भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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१८ रसतरङ्गिणी मिलाकर अग्नि पर रखकर पका लेने पर जब वह मक्खन के सदृश कोमल और गाढ़ा हो जाय तो उसे सिक्थतैल कहते हैं ॥ ३४ ॥ वक्तव्य—उक्त दोनों तैलों को अग्नि पर रखकर पकावें, जब मोम पिघलकर तैल में मिल जाय तो उसे उतार लें । ठंडा होने पर यह तैल मक्खन के समान गाढ़ा और कोमल होता है । द्रावको गणः गुञ्जा मधु गुडः सर्पिः सौभाग्यं गुग्गुलुस्तथा । पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं धातूनां द्रावको गणः ॥३५॥ भा.टी.—रत्ती, शहद, गुड़, घृत, सुहागा और गूगल को प्राचीन आचार्यों ने धातुद्रावकगण माना है ॥ ३५ ॥ ढालनम् संद्रावितस्य द्रव्यस्य द्रवे निक्षेपणन्तु यत् । ढालनं तत्समुद्दिष्टं रसकर्मविशारदैः ॥३६॥ भा.टी.—किसी सोना चाँदी आदि द्रव्य को अग्नि में पिघलाकर किसी क्वाथ स्वरस दूध आदि द्रव्य में डाल देने को रसशास्त्र में ढालन शब्द से कहा जाता है ॥ ३६ ॥ मित्रपञ्चकम् आज्यं गुञ्जाथ सौभाग्यं क्षौद्रं च पुरसंज्ञकम् । एतत्तु मिलितं विज्ञैर्मित्रपञ्चकमुच्यते ॥ ३७ ॥ विविधानां तु लोहानां द्रावणाय विशेषतः । रसतन्त्रविशेषज्ञैर्युज्यते मित्रपञ्चकम् ॥ ३८ ॥ पुरसंज्ञकं गुग्गुलुः ॥ ३७, ३८ ॥ भा.टी.—घी, रत्ती, सुहागा,शहद और गूगल को एकत्र मिलाकर ग्रहण करने को मित्रपञ्चक शब्द से लिया जाता है । विभिन्न प्रकार के धातुओं को पिघलाने के लिए रसशास्त्र में मित्रपञ्चक का प्रयोग होता है ॥३७-३८॥ वक्तव्य—मित्रपञ्चक द्वारा धातुओं का द्रावण भी किया जाता है । इसके द्वारा धातुओं की कच्ची बनी हुई भस्मों की भी परीक्षा हो जाती है । आवापलक्षणम् द्रव्यान्तरविनिक्षेपो द्रुते वङ्गादिके तु यः । क्रियते स प्रतीवाप आवापश्च निगद्यते ॥ ३६ ॥