रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ रसतरङ्गिणी ( १६ तोला ) को प्रसृत अथवा प्रसूति कहते हैं । दो प्रसुतियों ( ३२ तोला ) का एक कुडव अथवा अञ्जलि होती है । दो कुड़वों का एक शराव ( ६४ तोला ) होता है । इसी को मानिका तथा अष्टपल भी कहते हैं । दश पल ( ८० तोला ) का आजकल का एक सेर होता है जिसमें अस्सी तोले होते हैं । इसी को सेरक भी कहते हैं ॥ ६०-६६ ॥ वक्तव्य—मानपरिभाषा के विषय में बहुत मतभेद देखा जाता है । अतः इस विषय में विस्तृत रूप से देखना हो तो परिभाषाप्रदीप शाङ्गधर आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए ॥ ६०-६६ ॥ धन्वन्तरिभागः अर्द्धं सिद्धरसादीनां तथैव घृततैल्योः । पादस्तु मृतधात्वादेरवदेहस्य चाष्टमः ॥७०॥ भागस्तुरीयोऽरिष्टादेश्चूर्णादीनाञ्च सप्तमः । भिषग्वराय लोकेस्मिन् स्वास्थ्यमङ्गलकाम्यया ॥७१॥ धन्वन्तरिं विनिर्दिश्य रोगिभिर्दीयते तु यः । पूर्वाचार्यैः समाख्यातो भागो धन्वन्तरेस्तुः सः ॥ ७२ ॥ प्राचीनक्रमाद् धन्वन्तरिभागो निगद्व्याख्यातः ॥ ७०-७२ ॥ भा.टी.-रोगी के वैद्य के द्वारा रसादि औषधि बनवाने पर उस औषधि में से जो भाग वैद्य को परिश्रम के रूप में या प्रसन्न करने के लिए तथा अपने स्वास्थ्य को पूर्व रूप में प्राप्त करने के लिए धन्वन्तरि ( प्रधान आदि वैद्य ) के नाम पर वैद्य को दिया जाता है उसे "धन्वन्तरिभाग" कहते हैं। भिन्न-भिन्न औषधि का निम्नलिखित रूप से धन्वन्तरिभाग दिया जाता है । बनवाये हुए रसों में से आधा भाग वैद्य को देना धन्वन्तरि का माना जाता है । घी तथा तेलों का भी आधा भाग धन्वन्तरि के नाम पर दिया जाता है । रस तथा धातुओं की भस्म में से चतुर्थांश, च्यवनप्राश आदि अवलेहों का अष्टमांश, आसव अरिष्टों का चतुर्थांश, चूर्ण वटी आदि का सातवाँ भाग धन्वन्तरिभाग के नाम से कहा और दिया जाता है ॥ ७०-७२ ॥ विश्वासघातको वैद्यः भागाद्धन्वन्तरेर्लोभादधिकं यो हरेद्भिषक् । दद्याच्च भेषजं दुष्टं स वै विश्वासघातकः ॥ ७३ ॥ भा.टी.-जो वैद्य लोभवश धन्वन्तरि भाग से अधिक भाग लेता है अथवा