भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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२४ रसतरङ्गिणी पर पूरे प्रमाण में रहना ही सिद्धि लक्षण मानते हैं । २ कुछ निरुत्थ होना ही सिद्धि लक्षण मानते हैं । ३ और कोई अग्नि में रखने पर धुवाँ न देना ही रससिद्धि लक्षण मानते हैं । ४ कोई पानी में तैरना सिद्धि का चिह्न समझते हैं, परन्तु उक्त चतुर्विध सिद्धिलक्षणों में कोई एक भी सर्वथा माननीय नहीं है । अतः मेरे विचार में रससिद्धि का लक्षण एक न होकर द्रव्यानुसार अनेक प्रकार है । अर्थात् पारद की भस्म करने पर उसका पूर्णपरिणाम में उतरना पारद भस्म सिद्ध का लक्षण समझना चाहिए । ताम्र रजत आदि धातुओं की निरुत्थ भस्म होना सिद्धि-चिह्न विशेष रूप से समझना चाहिए । हरताल आदि द्रव्यों की भस्म होने पर अग्नि में रखने पर धुआँ न देना सिद्धि-चिह्न और लोह का भस्म होने पर जल पर तैरना सिद्धि-चिह्न समझना चाहिए । अमृतीकरणम् लोहादीनां मृतानां वै शिष्टदोषापनुत्तये । क्रियते यस्तु संस्कार अमृतीकरणं मतम् ॥५८॥ अथामृतीकरणं सप्रयोजनमाह लोहादीनामिति-आदिना गगनादिग्रहणम्। शिष्टदोषाः ताम्रादीनां वान्तिभ्रान्त्यादयः, तेषामपनुतिर्विनाशः ॥ ५८ ॥ भा.टी.—धातुओं की भस्म करने पर उसमें रहे हुए शेष दोष को दूर करने के लिए जो संस्कार किया जाता है उसे अमृतीकरण कहते हैं । जैसे ताम्रभस्म का अमृतीकरण संस्कार आगे लिखा हुआ है ॥ ५८ ॥ परिस्रुतसलिलम् यन्त्रेण नाडिकाख्येन वह्निसन्तापयोगतः । बिन्दुशो यत्स्रुतं नीरं तत्परिस्रुतमुच्यते ॥ ५६ ॥ बिन्दुशः परिस्रुतं नीरं अर्कपदवाच्यं तत्परिस्रुतम् ॥ ५६ ॥ भा.टी.—नाड़िका यन्त्र अथवा भपके में केवल जल या जलयुक्त कोई औषधि डालकर अग्नि में रखकर उसके जल बूँद रूप में एकत्र कर लेने को परिस्रुत जल कहते हैं । इसी को डाक्टर लोग डिस्टिलवाटर कहते हैं ॥५६॥ मानपरिभाषा मानमादौ परीक्षेत योगान्निर्मापयेत्ततः । योगनिमाणसिद्धयर्थं मानं निर्दिश्यतेऽधुना ॥६०॥ षड्भिस्तु सर्षपैर्गौरैर्यवस्त्वेकः प्रकीर्तितः । त्रिभिर्यवैश्च गुञ्जैका मता सैवेह रक्तिका ॥ ६१ ॥