रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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सवा घंटे तक ही स्वेदन करना चाहिये और इसका चूर्ण बनाकर पोटली में नहीं बाँधना चाहिये, किन्तु मोटे-मोटे खण्डों को ही पोटली में बाँधना चाहिये। कासीसस्य शोधनम् कासीसं भृङ्गराजोत्थवारिणि घटिकात्रयम् । सकृत् स्विन्नं प्रयत्नेन् शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२३०॥ भा.टी.—कसीस को एक बार भांगरे के रस में दोलायन्त्र द्वारा तीन घड़ी तक स्वेदन करने से वह उत्तमरूप से शुद्ध हो जाती है ॥२३०॥ कासीसस्य गुणाः कासीसं तुवरं ग्राहि विपाकोष्णन्तु शीतलम् । श्वित्रघ्नं नेत्र्यमतुलं विषघ्नं कचरञ्जनम् ॥२३१॥ वातश्लेष्मामयहरं मूत्रकृच्छ्रप्रणाशनम् । कण्डूपाण्डुकृमिघ्नञ्च रक्तसञ्जननं परम् ॥२३२॥ रजःप्रवर्तकं बल्यं ज्वरघ्नं प्लीहनाशनम् । बाह्यप्रयोगे विज्ञेयं सङ्कोचनकरं परम् ॥२३३॥ लोहमलत्वात् कान्तपाषाणसजातीयं कासीसं क्रमप्राप्तवर्णनम् । कासीसं द्विविधं चूर्णकासीसं पुष्पकासीसञ्चेति । कासीसं विपाके उष्णं स्पर्शतः, प्रथमा- वस्थायांतु शीतलम्, कचानां केशानां रञ्जनं कृष्णताकरम् । तथा बाह्यप्रयोगे लेपादिना सङ्कोचनकरम् । उक्तञ्च “कासीसद्वयमप्युष्णं तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्र्यं कंडूविषप्रणुत् ॥ मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्ति- तम् । सकृद् भृङ्गाम्बुना स्विन्नं कासीसं निर्मलं भवेत्” इति ॥२३१–२३३॥ भा.टी.—कसीस कषैली (रस में), ग्राही गुण में, विपाक में कटु, उष्ण गुण और बाह्यस्पर्श में शीतल गुणयुक्त होती है। इसको सफेद कोढ़ पर बाहर से लगाया जाता है, नेत्रों के लिये लाभदायक होता। इसके लेप से अथवा अन्तः प्रयोग से वमन द्वारा शरीरगत विष नष्ट हो जाते हैं। कसीस के द्वारा बालों को काला करनेवाले खिजाब बनाये जाते हैं। यह वातश्लेष्महर, मूत्रकृच्छ्रनाशक, कंडूरोग उदरकृमि रोगों को नष्ट करता है। इसके कुछ काल सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है। यह रजःप्रवर्तक, बल देनेवाला, जीर्णज्वरहर और प्लीहा- रोग नाशक है। बाह्य प्रयोग में कसीस अत्यन्त संकोचक होती है ॥२३१-२३३॥ विशुद्धं लोहचूर्णन्तु काचपात्रे पिंधापयेत् ।