति ॥ २४ ॥

५७४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—जो काँसा बजाने पर अच्छा शब्द करता हो, चमकीला, स्निग्ध (चिकना स्पर्श), श्वेतवर्ण, कोमल, स्वच्छ हो और तीव्र अग्नि तथा हथौड़े की चोट को सहन करनेवाला हो उसे औषधि कार्य में ग्रहण करना चाहिए ॥२४॥ हेयकांस्यस्य स्वरूपम् निरुज्ज्वलं खरं रूक्षं पीतं दहनतापितम् । आताम्रं मन्दनादञ्च कांस्यं हेयमुदीरितम् ॥ २५ ॥ भा.टी.—मैला (देखने में), खुरदरा, रूक्ष, पीतवर्ण, आग में तपाने पर ताँबे के सदृश हो जानेवाला, मन्द आवाज का काँसा औषधि कर्म में ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥ कांस्यशोधनस्य प्रथमः प्रकारः तनुपत्रीकृतं कांस्यं वह्निसन्तापितं भृशम् । निर्वापितं गव्यमूत्रे सप्तधा शुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ भा.टी.—काँसे के पतले-पतले पत्र बनाकर उनको अग्नि में तपायें, जब लाल वर्ण के हो जायँ तो गोमूत्र में बुझा दें। इस प्रकार सात बार गोमूत्र में बुझाने से काँसे की शुद्धि हो जाती है ॥ २६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सूक्ष्मपत्रीकृतं घोषपुष्पाह्वयं मूत्रपट्वन्वितं स्थालिकायां न्यसेत् । यामसम्पाचितं तीक्ष्णतीक्ष्णाग्निना सर्वदोषोज्झितं जायते सत्वरम् ॥ भा.टी.—उत्तम काँसे को रेती से रेत कर सूक्ष्म चूर्ण बना लें। अब इस चूर्ण को एक हाँडी में डालकर उसमें गोमूत्र और सेन्धानमक भी डाल दें। इस हाँडी को चूल्हे पर रखकर एक पहर तक अग्नि से पकायें तो काँसा शीघ्र ही सर्व दोषरहित हो जाता है ॥२७॥ कांस्यमारणस्य प्रथमः प्रकारः तनुपत्रीकृतं कांस्यं समगन्धसमन्वितम् । अर्कक्षीरेण सम्पेष्य शोषयेदातपे दृढम् ॥२८॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् । एवं पुटत्रयात्कांस्यभस्म स्यात्सुमनोहरम् ॥ २९ ॥ भा.टी.—शुद्ध काँसे के अति सूक्ष्म पत्र बनाकर उसमें समभाग शुद्ध गंधक मिला आक के दूध के साथ अच्छी तरह घोंटकर धूप में सुखा लें। अब इसको सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस प्रकार गन्धक के साथ के तीन गजपुट देने से काँसे की सुन्दर भस्म हो जाती है ॥ २८, २९ ॥

द्वाविंशस्तरङ्गः ५७५ द्वितीयो मारणप्रकारः तुल्यरक्तान्वितं निम्बूकस्याम्भसा सूक्ष्मपत्रीकृतं कांस्यकं पेषयेत् । शोषितं त्रिपुटैत् सम्पुटस्थं ततो घोषपुष्पं तदा पञ्चतां यात्यलम् ॥३०॥ भा.टी.—शुद्ध कांसे का चूर्ण और शुद्ध हिंगुल को समभाग में लेकर खरल में नींबू के रस से अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसको एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार तीन गजपुट देने से कांसे की भस्म हो जाती है ॥ ३० ॥ तृतीयो मारणप्रकारः कांस्यं तुल्यं शिलागन्धयुतं कन्याम्बुपेषितम् । पुटेत् त्रिधैवं यत्नेन भस्म स्यात् कज्जलप्रभम् ॥ ३१ ॥ भा.टी.—उत्तम शुद्ध काँसे के सूक्ष्म पत्र अथवा चूर्ण में समभाग शुद्ध मैनसिल और शुद्ध गन्धक मिला घीकुआर के रस से अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । अब इसको सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार मैनसिल तथा गन्धक के साथ तीन गजपुट देने से काँसे की काजल के सदृश काले रंग की भस्म हो जाती है ॥ ३१ ॥ मृतकांस्यस्य गुणाः घोषपुष्पं तु तुवरं तिक्तोष्णं लेखने हितम् । नेत्रप्रसादनं रूक्षं सरं च विशदं परम् ॥३२॥ क्रिमिघ्नं कुष्ठशमनं कफपित्तप्रणाशनम् । वातघ्नं दीपनञ्चैव परमेतत्प्रकीर्तितम् ॥३३॥ कांस्यं तुवरादिगुणम् । प्रयोगादयश्चास्य ताम्रवदेवेति । अपि च—"घृतवर्जं बुधैः सर्वं पाच्यं कांस्यस्य पात्रके । भोजनन्तु प्रशस्तं स्याद् रीतिका मध्यमा स्मृता ॥" इत्यप्याहुः प्राज्ञाः ॥ ३२, ३३ ॥ भा.टी.—कांसे की भस्म तुवर (कषाय) और तिक्तरस, उष्ण और लेखन गुण युक्त होती है । इसके प्रयोग से नेत्र स्वच्छ होते हैं । यह रूक्ष, सर और विशद गुणयुक्त होती है । इसके सेवन से उदरक्रिमि और कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । यह कफ, पित्त तथा वातनाशक और उत्तम दीपक होती है ॥३२, ३३॥ मृतकांस्यस्य प्रयोगादयः कांस्यकस्य प्रयोगस्तु रविलोहसमो मतः । गुञ्जार्द्धतश्च गुञ्जैकमिता मात्रा प्रयुज्यते ॥३४॥

