भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

द्वितीयस्तरङ्गः १६ निर्वापलक्षणम् धात्वादेर्वह्नितप्तस्य जलादौ यन्निषेचनम्। स निर्वापः स्मृतश्चापि निषेकः स्नपनञ्च तत् ॥४०॥ द्रव्यानन्तरस्य अश्वत्थकल्कचूर्णादेः ॥ ३६, ४० ॥ भा.टी.—किसी पिघलनेवाली वंग आदि धातु को पिघलाकर उसमें किसी अन्य द्रव्य डालने को प्रतीवाप अथवा आवाप कहा जाता है ॥३६॥ किसी लोहा, ताँबा, चाँदी आदि धातु को अग्नि में तपाकर जल अथवा मट्ठा, दूध, क्वाथ आदि में डालने या बुझाने को निर्वाप, निषेक अथवा स्नपन शब्द से कहा जाता है ॥ ४० ॥ वक्तव्य—यह आवाप, जब वंग या सीसे की भस्म करते हैं तो उसे पिघलाकर पिघली हुई अवस्था में थोड़ा करके हल्दी, अपामार्गचूर्ण, इमली- छालचूर्ण को डालते हैं जिससे वंगादि की भस्म हो जाती है । शुद्धावर्तलक्षणम् यदा तु ज्वलनो ज्वालाकुलः शुक्लसमुत्थितः। सत्त्वनिर्गमकालः स शुद्धावर्त इति स्मृतः ॥४१॥ ज्वलनोऽग्निः, शुक्लसमुत्थितः शुक्लवर्णज्वालायुक्तः । सत्त्वनिर्गमकालः स इति तदानीं वह्नितीव्रतासद्भावात् ॥४१॥ भा.टी.—जब किसी अभ्रक आदि द्रव्य को सत्त्व निकालने के लिये भट्ठी में रखते और अग्नि तेज करते हैं तब अग्नि एक बार बहुत तेज होकर सफेद ज्वालावाली हो जाती है तो उसे शुद्धावर्त कहते हैं ॥ ४१ ॥ वक्तव्य—अग्नि के इसी अवस्था में आने पर धातु का सत्त्व-पतन होने लगता है । पर्पटीस्वरूपम् संद्राविता कज्जलिकाग्नियोगात् रम्भापलाशे चिपिटीकृता च । रसागमकैः खलु पर्पटी सा प्रकीर्तिता पर्पटिका च सैव ॥४२॥ रम्भापलाशे कदलीपत्रे ॥ ४२ ॥ भा.टी.—पारद गन्धक की कज्जली को किसी लोह आदि धातु के पात्र में रख अग्नि में पिघला करके केले के पत्ते पर डालकर दूसरे केले के पत्ते से दबाकर चपटी पपड़ी सी बना लेने को पर्पटी या पर्पटिका कहते हैं ॥४२॥