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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

द्वितीयस्तरङ्गः २५ वसुसंख्योन्मिताभिश्च रक्तिकाभिस्तु माषकः । माषकैः रविसंख्यातैस्तोलकं परिकीर्तितम् ॥६२॥ वटकः क्षुद्रकश्चैव द्रंक्षणश्च प्रकीर्तितः । तोलकद्वितयेनेह कर्षः स्यात्सैव तिन्दुकः ॥६३॥ अक्षः स एव कथितो विडालपदकं तथा । कवलग्रहसंज्ञश्च सुवर्णश्च निगद्यते ॥६४॥ कर्षद्वयं त्वर्द्धपलं स्याच्छुक्तिश्च निगद्यते । मता चाष्टमिका सैव पलार्द्धञ्च प्रकीर्तितम् ॥६५॥ शुक्तिभ्यान्तु पलं ज्ञेयं मुष्टिः षोडशिका च सा । चतुर्थिका च बिल्वञ्च प्रकुञ्चश्च निगद्यते ॥६६॥ पलाभ्यां प्रसृतं ज्ञेयं प्रसृतिश्च निगद्यते । प्रसृतिभ्यां समाख्यातः कुडवश्चाञ्जलिः स्मृतः ॥६७॥ कुडवाभ्यां शरावः स्यात् मानिका च निगद्यते । तदेवाष्टपलं ख्यातं रसतन्त्रे विचक्षणैः ॥६८॥ दशभिश्च पलैरत्र सेरस्त्वाधुनिकः स्मृतः । अशीतितोलकमितः स एव सेरकः स्मृतः ॥६९॥ अथ मानपरिभाषा—योगान् मृत्युञ्जयरसप्रभृतीन् । वसुसंख्या अष्टमिता, “अष्टौ वसव” इति स्मरणात् । रविसंख्यातैः द्वादशभिः । सैव तिन्दुक इत्यत्र सन्धिः “सैष दाशरथी रामः” इतिवत् । दशभिश्च पलैरिति पलस्याष्टतोलकमि- तत्त्वात् । आधुनिकः वर्त्तमाने प्रचलितः ॥ ६०–६६ ॥ भा.टी.—वैद्य को किसी योग को बनाने के पूर्व मान (तौल) का ज्ञान करना अत्यन्त आवश्यक है । अतएव योगनिर्माण में सफलता और सरलता प्राप्त करने के लिए मानपरिभाषा लिखी जाती है । छः सफेद सरसों के बरा- बर एक जौ का मान होता है । तीन यव की एक गुञ्जा या रत्ती होती है । आठ रत्तियों का एक मासा होता है । और बारह मासे का एक तोला होता है । इसी तोले को संस्कृत में वटक, क्षुद्रक और द्रंक्षण भी कहते हैं । दो तोले को एक कर्ष होता है । इसी कर्ष का तिन्दुक, अक्ष, विडालपदक, कव- लग्रह तथा सुवर्ण भी कहते हैं । दो कर्ष अर्थात् चार तोले को अर्धपल, शुक्ति, अष्टमिका और पलार्द्ध भी कहते हैं । दो शुक्ति अर्थात् आठ तोले को एक पल, मुष्टि, षोंडिका, चतुर्थिका, बिल्व और प्रकुञ्च भी कहते हैं । दो पल