५७६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—काँसे की भस्म का प्रयोग ताम्रभस्म के समान ही समझना चाहिये। इसकी भस्म आधी रत्ती से लेकर आवश्यकतानुसार एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ ३४ ॥ अथ अञ्जनस्य नामानि अञ्जनस्य द्वौ भेदौ अञ्जनं तु समाख्यातं सेचकं लोचकं तथा। अञ्जनं द्विविधं ज्ञेयं स्रोतोऽञ्जञ्च सुवीरजम् ॥ ३५ ॥ भा.टी.—अञ्जन को मेचक तथा लोचक नाम से कहा जाता है। अञ्जन के दो भेद माने गये हैं। १–स्रोतोञ्जन, २ सौवीराञ्जन ॥ ३५ ॥ वक्तव्य—उक्त दो अञ्जनों में स्रोतोञ्जन (काला सुरमा) नागधातु का मूल खनिज है। इसमें गन्धक का योग होता है और स्वभावतः प्राप्त होने- वाला खनिज द्रव्य है। अफगानिस्तान, फारस तथा ईरान की बड़ी-बड़ी पर्वत- मालाओं में इसकी खानें पायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त झेलम नदी के निकट कटासराज के पास अनेक पर्वतमय प्रदेशों में भी इसकी खानें पायी जाती हैं। यह काले चमकीले स्फटिकों के रूप में प्राप्त होता है और रासायनिक दृष्टि से सीसकगन्धिद् (Lead sulphite) माना जाता है। इसको “गैलीना” (Galena) कहते हैं और आधुनिक वैज्ञानिक इसको “अन्टीमनी सल्फाइड” (Antimony sulphide) कहते हैं। सौवीराञ्जन—यह स्रोतोञ्जन का ही एक भेद है। यह भी सुवीरा नदी के किनारे पाये जाने के कारण सौवीराञ्जन नाम से कहा जाता है। यह स्रोतोञ्जन की अपेक्षा गंधक आदि की न्यूनाधिकता के कारण कृष्ण वर्ण के स्थान पर धूम्रवर्ण या पाण्डुवर्ण का होता है—“स्रोतोञ्ज- नसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पांडुरम्”। यह सुरमा वैली आसाम से अधिक रूप में आता है। आधुनिक वैज्ञानिक इसको “स्टिबनाइटिस” (Stybnitis) मानते हैं। तत्र स्रोतोऽञ्जनस्य नामानि स्रोतोऽञ्जनं तु स्रोतोऽजं यामुनेयञ्च यामुनम् । नीलांजनं तद्देवोक्तं कपोतांजनकाह्वयम् ॥३६॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, स्रोतोऽज, यामुनेय, यामुन, नीलाञ्जन और कपोताञ्जनः ये सब नाम नीले सुरमे के माने जाते हैं ॥ ३६ ॥

३७ द्वाविंशस्तरङ्गः ५७७ सौवीराञ्जनस्य नामानि सौवीराञ्जनकं ख्यातं सौवीरं तु सुवीरजम् । कृष्णाञ्जनं तथा कालाञ्जनञ्चापि प्रकीर्तितम् ॥ ३७ ॥ भा.टी.—सौवीराञ्जन को सौवीर, सुवीरज, कृष्णांजन तथा कालांजन नाम से ग्रहण किया जाता है ॥ ३७ ॥ स्रोतोऽञ्जनस्य स्वरूपम् भंगे नीलोत्पलनिभं घर्षणे गैरिकप्रभम् । वल्मीकशर्षप्रतिमं मतं स्रोतोऽञ्जनं बुधैः ॥३८॥ तत्र स्रोतोऽञ्जनस्वरूपं भंगे नीलोत्पलनिभमिति । सौवीरंजनस्वरूपं बाह्यतः खलु धूमाभमिति । सुवीरदेशजातत्वात् सौवीरनाम्ना प्रसिद्धम् । सौवीरदेशश्च वितस्ता-( झेलम ) नदीनिकटवर्तिकटासराज्यसमीपे पर्वतमालामयो देशस्तत्र हि खनिः सौवीराञ्जनस्येति । यत्तु कैश्चित् श्वेतः सकोणः स्फटिकाकृतिः पाषाणः सौवीराञ्जननाम्ना ( श्वेत सुरमा ) व्यवह्रियते, तत्तु पाषाणविशेष एव. तन्त्रेषु कृष्णत्वस्यैवाञ्जने वर्णितत्वात् विचार्यमेवेति ॥ ३८ ॥ भा.टा.—जो सुरमा तोड़ने पर भीतर से नीलकमल वर्ण का, घिसने पर गेरू के सदृश, बेडौल खण्डोंवाला होता है उसे स्रोतोञ्जन कहते हैं ॥ ३८ ॥ सौवीराञ्जनस्य स्वरूपम् बाह्यतः खलु धूमाभं भंगे त्वतिसमुज्ज्वलम् । घर्षे खलु मषीवर्णं सौवीराञ्जनमुच्यते ॥ ३६ ॥ भा.टी.—काला सुरमा बाहर से देखने में कुछ धूम्र वर्ण का और तोड़ने पर भोतर अत्यन्त चमकीला, लिखने पर काला रंग देनेवाला होता है ॥३६॥ स्रोतोऽञ्जनसौवीराञ्जनयोः शोधनम् अञ्जनद्वितयं यत्नात् पेषितं त्रिफलाम्भसा । दिनसप्तकमात्रेण विशुध्यति न संशयः ॥ ४० ॥ भा.टां.—उक्त दोनों प्रकार के अञ्जनों को यदि शुद्ध करना हो तो उन्हें अलग-अलग खरल में डालकर त्रिफलाक्वाथ के साथ सात दिन तक खूब रगड़कर सुखा के रख लें । इस विधि से निःसन्देह अञ्जन शुद्ध हो जाते हैं॥४०। द्वितीयः शोधनप्रकारः भृङ्गराजरसेनेह पेषितं त्वञ्जनद्वयम् । दिनसप्तकमात्रेण शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४१ ॥

५७ रसतरङ्गिणी उभयोः शोधनप्रकारः सुगम एव । अपिच अञ्जनात् पञ्चामांशं ताम्रचूर्णं दत्वा भस्त्राध्मातं गालयेत् । शीते सति मुद्गरघातं कुट्टयेत् । तथा हि अञ्जन- तस्ताम्रयोगसंपत्त्या नागो विश्लिष्य पृथग्भवति ॥ ४१ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों ही अञ्जनों को पृथक्-पृथक् खरल में डालकर भांगरे के स्वरस के साथ सात दिन मर्दनकर सुखा लेने से भी ये शुद्ध हो जाते हैं॥४१॥ तृतीयः शोधनप्रकारः फलत्रिकनिशायुग्मभृङ्गराजरसे भृशम् । अञ्जनद्वितयं स्विन्नं यामाच्छुद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४२ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों अञ्जनों की वस्त्र में पृथक्-पृथक् पोटली बनाकर इनको दोलायंत्र विधि से त्रिफला, हरिद्रा तथा भांगरे के स्वरस में छः घण्टे स्वेदन करने से भी ये शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ स्रोतोऽञ्जनस्य गुणाः स्रोतोऽञ्जनं तु शिशिरं तुवरं लेखनं परम् । स्निग्धं स्वादु परं ग्राहि कफपित्तविषापहम् ॥ ४३ ॥ रक्तपित्तक्षयहरं नेत्रामयनिषूदनम् । हिक्काच्छर्दिप्रशमनं स्तन्यवृद्धिकरं परम् ॥ ४४ ॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन (नीला सुरमा) शिशिर (शीतगुणवीर्य), तुवर (कषायरस), उत्तम लेखन (नेत्रगत मल को पतला करके निकालनेवाला), स्निग्ध, स्वादु (मधुर), ग्राही तथा कफपित्त तथा विष-प्रभाव-नाशक होता है । इसके सेवन से रक्तपित्त तथा क्षय रोग नष्ट होते हैं । नेत्र रोगों को नष्ट करता है । स्रोतोञ्जन हिक्का, छर्दि (वमन) को शान्त करता है और स्त्री के स्तनों में दूध की वृद्धि करता है ॥ ४३, ४४ ॥ सौवीराञ्जनस्य गुणाः सौवीरमञ्जनं ग्राहि स्निग्धञ्च तुहिनोपमम् । रक्तपित्तप्रशमनं नेत्रामयहरं परम् ॥ ४५ ॥ विषहिक्कापहं कामं व्रणशोधनरोपणम् । परं रजोदोधकरं रक्तप्रदरनाशनम् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—सौवीराञ्जन ग्राही, स्निग्ध और बर्फ के समान शीतगुण होता है । इसके सेवन से रक्तपित्त शान्त हो जाता है, नेत्र रोग मिट जाते हैं । यह बाह्याभ्यन्तर शरीरगत विष तथा हिक्का को नष्ट करता है और व्रणों को शुद्ध

