भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 587

५६२ रसतरङ्गिणी रजोदोषं शुक्रदोषं रक्तपित्तं सुदारुणम् । क्लैब्यं कण्डूं कामलाञ्च क्षयं पित्तं त्वगाश्रितम् ॥२२३॥ कासं श्वासं महाघोरं प्रमेहं चाचिरोत्थितम् । विनाशयेद्विशेषेण न सन्देहोऽत्र कश्चन ॥२२४॥ मृतकान्तपाषाणगुणाः—कान्तपाषाणः शिशिरस्तथा मूर्च्छादिरोगनाशनश्च । न सन्देहोऽत्र कश्चन इति अनुभवप्रत्ययः ॥ २२१-२२४ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म शीतगुण और शीतवीर्य होती है । इसके सेवन से शरीर मोटा ( बृंहण ) होता है और उसमें बलवृद्धि तथा उत्पादक अंगों में उत्तेजना ( वृष्य ) उत्पन्न होती है । यह त्वच्य तथा मूर्च्छा और मोह को दूर करती है । यह ज्वरनाशक, विषनाशक तथा वार्द्धक्यनाशक होती है । इसके सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और हृदय की घबड़ाहट ( पल- पिटेशन) दूर होती है । यह मासिकधर्म की खराबी, शुक्रदोष, भयंकर रक्तपित्त, नपुंसकता, कण्डू, कामला और क्षय रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से त्वगाश्रित पित्त ( रक्त में पित्त का प्रकोप मिश्रण ), कास, श्वास तथा पुरातन प्रमेह रोग विशेष रूप से निःसन्देह दूर होते हैं ॥ २२१-२२४ ॥ अस्य मात्रा कान्तपाषाणकस्येह रक्तिकाद्वितयोन्मिता । पूर्णमात्रा मता विज्ञैर्गदापनयनक्षमा ॥२२५॥ कान्तपाषाणभस्म की पूर्णमात्रा दो रत्ती तक प्रयोग की जा सकती है॥२२५॥ कान्तपाषाणस्य प्रयोगः कान्तपाषाणकः कामं लोहवद् गुणकारकः । आमयेषु च सर्वेषु प्रयोगश्चापि तादृशः ॥ २२६ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म प्रायः लोह अथवा कान्तलोह के समान गुणकारक होती है । अतः सब रोगों में लोहभस्म के समान ही प्रयोग करना चाहिए ॥ २२६ ॥ अथ काशीसस्य नामानि काशीशकञ्च कासीसं पुष्पकासीसकन्तथा । पांशुकं पांशुकासीसं खगाख्यञ्च प्रकीर्तितम् ॥ २२७ ॥ भा.टी.—काशीशक, कासीस, पुष्पकासीसक, पांशुक, पांशुकासीस और खग ( पछी ) के नाम कसीस के कहे जाते हैं ॥ २२७ ॥