रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० रसतरङ्गिणी वक्तव्य—पर्पटी बनाने में पिघले हुए द्रव्य को गोबर के ऊपर रखे हुए केले के पत्ते पर डालकर दूसरे पत्ते से दबाकर पपड़ी बनायी जाती है। ताडनम् यत् श्लिष्टलोहयोरेकतरस्य परिणाशनम्। अपरस्य च लोहस्य भवेच्च परिसाधनम् ॥४३॥ आध्मानाद् वङ्कनालेन ताडनं तदिहोच्यते । सञ्जातताडनं लोहं ताडितं परिकीर्तितम् ॥४४॥ भा.टी.—आपस में मिले हुए दो धातुओं में से एक धातु को नष्ट करने और दूसरे धातु को शुद्ध रूप में प्राप्त करने के लिए मिश्रित धातु को अग्नि में रखकर आगे लिखे हुए वंकनाल द्वारा तीव्र रूप में तपाने को ताड़न कहा जाता है। इस ताड़न क्रिया से प्राप्त लोह को ताड़ित लोह कहा जाता है ॥ ४३–४४ ॥ घोषाकृष्टं ताम्रम् ताडितं वङ्कनालेन सौषधं घोषकं यदा । स्यान्मुक्तवङ्गं तत्ताम्रं घोषाकृष्टमिहोच्यते ॥ ४५ ॥ घोषः कांस्यम्, मुक्तवङ्गं वङ्गविहीनम् ॥ ४५ ॥ भा.टी.—कांसे में होनेवाले राँगा को उससे पृथक् करनेवाली औष- धियों के साथ मिला वंकनाल द्वारा तीव्र अग्नि से तपाने पर जो वंगरहित ताँबा प्राप्त होता है उसे घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं ॥ ४५ ॥ वक्तव्य—इसी विधि से अन्य मिश्रित धातुओं में से एक धातु को प्राप्त किया जाता है, जिस धातु से किसी धातु को पृथक् किया जाता है उसे उस धातु से पृथक्कृत धातु कहा जाता है। जैसे तांबे से अलग किये स्वर्ण को ताम्राकृष्ट स्वर्ण कहेंगे। वङ्कनालम् करप्रमाणं यन्नालं पित्तलादिविनिर्मितम् । वह्नौ फूत्कारदानाय वङ्कनालं तदुच्यते ॥ ४६ ॥ स्वाङ्गशीतस्य लक्षणम् ज्वलनस्थितमेवेह शीतलत्वमुपैति यत् । स्वाङ्गशीतं तदुद्दिष्टं स्वतःशीतञ्च तन्मतम् ॥ ४७ ॥