द्वाविंशस्तरङ्गः ५७६ तथा रोपण करता है, इसके सेवन से मासिक धर्म रुक जाता है और रक्तप्रदर में होनेवाला रक्तस्राव भी बन्द हो जाता है ॥ ४५, ४६ ॥ आभ्यन्तरप्रयोगे स्रोतस्सौवीराञ्जनयोर्मात्रा गुञ्जार्धतः समारभ्य गुञ्जैकमितमञ्जनम् । दिनद्वयं त्रयं वापि प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥४७॥ अञ्जनद्वितयं रक्तप्रदरे तु दिनत्रयात् । अधिकं नोपयुञ्जीत रसतन्त्रविशारदः ॥४८॥ अधिकं नोपयुञ्जीतेति अधिकोऽनयोः प्रयोगो वन्ध्यात्वव्यापत्कर इत्यवधेयम् । अञ्जनं ह्यवयवेषु सञ्चितं भवति नैरन्तर्येणोपयुक्तं नानांशसाहचर्याच्चामृतनागजां- श्चोपद्रवान् सञ्जनयति ॥ ४७, ४८ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों प्रकार के अञ्जनों में से यदि किसी का आभ्यन्तर प्रयोग करना हो तो आधी रत्ती से लेकर एक रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं । इन दोनों को यदि रक्तप्रदर के रक्तस्राव को बन्द करने के लिए देना हो तो तीन दिन से अधिक दिन तक इसका सेवन नहीं करना चाहिए ॥४७, ४८॥ वक्तव्य—यह पहिले बताया गया था कि अञ्जन नागधातु का मूल खनिज है । अतः इसमें सीसक का होना स्वाभाविक है । इस सीसक के कारण ही यह ग्राही प्रभाव रखता है । यदि इसको कुछ काल तक निरन्तर सेवन कराया जाय तो अञ्जनगत नाग शरीर में विशेषतः आँतों में सञ्चित हो जाता है, जिससे कालान्तर में अशुद्ध और अमृत नाग के उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं और स्त्री को प्रदर शान्ति के लिए अधिक दिन तक सेवन कराने से गर्भाशय संकोच और डिम्बग्रन्थि संकोच होने से उनमें गर्भधारण और उत्पादन की शक्ति नहीं रहती है । कथंचित् गर्भाशयप्राप्त शुक्र को और जीवाणु को भी यह गर्भाशय में जीवित नहीं रहने देता है, क्योंकि यह गर्भाशय में संचित होता है । अथ पुष्पाञ्जनस्य परिचयः रीतिकाद्रावणविधौ रीतिस्थं यशदं द्रुतम् । समेत्यम्बरपीयूषयोगेन सितचूर्णिताम् ॥४९॥ तदेव सितचूर्णन्तु पुष्पाञ्जनमुदीरितम् । भस्त्राध्मातं पुष्पितं तु यशदं वा तदाह्वयम् ॥५०॥ पुष्पाञ्जनपरिचयो गुणाश्च निगदव्याख्याताः, अग्नियोगात् पुष्पितस्य यश- दस्य पुष्पाञ्जनं नामेति । रीतिका पित्तलम् ॥ ४६, ५० ॥

५८० रस्तरङ्गिणी भा.टी.—पीतल धातु को पिघलाने पर जब पीतल में होनेवाला यशद ( जस्ता ) पिघल कर ओषजन से मिलकर श्वेत चूर्ण काला रूप धारण कर लेता है तो इसी यशद के श्वेत चूर्ण को पुष्पांजन कहा जाता है । अथवा केवल यशद को एक लोहपात्र अथवा मिट्टी के पात्र में रखकर तेज अग्नि से तपाने पर भी यह यशदपुष्प बन जाता है ॥ ४६, ५० ॥ वक्तव्य—उक्त विधि से प्राप्त यशदपुष्प केवल अञ्जनप्रयोग में विशेषरूप से व्यवहार में आने के कारण पुष्पांजन कहा जाता है । वास्तव में यह (.Zinc Oxide ) होता है । अञ्जन के अतिरिक्त यह बाह्य प्रयोग में काम आता है । पुष्पाञ्जनस्य गुणाः पुष्पाञ्जनं तु शिशिरं स्निग्धं पित्तव्रणाशनम् । अभिष्यन्दप्रशमनं परं दाहविनाशनम् ॥५१॥ विचर्चिकादित्वग्दोषशमनं व्रणरोपणम् । समाख्यातं विशेषेण हिक्कापञ्चकनाशनम् ॥५२॥ भा.टी.—पुष्पांजन—शिशिर, स्निग्ध और पित्तप्रकोपनाशक है । इसके बाह्य प्रयोग से अभिष्यन्द (नेत्ररोग ) तथा नेत्रपलकों की दाह शान्त हो जाती है । विचर्चिका आदि त्वक्रोगों में इसके योग लगाये जाते हैं। व्रणों को भरने के लिए इसके व्रणरोपक लेप लगाये जाते हैं। इसको प्राचीन पुस्तकों में विशेषरूप से हिक्कानाशक गुणवाला लिखा है ॥ ५१, ५२ ॥ अञ्जनत्रितयस्य बाह्यप्रयोगः अञ्जनद्वितयं पुष्पाञ्जनेन सहितं तु वा । यशदेनाग्निदग्धेन ह्यभिष्यन्दहरं परम् ॥५३॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, सौवीराञ्जन के साथ यदि यशद को अग्नि पर रख कर बनाये हुए उसके फूले ( पुष्पांजन ) के साथ मिला दिया जाय तो इसे अञ्जनत्रितय कहा जाता है । यह अञ्जनत्रितय बाह्य प्रयोग में नेत्राभिष्यन्द रोगों में अत्यन्त लाभदायक है ॥ ५३ ॥ तिमिरहराञ्जनम् तोलकैककमितं सीसं विशुद्धं दर्विकागतम् । हसन्तिकायां विन्यस्य गालयेत्प्रखराग्निना ॥५४॥

