रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयस्तरङ्गः २५ वसुसंख्योन्मिताभिश्च रक्तिकाभिस्तु माषकः । माषकैः रविसंख्यातैस्तोलकं परिकीर्तितम् ॥६२॥ वटकः क्षुद्रकश्चैव द्रंक्षणश्च प्रकीर्तितः । तोलकद्वितयेनेह कर्षः स्यात्सैव तिन्दुकः ॥६३॥ अक्षः स एव कथितो विडालपदकं तथा । कवलग्रहसंज्ञश्च सुवर्णश्च निगद्यते ॥६४॥ कर्षद्वयं त्वर्द्धपलं स्याच्छुक्तिश्च निगद्यते । मता चाष्टमिका सैव पलार्द्धञ्च प्रकीर्तितम् ॥६५॥ शुक्तिभ्यान्तु पलं ज्ञेयं मुष्टिः षोडशिका च सा । चतुर्थिका च बिल्वञ्च प्रकुञ्चश्च निगद्यते ॥६६॥ पलाभ्यां प्रसृतं ज्ञेयं प्रसृतिश्च निगद्यते । प्रसृतिभ्यां समाख्यातः कुडवश्चाञ्जलिः स्मृतः ॥६७॥ कुडवाभ्यां शरावः स्यात् मानिका च निगद्यते । तदेवाष्टपलं ख्यातं रसतन्त्रे विचक्षणैः ॥६८॥ दशभिश्च पलैरत्र सेरस्त्वाधुनिकः स्मृतः । अशीतितोलकमितः स एव सेरकः स्मृतः ॥६९॥ अथ मानपरिभाषा—योगान् मृत्युञ्जयरसप्रभृतीन् । वसुसंख्या अष्टमिता, “अष्टौ वसव” इति स्मरणात् । रविसंख्यातैः द्वादशभिः । सैव तिन्दुक इत्यत्र सन्धिः “सैष दाशरथी रामः” इतिवत् । दशभिश्च पलैरिति पलस्याष्टतोलकमि- तत्त्वात् । आधुनिकः वर्त्तमाने प्रचलितः ॥ ६०–६६ ॥ भा.टी.—वैद्य को किसी योग को बनाने के पूर्व मान (तौल) का ज्ञान करना अत्यन्त आवश्यक है । अतएव योगनिर्माण में सफलता और सरलता प्राप्त करने के लिए मानपरिभाषा लिखी जाती है । छः सफेद सरसों के बरा- बर एक जौ का मान होता है । तीन यव की एक गुञ्जा या रत्ती होती है । आठ रत्तियों का एक मासा होता है । और बारह मासे का एक तोला होता है । इसी तोले को संस्कृत में वटक, क्षुद्रक और द्रंक्षण भी कहते हैं । दो तोले को एक कर्ष होता है । इसी कर्ष का तिन्दुक, अक्ष, विडालपदक, कव- लग्रह तथा सुवर्ण भी कहते हैं । दो कर्ष अर्थात् चार तोले को अर्धपल, शुक्ति, अष्टमिका और पलार्द्ध भी कहते हैं । दो शुक्ति अर्थात् आठ तोले को एक पल, मुष्टि, षोंडिका, चतुर्थिका, बिल्व और प्रकुञ्च भी कहते हैं । दो पल