२६ रसतरङ्गिणी ( १६ तोला ) को प्रसृत अथवा प्रसूति कहते हैं । दो प्रसुतियों ( ३२ तोला ) का एक कुडव अथवा अञ्जलि होती है । दो कुड़वों का एक शराव ( ६४ तोला ) होता है । इसी को मानिका तथा अष्टपल भी कहते हैं । दश पल ( ८० तोला ) का आजकल का एक सेर होता है जिसमें अस्सी तोले होते हैं । इसी को सेरक भी कहते हैं ॥ ६०-६६ ॥ वक्तव्य—मानपरिभाषा के विषय में बहुत मतभेद देखा जाता है । अतः इस विषय में विस्तृत रूप से देखना हो तो परिभाषाप्रदीप शाङ्गधर आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए ॥ ६०-६६ ॥ धन्वन्तरिभागः अर्द्धं सिद्धरसादीनां तथैव घृततैल्योः । पादस्तु मृतधात्वादेरवदेहस्य चाष्टमः ॥७०॥ भागस्तुरीयोऽरिष्टादेश्चूर्णादीनाञ्च सप्तमः । भिषग्वराय लोकेस्मिन् स्वास्थ्यमङ्गलकाम्यया ॥७१॥ धन्वन्तरिं विनिर्दिश्य रोगिभिर्दीयते तु यः । पूर्वाचार्यैः समाख्यातो भागो धन्वन्तरेस्तुः सः ॥ ७२ ॥ प्राचीनक्रमाद् धन्वन्तरिभागो निगद्व्याख्यातः ॥ ७०-७२ ॥ भा.टी.-रोगी के वैद्य के द्वारा रसादि औषधि बनवाने पर उस औषधि में से जो भाग वैद्य को परिश्रम के रूप में या प्रसन्न करने के लिए तथा अपने स्वास्थ्य को पूर्व रूप में प्राप्त करने के लिए धन्वन्तरि ( प्रधान आदि वैद्य ) के नाम पर वैद्य को दिया जाता है उसे "धन्वन्तरिभाग" कहते हैं। भिन्न-भिन्न औषधि का निम्नलिखित रूप से धन्वन्तरिभाग दिया जाता है । बनवाये हुए रसों में से आधा भाग वैद्य को देना धन्वन्तरि का माना जाता है । घी तथा तेलों का भी आधा भाग धन्वन्तरि के नाम पर दिया जाता है । रस तथा धातुओं की भस्म में से चतुर्थांश, च्यवनप्राश आदि अवलेहों का अष्टमांश, आसव अरिष्टों का चतुर्थांश, चूर्ण वटी आदि का सातवाँ भाग धन्वन्तरिभाग के नाम से कहा और दिया जाता है ॥ ७०-७२ ॥ विश्वासघातको वैद्यः भागाद्धन्वन्तरेर्लोभादधिकं यो हरेद्भिषक् । दद्याच्च भेषजं दुष्टं स वै विश्वासघातकः ॥ ७३ ॥ भा.टी.-जो वैद्य लोभवश धन्वन्तरि भाग से अधिक भाग लेता है अथवा

लोभवश औषधि में असली औषध न डालकर मामूली औषधि डालता है और बहुमूल्य औषधि की कीमत रोगी से लेता है वह विश्वासघातक वैद्य कहा जाता है ॥ ७३ ॥ इयमिह रसत्तन्त्रागाधरत्नाकराध् । परिचितपरिभाषामूल्यरत्नानि चित्वा। रुचिरतरनिवेशा गुम्फिता कण्ठमाला भवतु विबुधकण्ठालम्बिनी सा नितान्तम् ॥ ७४ ॥ इति परिभाषाविज्ञानीयो नाम द्वितीयस्तरङ्गः । इयमिहेत्यादिनोपसंहारः—रसत्तन्त्रमेवागाधो रत्नाकरस्तस्मात् परिचिताः व्यावहारिक्यः परिभाषा एव अमूल्यानि रत्नानि, चित्वा एकत्रीकृत्य, 'रत्नमाला' इति युक्तः पाठ औचित्यात् , विबुधकंठावलम्बिनी विद्वत्कंठीकृता ॥ ७४ ॥ भा.टी.—यहाँ पर रसशास्त्र रूपी अगाध समुद्र में से विशेष रूप से व्यव- हार में आनेवाली जो परिभाषा लिखी हैं, वे सदा वैद्यों को कण्ठस्थ होनी चाहिए ताकि योगनिर्माण तथा औषधि-प्रयोग में गलती न हो ॥ ७४ ॥ इति परिभाषाविज्ञानीय नाम द्वितीय तरङ्ग समाप्त हुआ ।

