रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६८ रसततरङ्गिणी में रक्तवृद्धि के लिए शुद्ध कासीसचूर्ण में सज्जीक्षारचूर्ण मिलाकर सेवन कराया जाता है । पुराने सफेद कोढ़ के दागों (निसान) पर कासीसचूर्ण में धतूराबीज और गुञ्जाबीज ( रत्ती ) चूर्ण मिला जल से पीस लेप किया जाता है । इस लेप को दो मास तक बराबर लगाते रहने से श्वित्रकुष्ठ के निशान मिट जाते हैं। कासीसचूर्ण को बाकुचीबीजचूर्ण और शुद्ध गेरूचूर्ण के साथ मिलाकर जल से पीसकर दो मास तक लेप करने से चिह्न मिट जाते हैं। गुदभ्रंश ( काँच निक- लना ) तथा बवासीर के मस्सों में कासीसद्रव की गुदबस्ति कुछ दिन देते रहने से बवासीर के मस्से सूख जाते हैं और गुदभ्रंश भी गुद बन्धनियों के दृढ हो जाने से ठीक हो जाता है ॥ २४३-२५४ ॥ कासीसस्य प्रथमो मारणप्रकारः काञ्जिकेन तु विभाव्य सप्तधा शोषयेत्खगमनांशुभिर्बुधः । सम्पुटेच्च लघुना पुटेन तत् स्याद्धि भस्म खलु लोहितप्रभम् ॥२५५॥ समादायाथ तद्भस्म पेषयेन्निम्बुकद्रवैः । चक्रिकाः कारयित्वा च पुटेल्लघुपुटे पुनः ॥२५६॥ यावन्निरम्लं तद्भस्म तावदेवं पुनः पुनः । निम्बूकोत्थै रसैर्वाचः पिष्ट्वा संशोष्य सम्पुटेत् ॥२५७॥ सुश्लक्ष्णं जायते भस्म सर्वदोषविवर्जितम् । तत्साध्येषु विकारेषु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २५८ ॥ कासीसस्य मारणप्रकारः—अम्लराहित्यं प्रायः चत्वारिंशत्पुटैर्निष्पाद्यते । कासीसभस्म लौहवत् पाण्डुकामलाद्यामयनाशनं विशेषतः श्वित्रघ्नञ्च ॥ २५५-२५८॥ भा.टी.—शुद्ध कासीसचूर्ण को खरल में डाल उसमें काञ्जी मिलाकर घोटें और सुखा लें । इस प्रकार काञ्जी की सात भावना देकर सुखा लें । अब इस चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें तो इसकी रक्तवर्ण की भस्म हो जाती है । अब इस भस्म को लेकर खरल में डालें और नींबू के रस से पीस कर टिकिया बना लें और धूप में सुखाकर सम्पुट में फूँक देवें । इस तरह नींबू रस की तब तक भावना देकर पुट देते रहें जब तक कि भस्म को चखने पर उसमें खट्टापन मालूम न हो। इस विधि से कसीस की सर्वदोषरहित कोमल चिकनी भस्म हो जाती है ॥ २५५-२५८ ॥