रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयस्तरङ्गः २३ मृतं लोहं पुटे ध्मातं ताराज्यमधुसंयुतम् । न त्यजेत्तारमानं वा मृत-लोहं तदुच्यते ॥५५॥ निविष्टश्च बहिर्नैति—अत्यन्तसूक्ष्मत्वादिति शेषः ॥ ५४ ॥ मृतलोहस्य स्थूलपरीक्षामुक्त्वा सूक्ष्मपरीक्षामप्याह-पुटे ध्मातं मूषायां निधाया- ङ्गाराग्नौ स्थापितं, तारमानं न त्यजेत् न्यूनमधिकं वा न भवेत् यदा तदा तन्मृतं लोहं ज्ञेयम् ॥ ५५ ॥ भा.टी.—यदि किसी धातु की भस्म को तर्जनी और अँगूठे से मला जाय और अच्छी तरह पोंछ दिया जाय ऐसी अवस्था में भी यदि वह भस्म अँगूठे की सूक्ष्म रेखाओं में घुसी हुई रह जाय तो उसे मृतलोह कहते हैं ॥५४, ५५॥ वक्तव्य—इसके अतिरिक्त बनी हुई धातु की भस्म को सम भाग चाँदी और मधु में मिलाकर मूषा में रखकर खूब तपाएँ । यदि शीतल होने पर चाँदी अपने ही मान में रहे तो उसे भी मृतलोह कहते हैं । अपुनर्भवलक्षणम् समित्रपञ्चकं ध्मातं प्रकृतिं नैति यत् पुनः । अपुनर्भवमुक्तं तन्निरुत्थं च तदीरितम् ॥ ५६ ॥ मित्रपञ्चकं प्रागुक्तं गुञ्जाद्यम्, प्रकृतिं नैति पुनर्लोहरूपन्न भवति ॥५६॥ भा.टी.—किसी धातु की बनी हुई भस्म को पूर्वोक्त मित्रपञ्चक की औषधियों में मिलाकर मूषा में रख अग्नि में तपाया जाय, यदि तपाने पर भस्म में कोई परिवर्तन न हो तो उसे अपुनर्भव भस्म या निरुत्थलौह भस्म कहते हैं ॥ ५६ ॥ निरुत्थलक्षणम् अपुनर्भवसंज्ञं यल्लोहे तारसमन्वितम् । यदा तारे न लगति तन्निरुत्थमिहोच्यते ॥५७॥ यच्च लौहं तारसमन्वितं ईषत्तारं सम्मेल्याग्नौ ध्मातं सत् तारे रजते न लगति रजतसम्पृक्तं न भवति तन्निरुत्थम् ॥ ५७ ॥ भा.टी.—यदि निरुत्थ लोहभस्म में थोड़ी चाँदी मिलाकर तीव्र अग्नि में तपाया जाय और तपाने पर धातु की भस्म चाँदी के साथ न चिपटे तो उसे निरुत्थ-भस्म कहते हैं ॥ ५७ ॥ वक्तव्य—ठीक रसभस्मों की परीक्षा के विषय में प्रधान रूप से चार मत देखने में आते हैं—१ कुछ लोग औषधि (रस, धातु) का भस्म करने