रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ द्वितीयस्तरङ्गः १७ लोग कजली कहते हैं। इस कजली को कजल और कजलिका भी कहा जाता है पारद गन्धक की कज्जली विशेष रूप से अनेक प्रकार के रसों के बनाने तथा धातुओंके मारण में काम आती है ॥ २७-२८ ॥ पारद को गन्धक आदि उपरस अथवा धातु के साथ किसी द्रव के सहारे अच्छी तरह मर्दन करके चिकना चमकीला लेसदार कीचड़ के समान कल्क जैसा बना लेना रसपंक कहा जाता है ॥ २९ ॥ पारद में गन्धक मिलाकर दूध आदि किसी पतली चीज के साथ अच्छा तरह मर्दन करके पीठी-सी बना लेना रसपिष्टिका या पारदपिष्टी कहा जाता है ॥ ३० ॥ सिंगरफ को नींबू के रस आदि में घोट सुखाकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में बंद करके ऊपर उड़ा लेने से निकाला हुआ पारा, हिंगुलोत्थ पारद या हिंगुलाकृष्ट पारद कहा जाता है। इसकी विधि आगे लिखी जायगी ॥ ३१ ॥ धातुसत्त्वलक्षणम् कोष्ठ्यां ध्मातस्य वज्रादेर्द्वावकोषधिभिः समम् । सारो यो निर्गतः सोऽत्र सत्त्वमित्यभिधीयते ॥३२॥ वनौषधिसत्त्वलक्षणम् वाष्पस्वेदनयन्त्रेण वनौषधिसमुद्भवः । सारः सत्त्वमिति प्रोक्तं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥३३॥ द्रावकौषधिभिर्वर्द्ध्यमाणैर्गुडगुग्गुल्वादिभिः ॥ ३२-३३ ॥ भा.टी.—हीरा अभ्रक आदि द्रव्यों को आगे लिखी हुई द्रावक गण की औषधियों के साथ घोटकर भट्ठी में रख तपाने से जो उनका सार भाग पदार्थ प्राप्त होता है उसे उस वस्तु का सार या सत्त्व कहा जाता है ॥ ३२ ॥ बाष्पस्वेदन यन्त्र द्वारा वनौषधियों का जो सार भाग प्राप्त होता है उसे रस-शास्त्रज्ञ, विद्वान् सत्त्व कहते हैं ॥ ३३ ॥ सिक्थतैलस्य लक्षणम् सिक्थकं तिलतैलञ्च युक्तमानविमिश्रितम् । विपक्वं नबनोताभं सिक्थतैलं प्रकीर्तितम् ॥ ३४ ॥ सिक्थकं मधूच्छिष्टम् , युक्तमानविमिश्रितमिति मूर्च्छनाविज्ञानीयांकप्रमाणेन विमिश्रितम् ॥ ३४ ॥ भा.टी.—मोम और तिलों के तैल को आवश्यकतानुसार योग्य मान में