रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवक्तव्य—कसीस भी लोह का समास है और यह प्रायः कृत्रिम विधि से ही निर्मित प्राप्त होता है। इसका निर्माण-प्रकार आगे दिया गया है। आज- कल कसीस हरे-हरे क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है। इसे अंग्रेजी में फेरीसल्फ (Ferrisulph) अथवा फेरस सल्फेट (Ferrous Sulphate) कहते हैं। इसको अग्नि पर गरम करने से इसमें से जल निकलता है। इस जल को वाटर आफ क्रिस्टलाइजेशन (Water of Crystallisation) कहते हैं। इसी के कारण यह कण रूप में प्राप्त होता है। जब तपाने पर इसमें से जल निकल जाता है तो यह कसीस सफेद रंग का हो जाता है। अतः कणरूप में होने का कारण इसमें जल ही है। यदि इसको अधिक गरम किया जाय तो इसमें से प्रथम जल निकलता है, फिर सफेद रंग का धुँआ निकलता है, जिसे यदि द्रवीभूत करके परीक्षा करें तो ज्ञात होता है कि यह तेल सा गाढ़ा पदार्थ है। इसकी कुछ बूँदों को जल में डालकर चखने से खट्टा स्वाद मालूम होता है और कसीस के द्रवीभूत धुएँ को लकड़ी या कपड़े पर डालें तो वे झुलस जायेंगे। परीक्षा करने पर यह गन्धकाम्ल सिद्ध हुआ है। पहिले इसी को गंधक- तैल कहते थे। क्रिस्टल के स्वरूप में प्राप्त होनेवाले कसीस को पुष्पकासीस समझना चाहिये और जो ओक्साई के रूप में हो जाता है उसे बालुकासीस समझा जाता है। कहीं कहीं कसीस के हीरा कसीस, पुष्पकासीस और लोह- कासीस, इस तरह तीन भेद लिखे हैं, परन्तु दो भेद ही अधिक प्रचलित हैं। कासीसस्य द्वौ भेदौ चूर्णकासीसकञ्चैव पुष्पकासीसकन्तथा। कासीसं द्विविधं ख्यातं रसत्तन्त्रप्रयोक्तृभिः ॥२२८॥ भा.टी.—चूर्णकासीस और पुष्पकासीस भेद से कसीस दो प्रकार की मानी गयी है ॥ २२८ ॥ अनयोः स्वरूपम् चूर्णकासीसकं श्वेतमीषत्पीतञ्च कीर्तितम्। पुष्पकासीसकं स्वच्छहरिद्वर्णं प्रकीर्तितम् ॥२२६॥ भा.टी.—इन द्विविध कासीसों में से चूर्णकासीस सफेद और कुछ पीले रंग की होती है। परन्तु पुष्पकासीस (हीरा कसीस) स्वच्छ हरित् वर्ण की होती है ॥ २२६ ॥ वक्तव्य—कसीस की पोटली बाँधकर भांगरे के स्वरस में स्वेदन करने से वह उसमें घुलकर नीचे आ जाती है। अतः इसको थोड़ी देर अर्थात् करीब