द्वाविंशस्तरङ्गः ५८१ सीसोन्मितं सुविमलं सूतं सीसे तु विद्रुते । निक्षिप्य द्रुतमादाय खल्वे सम्पेपयेद् दृढम् ॥ ५५ ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततो ज्ञात्वा द्वयोर्द्विगुणमञ्जनम् । सौवीरं विमलं दत्त्वा पेषयेद्दिनसप्तकम् ॥ ५६ ॥ माषकत्रितयं चन्द्रं दत्त्वाथ परिपेषयेत् । कुप्यां न्यसेन्मतमिदं तिमिरापहमञ्जनम् ॥ ५७ ॥ तोलकैकमितं सीसकमिति शार्ङ्गधरादौ प्रत्यञ्जननाम्ना व्यवहृतम् । चन्द्रं कर्पूरम् ॥ ५४–५७ ॥ भा.टो.—एक तोला शुद्ध सीसे को एक लम्बे वेंटवाली लोहे की करछी में डालकर उस करछी को जलते हुए कोयलों की अँगेठी पर रखकर तीव्र अग्नि देते हुए पिघलावें । जब सीसा पिघल जाय तो उसमें एक तोला शुद्ध पारद डालकर शीघ्र ही करछी को खरल में उलट कर मूसली से खूब अच्छी तरह मर्दन करके बारीक चूर्ण बना लें । अब इस चूर्ण में चार तोला शुद्ध सौवीरा- ञ्जन ( काला सुरमा ) मिलाकर सात दिन की रगड़ाई करके अन्त में तीन मासे कपूर ( भीमसेनी ) डालकर अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भरकर डाट बन्द करके रख लें । इस अञ्जन को कुछ काल निरन्तर नेत्रों में आँजने से तिमिर रोग नष्ट होता है ॥ ५४, ५७ ॥ तुहिनाञ्जनम् सोरकं तोलकार्द्धन्तु घनसारञ्च तन्मितम् । पलैकं खलु सौवीरं दत्त्वा सम्पेपयेद् भृशम् ॥ ५८ ॥ निदध्यात्काचकूप्यान्तु नाम्नेदं तुहिनाञ्जनम् । कण्डूदाहपरिस्रावहरं परमुदीरितम् ॥ ५६ ॥ भा.टी.—उत्तम सोरा आधा तोला, कपूर आधा तोला और शुद्ध सौवी- राञ्जन एक पल लेकर तीनों को एकत्र खरल में खूब अच्छी तरह घोटकर बारीक अञ्जन बनाकर काँच की शीशी में रख लें । इसको शीत अञ्जन कहते हैं, क्योंकि यह नेत्रों के लिए अत्यन्त ठंडा होने से बहुत लाभदायक होता है । इसके अतिरिक्त इस अञ्जन को कण्डू, दाह तथा स्रावयुक्त नेत्रों में भी पूर्ण रूप से व्यवहार करना चाहिए ॥ ५८–५६ ॥ अथ शिलाजतुनामानि शिलाजतु च शैलेयं शिलाजं शैलधातुजम् ।

५८२ रसतरङ्गिणी शिलामयः शिलास्वेदः शिलानिर्यास इत्यपि ॥ ६० ॥ अश्मजं त्वश्मजतु कं गिरिजं त्वद्रिजं तथा । अश्मोत्थमश्मलाक्षा च गैरेयञ्च मतन्तु तत् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—शिलाजतु, शैलेय, शिलाज, शैलधातुज, शिलामय, शिला- स्वेद, शिलानिर्यास, अश्मज, अश्मजतु क, गिरिज, अद्रिज, अश्मोत्थ, अश्म- लाक्षा और गैरेय, ये नाम शिलाजीत के कहे जाते हैं ॥ ६०, ६१ ॥ शिलाजतुपरिचयः सूर्य्यसन्तापसन्तप्ताः शिलाः शैलाधिपस्य यद् । गोढं मुञ्चन्ति निर्यासं तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥६२॥ शैलाधिपशिलासारो निर्गतो रवितापतः । शुष्कः सन्मूर्त्ततां यातः शिलाजतु निगद्यते ॥६३॥ भा.टी.-जब ज्येष्ठ वैशाख की तीव्र सूर्य की किरणों से हिमालय की शिला (चट्टान) गरम हो जाती हैं और उनमें होनेवाला रस पिघलकर बाहर आकर जमने लगता है उसे शिलाजीत कहते हैं । अथवा हिमालय की शिलाओं का सार सूर्य के ताप से चू करके बाहर आ जाता है और सूख करके काला कोल- तार-सा हो जाता है उसे शिलाजीत कहते हैं ॥ ६२, ६३ ॥ वक्तव्य—यह देखने में कोलतार ( अलकतरा ) के समान काला और गाढ़ा-सा द्रव होता है । सूखने पर चमकीला और भङ्गुर हो जाता है। यह जल में घुल जाता है और तारों को छोड़ता है । अलकोहल, क्लोरोफार्म तथा ईथर में नहीं घुलता है । रासायनिक प्रतिक्रिया में उदासीन रहता है । शिलाजतु विश्लेषण—शुद्ध शिलाजतु के विश्लेषण करने से उसमें जल ६.५%, ऐन्द्रियिक द्रव्य ३६.२०%, पार्थिव द्रव्य ३४.६५%, ( Nitrogenous matters ) १.३%, चूना, ७.८०%, अभ्रक ( Mica ) १.३५%, मात्रा में पाये जाते हैं । सम्भवतः इन्हीं तत्वों की उपस्थिति के कारण शिलाजतु त्रिदोष- नाशक स्थिर किया गया हो । यह प्रायः सभी रोगों में लाभदायक होता है । कहा गया है—"न सोऽस्ति रोगों भुवि मानवानां शिलाजतु यन्न जयेत्प्रसह्य।" आज-कल शिलाजीत काश्मीर, गढ़वाल, बागेश्वर ( अल्मोड़ा ), भूटान, तिब्बत और गिलगित आदि पर्वतीय स्थानों से प्राप्त होता है । इसको वहाँ के लोग छोटे-छोटे खण्डों में एकत्र करके भेजते हैं । कोई शिलाजीत को खनिज तैल मिनरल आयल ( Mineral oil )

