भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२२ रसतरङ्गिणी ऽस्वंशशोषितः अष्टमांशावशेषितः। प्रसङ्गात् सुभावितदुर्भावितयोः स्वरूपम्- “पेष्यमाणञ्च यद् द्रव्यं चिपिटीभूय चूर्णताम्। याति मार्दवयुक्तन्तत् सुभावितमु- दाहृतम्॥ यत् पिष्टं सहसा दीर्णं खरस्पर्शन्न कोमलम्। तद्दुर्भावितमित्युक्तं भावनावेदिभिर्जनैः” इति॥ ५०, ५१॥ भा.टी.—किसी चूर्ण रूप औषधि को भावना देनी हो तो उसमें उतना द्रव (पतला) पदार्थ डालना चाहिए जिससे वह चूर्ण गीला लुगदी की तरह हो जाय, यदि किसी औषधि के क्वाथ की भावना देनी हो तो चूर्ण रूप औषधि के बराबर भाग क्वाथ की औषधि लेकर उसको जौकुट करके उसमें अठगुणा जल डालकर पकायें, जब जल आठवाँ भाग शेष रहे तो उसे छान कर क्वाथ को चूर्ण रूप औषधि में डाल दें॥ ५०, ५१॥ शोधनम् उद्दिष्टैरौषधैः सार्द्धं क्रियते पेषणादिकम् । मलविच्छित्तये यत्तु शोधनं तदिहोच्यते॥ ५२॥ आदिपदेन स्वेदनक्षालनादि ग्राह्यम्, मलविच्छित्तये मलनाशाय॥५२॥ भा.टी.—किसी धातु आदि द्रव्य के मल (खराबी, दोष, विष) को दूर करने के लिए उसके शोधन के निमित्त लिखी हुई औषधि के साथ मिलाकर मर्दन, क्षालन, या निर्वापण आदि कर्म करना शोधन कहा जाता है ॥५२॥ वारितरलक्षणम् मृतं लोहं विनििक्षिप्तं यदा तरति वारिणि । रसन्त्रसुनिष्णातैस्तद् वारितरमीरितम्॥ ५३॥ वारितरमिति—अत्रेदवधेयम्—वारितरत्वमेव लोहमृतेर्न निश्चितं लक्षणं व्यभिचारात्, तथा हि दरदयोगमृतस्य शतधा पुटितस्यापि लोहस्य न क्वचिद् वारितरत्वमवलोकितचरम्, क्वचिच्च जम्बूफलादिरसपुटितस्याल्पपुटेब्वपि वारितरत्वमायातीति तस्माद् वारितरत्वं लोहमृतेर्न व्यापकं लक्षणम्। अपरत्र तु दरदादिपुटितस्यापि घृतादिनाऽमृतीकरणात् वारितरतागोधूमादिकणतार- कत्वञ्चावलोक्यते॥ ५३॥ भा.टी.—यदि किसी धातु की भस्म निस्तरंग जल में डालने से ऊपर तैरती है तो उसे वारितर लोहभस्म कहते हैं॥ ५३॥ मृतलोहम् तर्जन्यङ्गुष्ठसंघृष्टं विशेद्रेखान्तरं तु यत्। निविष्टञ्च बहिर्नैति मृतलोहं तदुच्यते ॥ ५४॥