**अथ मूषादिविज्ञानीयस्तृतीयस्तरङ्गः**
**मूषानामानि**
मूषा हि कुमुदी ख्याता प्रोक्ता कुमुदिका च सा ।
क्रौञ्चिका वह्निमित्रा च पाचनी च निगद्यते ॥१॥
मुष्णाति दोषान् यस्मात्सा तस्मान्मूषा प्रकीर्तिता।
कुमुदाकारसादृश्यात् कुमुदी च निगद्यते ॥२॥
वह्निर्मित्रं यतश्चास्या वह्निमित्रा ततः स्मृता ।
द्रव्यपाचनयोगाच्च पाचनी समुदीरिता ॥३॥
ज्ञानसौलभ्याय मूषापर्यायाः समानप्रवृत्तिनिमित्तत्वात्। नाम्नामर्थपरीक्षणा-
न्मौलिकताद्योतनार्थम् । मुष्णाति अपनयति दोषान् तन्मध्यपतितद्रव्याणामग्नि-
संयोगात् तस्मान्मूषा । कुमुदो रात्रिपुष्पश्चन्द्रदयितस्तस्याकारो वर्त्तुलह्रस्वविकस्व-
रास्यस्तत्साहश्याद् गौणं नाम “सिंहो माणवक” इतिवत् , क्रौञ्चिकातन्मुखा-
कारसामान्यात् , वह्निमित्रा साहचर्य्यात् , पाचनी द्रव्यपाचनात् ॥ १-३ ॥

२८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—मूषा को कुमुदी, कुमुदिका, क्रोञ्चिका, वह्निमित्रा तथा पाचनी नाम से कहा जाता है अर्थात् मूषा के यह पर्यायवाचक नाम हैं। क्योंकि मूषा उसमें रखकर तपाये या पकाये हुए द्रव्य के दोषों को हर लेती है अतः उसे मूषा कहते हैं। रात्रि में खिलनेवाले कमल पुष्प के समान आकार होने से मूषा को कुमुदी कहते हैं। क्योंकि मूषा को अग्नि मित्र होती है अर्थात् अग्नि में मूषा नहीं जलती है अतः उसे वह्निमित्र कहते हैं। इसमें द्रव्य रखकर पकाया जाता है अतः इसे पाचनी भी कहते हैं ॥ १-३ ॥ वक्तव्य—व्यवहार में मूषा को घरिया कहते हैं यह प्रायः सोनारों के पास सोना चाँदी को गलाने के काम आती है। पिधानम् द्रव्यपूरितमूषादेः द्रव्यपातन्निवृत्तये । आच्छादकं भवेद् यत्तु पिधानं तदिहोच्यते ॥ ४ ॥ द्रव्यपूरितमूषादेरित्यपादाने पञ्चमी। द्रव्यस्य पातः बहिरुच्छलनं, तन्निवर्तकं पिधानकम् ॥ ४ ॥ भा.टी.—मूषा, पुट या हाँडी आदि में द्रव्य भरकर उस द्रव्य को बाहर गिरने से बचाने के लिये अथवा उठाने-रखने में सुविधा के लिए मूषा आदि के मुख पर जो ढक्कन दिया जाता है उसे "पिधा" कहते हैं ॥ ४ ॥ सन्धिलेपनम् मूषादीनां तु यत्सन्धौ किट्टाद्यैः स्याद्विलेपनम् । तत्सन्धिलेपनं ख्यातं तच्चोक्तं सन्धिबन्धनम् ॥ ५ ॥ सन्धिलेपनं व्याख्यासमम् ॥ ५ ॥ भा.टी—मूषा आदि यंत्र और उसके ढक्कन के जोड़ पर छिद्र को बन्द करने के लिये जो लोह कीट्ट, मिट्टी आदि से लेप किया जाता है उसे सन्धि- लेपन या सन्धिबन्धन कहा जाता है ॥ ५ ॥ मूषानिर्माणोचिता मृत्तिका. सशर्करा पाण्डुरा च वह्नितापसहा चिरम् । स्थूला च मृत्तिका या स्यान् मूषार्थं सा मतोत्तमा ॥६॥ सशर्करा स्फुटनभयराहित्यात्, वह्नितापसहा वह्नौ स्फुटनावर्जिता ॥ ६ ॥ भा. टी.—मूषा बनाने के लिये कुछ रेतीली पाण्डुर वर्ण मोटे कणों की देर तक अग्नि सहन करनेवाली मिट्टी अच्छी समझनी चाहिए ॥ ६ ॥