द्वविंशस्तरङ्गः ५८३ का यौगिक मानते हैं। सम्भव है कि इसी कारण उनके विचारों में शिलाजीत को अग्नि पर नहीं तपाना चाहिये। क्योंकि इसमें पैट्रोल की जाति का तैल होने से यह शीघ्र उड़नशील है और अग्निपरीक्षा में निर्धूम जलता है और पानी में तैरता है। परन्तु आयुर्वेद के रसग्रन्थों में इसकी भस्म करने को लिखा है। आधुनिक चिकित्सकों ने इसमें मिनरल आयल पाया है, अतः वे लोग भी शिलाजतु को क्षय रोग में व्यवहृत होता हुआ देखकर पेट्रोलियम इमल्शन (Petroleum Imullion) का क्षय रोग में व्यवहार करने लगे हैं। परन्तु आजकल शिलाजीत के विषय में बहुत ठगी चल पड़ी है, इसका पूरा ध्यान रखकर ही शिलाजीत का व्यवहार होना चाहिए। शिलाजतुभेदाः सौवर्णं राजतं ताम्रं लौहञ्चेति विभेदतः। शिलाजतु समाख्यातं भिषग्भिस्तु चतुर्विधम् ॥ ६४ ॥ शिलाजतुभेदाः सौवर्णादयः। उक्तं हि प्राचीनैः—"सौवर्णं राजतं ताम्रमा- यसञ्च चतुर्विधम्। शिलाजतु हि विज्ञेयं तत्तल्लिङ्गललक्षितम्" इति ॥६४॥ भा.टी.—स्वर्णगर्भ शिलाजतु, रजतगर्भ शिलाजतु, ताम्रगर्भ शिलाजतु, लौहगर्भ शिलाजतु, इस तरह स्वर्ण आदि धातुयुक्त पत्थरों से प्राप्त होने के कारण शिलाजीत के चार भेद पाये जाते हैं ॥६४॥ तेषां रूपाणि शिशिरं मधुरं तिक्तं कटुकं कटुपाकि च। जटाकुसुमसदृशां सौवर्णं शैलधातुजम् ॥ ६५ ॥ शिशिरं पाण्डुरं तिक्तं स्वादुपाकि च राजतम्। तिक्तोष्णनीदणं नालाभं ताम्रं गिरिजमीरितम् ॥ ६६ ॥ तिक्तं सलवणं कृष्णं विपाके कटुशीतलम्। गुरु स्निग्धं कषायञ्च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ॥ ६७॥ सौवर्णं वातपित्तघ्नं राजतं श्लेष्मपित्तहृत्। कफघ्नं ताम्रजं ज्ञेयं त्रिदोषहरमायसम् ॥ ६८ ॥ तेषां रूपाणि—शिशिरं मधुरं तिक्तमित्यादिना। उक्तं हि—"सौवर्णन्तु जपापुष्पवर्णं भवति शैलजम्। मधुरं कटुतिक्तञ्च शीतलं कटुपाकि च" इति। तथा शिशिरं पाण्डुरं तिक्तं राजतमिति। तथा चोक्तम्—"राजतं पाण्डुरं शीतं कटुकं स्वादुपाकि च" इति। तिक्तोष्णादिगुणं ताम्रम्। यथाहूः—"ताम्रं मयूर-

५८४ | रसतरङ्गिणी

कण्ठाभं तीक्ष्णमुष्णं च जायते" इति। लौहं तु—तिक्तं सलवणं कृष्णं शीत- लञ्च । स्मरन्ति हि—"लौहं जटायुपक्षाभं सतिक्तं लवणं भवेत् । विपाके कटुकं शीतं सर्वश्रेष्ठमुदाहृतम्" इति । एतेन शिलाजतु स्वोपादानस्वर्णादिधातुवत् शीतवीर्यम्, ताम्रस्य तु उष्णवीर्यम् । ताम्रस्योष्णवीर्यत्त्वात् । तस्मात् लौहं शिलाजत्वपि उष्णवीर्यमिति लोकोक्तिर्भ्रान्तेति निश्चयः ॥६५–६८॥ भा.टी.—स्वर्णधातुयुक्त शिलाओं से निकलनेवाला शिलाजीत शिशिर- गुण, मधुर, तिक्त और कटुरस तथा कटुविपाकी और बाह्यदर्शन में गुड़हलपुष्प सदृश वर्ण का होता है । रजतधातु युक्त शिलाओं से निकलनेवाला शिलाजीत शिशिर पाण्डुवर्ण, तिक्त रस, मधुरपाकवाला होता है। ताम्रधातु युक्त शिलाओं से प्राप्त होनेवाला शिलाजीत तिक्तरस, तीक्ष्ण, उष्ण गुण और बाह्यदर्शन में नीलाभवर्ण का होता है । लौहधातु युक्त शिलाओं से प्राप्त होनेवाला शिला- जीत तिक्त, किञ्चित् लवण और कषाय रस, कटुविपाक, शीतल, गुरु तथा स्निग्ध गुण और बाह्यदर्शन में काले रंग का होता है। इनमें से सुवर्ण शिला- जतु वातपित्तनाशक, रजतशिलाजतु श्लेष्मपित्तहर, ताम्रशिलाजतु कफनाशक, किन्तु लौह शिलाजतु त्रिदोषशामक होता है ॥ ६५–६८ ॥ शिलाजतुनः शोधनम् [ गीतिका ] विगताम्बुदे निवाते धरणीतलप्रदेशे । प्रखरे निदाघकाले प्रणयेच्छिलाजशुद्धिम् ॥ ६६ ॥ विमलानि भाजनानि त्रयसा विनिर्मितानि । युगसंमितानि तीव्रे निदधीत सूर्यतापे ॥७०॥ सुविचूर्णीतं शिलाजं विनिधाय पात्रमध्ये । द्विगुणं प्रतप्तनीरं त्रिफलाकषायमर्द्धम् ॥७१॥ गिरिजे प्रदाय यामं निदधीत तीव्रतापे । कामं विमर्द्य गिरिजं विदधीत वस्त्रपूतम् ॥७२॥ विनिधाय पूर्वपात्रे निदधीत तीव्रतापे । अथ तीव्रतापयोगाद्विमलं सरं प्रकाशम् ॥७३॥ मृदुलं प्रगाढकृष्णं यदुपैति नीरपृष्ठे । विदधीत सोष्णतोये खलु भाजनेऽपरस्मिन् ॥७४॥ अथ वै द्वितीयपात्रात् खलु भाजने तृतीये ।

