रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयस्तरङ्गः २१ बहिःशीतलक्षणम् वह्नेर्बहिः समानीय यद् द्रव्यं याति शीतताम्। बहिःशीतं तदुद्दिष्टं बाह्यशीतञ्च तन्मतम् ॥ ४८ ॥ भावनालक्षणम् यच्चूर्णितस्य धात्वादेर्द्रवैः सम्पेष्य शोषणम्। भावनं तन्मतं विज्ञैर्भावना च निगद्यते ॥ ४६ ॥ वङ्कनालं स्वर्णकाराद्युपयुज्यमानमेकतः सूक्ष्मेणापरतश्च विस्तृतेन मुखेनो- पलक्षितं नलिकाकारं फूत्कारदानयन्त्रम् ॥ ४६–४६ ॥ भा. टी.—पीतल आदि धातु की बनी हुई एक हाथ लंबी नली को जिससे अग्नि को तेज करने के लिए फूँक मारी जाती है, वङ्कनाल या वक्त्रनाल कहा जाता है ॥ ४६ ॥ किसी धातु आदि को संपुट में बन्द करके पुट में फूँकने पर अग्नि के बिलकुल शान्त होने पर निकालने को स्वांगशीत कहते हैं। इसी को स्वतः शीत भी कहा जाता है ॥ ४७ ॥ किसी वस्तु को अग्नि में पकाकर उसी समय गरम अवस्था में अग्नि में से बाहर निकालकर ठंडा करने को बहिःशीत या बाह्यशीत शब्द से कहा जाता है ॥ ४८ ॥ किसी धातु आदि औषधि के चूर्ण को जल, क्वाथ, स्वरस आदि द्रव पदार्थ से पीस कर सुखाने को भावन या भावना कहा जाता है ॥ ४६ ॥ वक्तव्य—स्वर्ण आदि धातु को अग्नि पर रखकर पिघलाने के लिए सोनार लोग जिस नली से फूँक मारकर अग्नि तेज करते हैं उसे वङ्कनाल समझना चाहिए। यह नली एक तरफ बहुत पतली और दूसरे मुख की तरफ चौड़ी गोल होती है। इसके भी दो भेद होते हैं एक का मुख सीधा होता है किन्तु दूसरे प्रकार की नली का मुख पतली तरफ से कुछ टेढ़ा होता है। भावनायां द्रवपरिमाणम् द्रवेण यावता द्रव्यं चूर्णितं त्वार्द्रतां व्रजेत्। तावानेव द्रवो देयो भिषग्भिर्भावनाविधौ ॥ ५० ॥ भाव्यद्रव्यमितः क्वाथ्यो जलमष्टगुणं ततः। वस्वंशशोषितः क्वाथो देयः क्वाथेन भावने ॥ ५१ ॥