भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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१६ रसतरङ्गिणी कठूमर, थोहर, दूधी, गूलर, आक, बड़, पीपल और लोध, इनके दूध को दुग्ध- वर्ग शब्द से लिया जाता है । इनमें हथिनो से स्त्री-पर्यन्त दूध को जंगम दूध और कठूमर से लोध-पर्यन्त दूध को स्थावरदुग्ध कहा जाता है ॥ २४, २५ ॥ तैलवर्गः तिलसर्षपकोन्मत्तभल्लातैरण्डनिम्बजैः । उमादीनाञ्च तैलैस्तु तैलवर्गोऽत्र सम्मतः ॥२६॥ उन्मत्तः धत्तूरः । उमा अतसी ॥ २६ ॥ भा.टी.--तिल, सरसों, धतूरा, भिलावा, एरण्ड, नीम के बीज, जयपाल- बीज, दन्तीबीज, कुसुमभबीज और अलसी आदि के तैलों को तैलवर्ग में लिया जाता है ॥ २६ ॥ कज्जलीस्वरूपम् निर्द्रवैर्धातुभिश्चाथ गन्धादिभिः पेषितः पारदः श्लक्ष्णतां प्रापितः । कज्जलाभो यदा जायतेऽसौ तदा नामतः कोविदैः कज्जलीत्युच्यते ॥२७॥ कज्जली कज्जलञ्चैव मता कज्जलिका च सा । रससम्पादनादौ च विशेषात्सा विधीयते ॥२८॥ रसपङ्कस्य लक्षणम् सद्रवैर्गन्धकाद्यैश्च धातुभिः पेषितो रसः । सुश्लक्ष्णः पङ्कसङ्काशो रसपङ्क इति स्मृतः ॥२९॥ पिष्टिका सूतं विमर्द्य गन्धेन दुग्धाद्यैस्तु द्रवैस्तथा । पेषणात् पिष्टतां नीता मता पिष्टी च पिष्टिका ॥३०॥ हिङ्गुलाकृष्ट रसः ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण हिङ्गुलादुत्थितो रसः । हिङ्गुलोत्थः स्मृतश्चैव हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥३१॥ निर्द्रवैरित्यारभ्य हिङ्गुलाकृष्ट उच्यत इति पर्यन्तं सुगमम् ॥ २७-३१ ॥ भा.टी.-पारद को गन्धक आदि उपरस द्रव्यों के साथ अथवा किसी धातु के साथ बिना द्रव (पतला, जल, कषाय, रस) योग के ही अच्छी तरह मर्दन कर चिकना चमकीला करके कज्जल के सदृश काला कर लिया जाय तो उसे विद्वान्