द्वाविंशस्तरङ्गः ५८५ अथ भाजनात्तृतीयात् निदधीत तुर्यपात्रे ॥७५॥ सलिलं तु यावदच्छं न भवेत्तु तावदेवम् । विदधीत वैद्यवर्यः सततं कृतावधानः ॥७६॥ सलिलं भवेद्यदाच्छं मलमेत्यधःप्रदेशे । सलिलोर्ध्वभागसंस्थं गिरिजं हरेद्विशुद्धम् ॥७७॥ विधिना ह्यनेन शुद्धिं तदुपैति निर्विशेषात् । गिरिजं विशुद्धमेवं विनियोजयेद्विशङ्कः ॥७८॥ शिलाजतुशोधनप्रकारश्चरकाचार्योक्त एव व्यवहृतः सर्वसम्मतश्चेति स एव सरलाक्षरैर्गीतिकया च निर्दिष्ट आचार्य्यैः । युगसंमितानीति चत्वारि । अशुद्धन्तु दाहादिकारणमाहुः । स्मरन्ति हि—"अशुद्धं दाहमूर्च्छायभ्रमपित्तास्रशोषकृत् । शिलाजतु प्रकुरुते मान्द्यमग्नेश्च विड्ग्रहम्" इति । प्रक्षेपक्वाथस्य मानञ्च जलम- ष्टगुणं शिलाजतुसमानञ्च क्वाथ्यद्रव्यमिति । यथाह स्म वाग्भटः—"तुल्यं गिरि- जेन जले वसुगुणिते भावनौषधं क्वाथ्यम्।" इति । इत्थं शुद्धस्य गुणोत्कर्षाय भावनान्तरयोगोऽपि स्मर्य्यते कैश्चित् । विस्तरस्तु शिवागुटिकानिर्माणादौ वृद्ध- वाग्भटेऽनुसन्धेयः । भृङ्गरसत्रिफलागोदुग्धादिभिः शोधनन्तु गोत्रदोषशान्तये तत्र तत्र गुणाधानार्थञ्च कार्यमेव "गोदुग्धत्रिफलाभृङ्गद्रवैः पिष्टं शिलाजतु ! दिनैकं लौहजे पात्रे शुद्धिमायात्यसंशयम्" इति स्मरणात् ॥ ६६-७८ ॥ भा.टो—बहुत तेज गर्मी के दिनों ( वैशाख और जेठ के महीने ) में जब आकाश में बादल बिलकुल न हों, तेज हवा न चलतां हो तो उन दिनों में शिलाजीत का शोधन करना चाहिए । शिलाजीतशोधन करने के लिए चार बड़े-बड़े लोहे के पात्र ( कड़ाही, परात आदि ) लेवें । अब एक पात्र में शिला- जतुचूर्ण ( पत्थर का चूर्ण या शिलाजीत का पिंड ) डालकर उसमें शिलाजतु से द्विगुण गरम जल और शिलाजतु से अर्धभाग त्रिफलाक्वाथ मिलाकर तीन घण्टे तक धूप में रख दें । इसके बाद धूप में ही इसको अच्छी तरह मसल कर कपड़े में छान लें । अब छाने हुए काले रंग के शिलाजतु जल को उक्त चार पात्रों में से एक पात्र में भरकर तेज धूप में रख दें । तेज धूप के लगने से जल के ऊपर कोमल स्वच्छ तथा अतिकृष्णवर्ण की मलाई-सी लग जायेगी । इस मलाई के सदृश पदार्थ को धीरे-धीरे निकालकर दूसरे वहाँ पर रखे हुए पात्र के गरम जल में डाल दें । जब इस दूसरे पात्रस्थ जल के ऊपर मलाई-सी जम जाय तो इसको तीसरे पात्र के गरम जल में डाल दें । इसी तरह तीसरे पात्र की

५८६ रसतरङ्गिणी मलाई को चौथे पात्र में डाल दें। इस प्रकार शिलाजतुजल युक्त पात्रों में से तब तक मलाई के रूप में जमी हुई शिलाजीत को निकालते रहें जब तक कि वह जल स्वच्छ वर्ण का न हो जाय और सारा पत्थर रेत मिट्टी आदि पात्र के तल में बैठ जाय। इस प्रकार अन्त में पूर्ण सावधानी के साथ स्वच्छ जल के ऊपर आयी हुई विशुद्ध शिलाजतु को एक स्वच्छपात्र में एकत्र कर लें। इस विधि से शिलाजतु उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाती है। इसको निःशंक होकर योगों में काम ला सकते हैं ॥ ६६-७८ ॥ वक्तव्य-जिन पात्रों में शिलाजीत का जल पड़ा हुआ हो उनको हिलाना- डुलाना नहीं चाहिए। अन्यथा न ऊपर के भाग में मलाई आयेगी और न नीचे रेत आदि पदार्थ ही बैठ सकेंगे। पात्र के ऊपर धूल आदि न पड़ने पावें। इस लिए पात्र के मुख पर सीसा रख देना चाहिए अथवा बहुत बारीक और साफ कपड़ा से ढकना चाहिए। मलाई को निकालते हुए सावधानी रखनी चाहिए जिससे उसके नीचे के जल में बहुत कम्पन न होने पावे। प्रक्षेपक्वाथमानम् शिलाजतुसमं क्वाथः जलमष्टगुणं ततः। पर्दाशशेषितः क्वाथ शिलामयविशुद्धये ॥७६॥ भा.टी.-शिलाजीत की शुद्धि के लिए जिस औषधि का क्वाथ काम में लाना हो उसे शोधनीय शिलाजीत के समभाग लेकर उसमें आठ गुणा जल डालकर पकायें, जब पकते-पकते जल चतुर्थांश रह जाय तो उसे छानकर शिलाजीत शोधन के काम में लाना चाहिए ॥ ७६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः निरुक्तेनैव विधिना क्वाथस्थाने तु गोजलम्। दत्त्वाहृता शिलालाक्षा शुद्धिमायात्यसंशयम् ॥८०॥ भा.टी.-यदि शिलाजीत शोधन में (त्रिफला) कषाय के स्थान पर गोमूत्र (ताजा और साफ) डालकर धूप में रख के शिलाजीत की मलाई जमा ली जाय तो इससे भी शिलाजीत निःसन्देह शुद्ध हो जाती है ॥ ८० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः पूर्वोक्तेनैव मार्गेण क्वाथे भृङ्गोत्थितं रसम्। दत्वा हृतः शिलास्वेदः परां शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥८१॥ भा.टी.-यदि त्रिफला कषाय के स्थान पर भाँगरे का स्वच्छ साफ स्वरस

