रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५६ रसतरङ्गिणी विशोधितं खर्परन्तु पलद्वितयसंमितम् । तुल्येन चातिशुद्धेन रसेन्द्रेण विमर्दयेत् ॥ १६० ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततः कृत्वा सम्पुटस्थं तु कारयेत् । पुटयेदृतियतनेन शुष्कवन्योपलानले ॥ १६१ ॥ त्रिधैवं पुटितोऽप्यन्तु निर्विशेषां मृतिं व्रजेत् । इत्थं सुमृदुलं रम्यं पीताभं भस्म जायते ॥ १६२ ॥ खर्परस्य प्रथमो मारणप्रकारः—तुल्येन खर्परसमानेन अतिशुद्धेन इति भक्ष- णयोग्यतासम्पत्त्यै कथितम्। पीताभमिति यथादृष्टमुक्तम्। प्राञ्चस्तु—"खर्परं पारदेनैव चूर्णयित्वा दिनं पचेत्। वालुकायन्त्रमध्यस्थं शोणं भस्म प्रजायते" इत्याहुः ॥ १६०-१६२ ॥ भा.टी.—उक्तविधि से शुद्ध किये हुए खर्पर को दो पल प्रमाण मात्रा में लेकर खरल में डालें और इसमें दो पल शुद्ध पारद भी डाल दें। अब इनको खूब मर्दन करके बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके जङ्गली सूखे हुए उपलों की अग्नि (पुट) में फूँक दें। इस प्रकार सावधानी के साथ तीन बार पारद के साथ खर्पर को पुट देने से वह भस्म हो जाता है। इसकी भस्म अत्यन्त सुन्दर, कोमल और पीताभ वर्ण की होती है ॥ १६०–१६२ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः खर्परो विमलः शुद्धस्तुल्यतालकपेषितः । सम्पुटस्थस्त्रिपुटितः सर्वथा मृतिमाप्नुयात् ॥ १६३ ॥ भा.टी.--शुद्ध खर्परचूर्ण में समभाग शुद्ध हरतालचूर्ण मिलाकर जल से घोटकर सुखा लें। अब इसे सम्पुट में बन्द करके साधारण पुट में फूँक दें। इसी विधि को तीन बार दुहराने से खर्पर की उत्तम भस्म हो जाती है ॥१६३॥ मृतखर्परस्य गुणाः सुमृतः खर्परः शीतः कफपित्तापहः परम् । चक्षुष्यः सर्वमेहघ्नो रक्तप्रदरनाशनः ॥ १६४ ॥ रक्तपीत्ताश्मरीश्वासगुदामयनिषूदनः । जीर्णज्वरहरः कामं त्वतीसारनिबर्हणः ॥ १६५ ॥ योगवाही विशेषेण त्रिदोषघ्नो विषापहः ।