द्वाविंशस्तरङ्गः ५८७ डालकर धूप में सुखाकर शिलाजीत की मलाई निकाल ली जाय तो भी शिलाजीत शुद्ध हो जाती है ॥८१॥ वक्तव्य—शिलाजीत को विशेष रूप से वातहर, पित्तहर तथा कफहर बनाने के लिए इसे सामान्य शोधन के अनन्तर वात, पित्त और कफ नाशक गणों की औषधियों के पृथक्-पृथक् क्वाथ, अथवा सम्पूर्ण वातहर या पित्तहर अथवा कफ नाशक वर्ग के कषाय की भावना देकर विशेष रूप से शिलाजीत को बनाया जा सकता है। इस विधि से तैयार की हुई शिलाजीत अधिक शक्तिशाली हो जाती है और रोगों को (वातादि प्रकोपजन्य) शीघ्र ही शान्त करनेवाली हो जाती है। शिलाजीत को विशेष शक्तिशाली बनाने के लिए पहिले सामान्य विधि से अर्थात् त्रिफला कषाय, गोमूत्र अथवा भाँगरे के कषाय स्वरस से शुद्ध करना चाहिए। इसके बाद जब उसमें मैल अथवा रेत बालु आदि का अंश न रहे तो फिर उसमें वातादि नाशक औषधियों का कषाय डालकर धूप में रख सुखा लेना चाहिए। जब पूर्व क्वाथ सूख जाय तो पुनः दूसरा क्वाथ उसमें डालकर धूप में रखकर सुखा लेना चाहिए। कई फार्मेसीवाले शिलाजीत को गरम पानी या गोमूत्र में घोलकर छान लेते हैं, फिर उसे अग्नि पर चढ़ा कर गाढ़ा कर लेते हैं और अग्नितापी शिला- जीत के नाम से व्यवहार करते हैं। परन्तु इस विधि से बनायी हुई शिलाजीत में बालुका, रेत, मिट्टी आदि का अंश रहने से यह उत्तम नहीं है। विशुद्धशिलाजतुनः परीक्षणम् याङ्गारसंस्था निर्धूमा पक्वा लिङ्गोपमा भवेत् । आस्वादे कटुतिक्ता च शिनालाक्षा तु साऽमला ॥८२॥ शुद्धशिलाजतुपरीक्षां याऽङ्गारसंस्थेत्यादिना। यथाहुः—“वह्नौ क्षिप्तन्तु निर्धूमं पक्वं लिङ्गोपमं भवेत्। तृणाग्रेणाम्भसि क्षिप्तमधो गलति तन्तुवत् ॥ गोमूत्रगन्धि मलिनं शुद्धं ज्ञेयं शिलाजतु”॥ इति। सामलेत्यत्र सा अमला इति च्छेदः ॥८२॥ भा.टी.—जिस शिलाजीत (शुद्ध) को जलते हुए कोयलों के ऊपर रखने से धुंआ न उठे, किन्तु भुत-भुत करके पकती हुई शिलाजीत लिंगाकार हो जाय, इसके साथ ही यदि उसे जिह्वा पर रखें तो उसमें कटु और तिक्त (कडुवा) स्वाद मालूम होता हो तो उसे शुद्ध (असली) शिलाजीत समझना चाहिए ॥८२॥

५८८ रसतरङ्गिणी अपरं परीक्षणम् सलिले या विनििक्षिप्ता तन्तुप्रस्रवकारिणी । आस्वादे कटुतिक्ता च शिलालाक्षा तु साऽमला ॥८३॥ भा.टी.-अथवा जिस शिलाजीत को थोड़ा-सा लेकर जल में डाला जाय यदि वह जल में इधर-उधर को तार से होकर फैलने लगे और स्वाद में कटु और तिक्त हो तो वह भी शुद्ध शिलाजीत होती है ॥८३॥ शिलामयस्य गुणाः शिलाजतु मतं तिक्तं विपाके कटुकं तथा । मूत्रलञ्च विशेषेण योगवाहि रसायनम् ॥८४॥ भा.टी.-शिलाजीत तिक्त प्रधान रस, विपाक में कटु, मूत्र अधिक लाने वाला योगवाही और रसायन द्रव्य है ॥८४॥ अपि च- शिलास्वेदो बल्यः श्वयथुशमनः पाण्डुहरणः क्षयश्वासप्लीहज्वरदहनमान्द्यापहरतः । अपस्मारोन्मादोदरगुदजकृच्छ्रप्रशमनः समीरस्थौल्योरुक्षतहृदयशूलैकदलनः ॥८५॥ प्रमेहकरिकेशरी प्रबलशूलकालानलः कृमिप्रशमनः परं सुवितताश्मरीशैलभित् । सकुष्ठवमिगुल्मजित् प्रबलवातरक्तप्लुतं स्मृतो रसविशारदैः खलु शिलामयो निर्मलः ॥८६॥ गुणाः- उक्तमन्यत्रापि "शिलाह्वं कटुतिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम् । छेदि योगावहं हन्ति कफमेहाश्मशर्कराः ॥ मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं वातास्राशांसि पाण्डुताम् । अपस्मारं तथोन्मादं शोथकुष्ठोदरकृमीन्" इति । स्यादेतत् शिशिरं हि शिलाजतु इति पूर्वमुक्तमत्र च शिलाह्वं कटुतिक्तोष्णमिति उष्णवीर्य- मुच्यते विरुद्धम् ? अत्र ब्रूमहे-न वयं सर्वं शिलाजतु शीतवीर्यमिति प्रतिजानीमहे, यावता भवतैवं पर्यनुयुज्येमहि, अपितु ताम्रमुष्णवीर्यं सौवर्णं राजतं लौहञ्च शीतवीर्यमिति, "शिलाभ्यो यस्य यज्जातं धातोस्तत्तद्गुणं वदेत्" इति वृद्धवाग्भ- टस्मरणात् । यत्तु अनुभवसिद्धमस्योष्णत्वमिति तत्र च "सर्वञ्च तिक्तकटुकं नात्युष्णं कटुपाकतः" इति गृहाण । कटुपाकतः इति हेतुपञ्चम्यास्तसिल् । इदमयुक्तं भवति कटुपाकप्रभावाद् उष्णत्वमपि स्वधातुगुणयोगात् शीतलं सत् नात्युष्णं

द्वाविंशस्तरङ्गः ५८६ भवतीति । तस्मात् नात्युष्णमिति सयुक्तिको विरोधपरिहार उद्भावितो वाग्भटे । उत्कृष्टञ्च तत्—“गोमूत्रगन्धि कृष्णं गुग्गुल्वाभं विशर्करं मृत्स्नम् । स्निग्धमनम्ल- कषायं मृदु गुरु च शिलाजतु श्रेष्ठम्” इति कथितम् । इत्यलमत्राम्रेडितेन । शिला- स्वेदो बल्य इत्यादिना शिलाजतुविशेषगुणाः निगदव्याख्याताः ॥ ८५, ८६ ॥ भा.टी.—शिलाजीत बलकारक, शोथ, पाण्डुरोग, क्षय, श्वास, प्लीहावृद्धि, ज्वर, अग्निमान्द्य रोगों को मिटाती है । इसको अपस्मार, उन्माद, उदररोग, बवासीर और मूत्रकृच्छ्र रोगों में प्रयोग किया जाता है । इसके सेवन से वात- प्रकोप, शरीर की स्थूलता, उरःक्षत, हृदय रोग ( शूल ), प्रमेह, उदरशूल, उदरकृमि अत्यन्त बढ़ी हुई अश्मरी ( पथरी ), कुष्ठ रोग, वमन, गुल्म, भयन्- कर वातरक्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ८५, ८६ ॥ वक्तव्य—पथ्य भोजन के साथ उत्तम विधि से नियम पूर्वम शिलाजीत का सेवन करने से यह विशेष रूप से जत्रु के ऊर्ध्वभाग में व्याप्त प्रसाद संज्ञक वायु को नियमन करती है । यदि उक्तस्थान से वायु क्षीण हो गयी हो तो उसका पोषण करती है । शिलाजीत के सेवन से मूत्र में आनेवाला ओजस्राव ( अल- ब्यूमन ) अथवा ओजधातु का क्षय दूर हो जाता है । इसके द्वारा चेतनावाही नाड़ियों की दुर्बलता दूर हो जाती है अर्थात् शिलाजीत चेतनावाही नाड़ियों के लिए बल्य है । धमनियों में बढ़ी हुई क्रिया को प्रकृतिस्थ करने के लिए शिलाजीत अमोघ और सर्वोत्तम औषधि है । अतः अधिक रक्तभार के कारण बढ़ी हुई धमनीक्रिया को नियमन करने के लिए अर्थात् अधिक रक्तभार (Blood pressure) के कारण फैली हुई धमनियों को संकुचित कर उनको बल देने के लिए शिलाजीत के समान अन्य कोई औषधि नहीं है । अधिक रक्त दबाव के कारण उत्पन्न होनेवाले तीव्र शिरःशूल में जिसमें हृदयकम्पन ( पल- पिटेशन ), नेत्र पलकों में शोथ, जी मिचलाना तथा अग्निमान्द्य में यह शीघ्र ही लाभ पहुँचाती है । पित्ताशय में जमे हुए कण रूप में होनेवाले पित्त को शिला- जीत शीघ्र ही पतला करती और बाहर निकालती है । शिलाजीत सेवन से पित्ताशय शुद्ध होता है और पित्ताशय शोथ शान्त हो जाता है । अतएव शिलाजीत पित्त जमने के कारण होनेवाली पित्ताश्मरी को निकालने के लिए उत्तम द्रव्य है । शिलाजीत के सेवन से मधुमेह शान्त हो जाता है और मधुमेह का उपद्रव स्वरूप संन्यास ( मूर्च्छा ) रोग नष्ट होता है । इसी तरह शिलाजतु से कामला तथा वमन रोग भी दूर हो जाते हैं । शिलाजतु सेवन से वातिक

५६० रसतरङ्गिणी

संस्थान (Nervous system) की दुर्बलता, मानसिक शिथिलता, अधिक रक्तदबाव के कारण उत्पन्न भयंकर उन्माद, आक्षेप (कन्वल्शन्) युक्त मूर्च्छा (coma), अपस्मार, ताण्डववात और योषापस्मार रोग शान्त होते हैं। शिलाजीत के सेवन से स्वेद वाहिनियाँ विस्तृत हो जाती हैं, जिससे अधिक स्वेद आने लगता है। इसके द्वारा उदरच्छुदा कला तथा सन्धि आदि स्थानों की कला में सञ्चित जल शोषित हो जाता है। इसके द्वारा हृदय की वृद्धि (विस्तृति) कम हो जाती है और अच्छी तरह निद्रा आने लगती है। शिला- जीत सेवन करने पर सर्वांग की महाधमनी अथवा क्षुद्रधमनी (केशिका) विस्तृत हो जाती है। इसके सेवन से वृक्कों में उत्तेजना उत्पन्न होती है जिससे मूत्र अधिक मात्रा में आता है, अतः शिलाजतु मूत्रल, पित्तनिःसारक, प्रवृद्धरक्त- वेगहर और स्वेदल है। क्योंकि शिलाजतु सेवन से वृक्कों की क्षुद्रधमनियाँ विस्तृत हो जाती हैं, जिससे अधिक मात्रा में मूत्र आता है। इसी तरह शिला- जतु से यकृत् की क्षुद्र धमनियां विस्तृत होती हैं, जिससे यकृत् में सञ्चित पित्त अधिक मात्रा में निकलता है। इसी प्रकार सर्वाङ्गत्वचा की क्षुद्रधमनियों की विस्तृतिकारक होने से शिलाजतु से सर्वांग त्वक्जात शोथ में होनेवाला अधिक रक्तदबाव भी दूर हो जाता है। त्वक्गत क्षुद्र धमनियों को विस्तृत करने के कारण शिलाजीत अधिक मात्रा में स्वेद लाती है। धमनीगत अल्पशोथ के कारण रक्त के दबाव से क्षीण हुई धमनियों की स्थिति स्थापकता शक्ति को पुनः शीघ्र प्रकृतिस्थ करने के लिए शिलाजीत उत्तम औषधि है। शिलाजतु सेवन से कामला रोग में उपद्रवस्वरूप कण्डूति (कण्डू) भी नष्ट हो जाती है। शिला- जतु में धमनी तथा मांसपेशियों के लिए स्थितिस्थापक गुण होने के कारण ही शिलाजीत हृदय आदि शारीरिक यन्त्रों की नष्ट हुई स्वाभाविक क्रियाओं को पुनः प्राप्त करने के लिए तथा इन्हीं अंगों की बढ़ी हुई स्वाभाविक क्रियाओं को नियमित करने के लिए सर्वोत्तम औषधि मानी गयी है। शिलाजीत सेवन करने से मूत्राशय में शोथ तथा रक्त सञ्चय के कारण होनेवाले मूत्राशय स्राव अर्थात् अधिक मूत्रप्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। शिलाजीत के सेवन से मूत्र की प्रतिक्रिया (Reaction) में कोई परि- वर्तन नहीं होता और न मूत्र की गन्ध तथा वर्ण में कोई परिवर्तन होता है ! किन्तु इसके सेवन करने से चौबीस घण्टे में होनेवाले कुल मूत्र की मात्रा में वृद्धि हो जाती है अर्थात् जहाँ स्वभावतः चौबीस घण्टे में मनुष्य को सवा सेर से लेकर डेढ़ सेर तक मूत्र आता है वहाँ शिलाजीत से दो सेर तक मूत्र की मात्रा