तृतीयस्तरङ्गः २६ सामान्यमूषा शिखित्रकैर्दग्धतुषैः शणेन सलद्दिका दण्डसुकुट्टिता च। या मृत्तिका तद्विहिता तु मूषा सामान्यमूषा कथिता रसज्ञैः ॥७॥ शिखित्रकैर्जलनिर्वापितैरङ्गारैः। लद्दिका घोटकपुरीषम्। दण्डेन मुसला- दिना सामान्यमूषेत्यनुक्तविशेषमूषास्थाने ग्राह्या ॥ ७ ॥ भा.टी.-बुझे हुए कोयले, तुष की राख, सूक्ष्म शण के रेशे और घोड़े की लीद; इन सबको एकत्र मिलाकर मूसली या हथौड़ी से अच्छी तरह कूटकर बनाई हुई मिट्टी के द्वारा निर्माण की हुई मूषा को सामान्य मूषा कहते हैं ॥७॥ वक्तव्य—जहाँ पर किसी मूषा का नाम न दिया हो वहाँ उक्त प्रकार से बनी हुई सामान्य मूषा को काम में लाना चाहिए। वज्रमूषा त्रयो भागा मृदो द्वौ तु शणलद्दिकयोस्तथा। भागो दग्धतुषादेश्च किट्टस्य त्वर्ध एव च ॥८॥ एभिः कृता तु या मूषा वज्रमूषा तु सा मता। प्रयुज्यते विशेषेण सत्त्वपातनकर्मणि ॥ ६ ॥ वज्रमूषा कठिनतायां वज्रतुल्या, यथाभागं मृत्तिकाशणादिक्षेपश्च सुश्ल- क्षणताहेतुः व्यपगतस्फुटनभयो निर्माणसुखश्चेति ॥ ८, ६ ॥ भा.टी.—तीन भाग मिट्टी, एक भाग शण, एक भाग घोड़े की लीद, एक भाग तुष आदि की राख, आधा भाग लोह कीट (मण्डूर); इन सब को एकत्र मिलाकर खूब कूटकर बनाई मूषा को वज्रमूषा कहते हैं। यह मूषा अभ्रक हीरा आदि कठिन द्रव्यों के सत्त्व पातन करने के निमित्त विशेष रूप से व्यवहार में ली जाती है ॥ ८, ६ ॥ वक्तव्य—इस प्रकार से बनी हुई मूषा वज्र के समान दृढ़ होने से वज्र मूषा शब्द से कही जाती है। इसके बनाने में कोई दो भाग शण तथा दो भाग घोड़े की लीद लेते हैं। योगमूषा तुषाद्यैश्च बिडाद्यैश्च कृता चापि विलेपिता। सूतसिद्धिकरी चैषा योगमूषा निगद्यते ॥ १० ॥ सूतसिद्धकरी पारदसाधनकरिका ॥ १० ॥ भा.टी.-तुषभस्म, कोयले, बाँबी की मिट्टी तथा क्षार, अम्ल गन्धक,

३० रसतरङ्गिणी लवण आदि विड द्रव्यों से मूषा बनाकर फिर इस मूषा को उक्त द्रव्यों के ही कल्क से अच्छी तरह तीन चार लेप करके सुखा लेवें । इस मूषा को योगमूषा कहते हैं । इस मूषा द्वारा पारद मारण किया जाता है ॥ १० ॥ वज्रद्रावणिका मूषा समैर्भूनागगाराद्यैस्तुषाद्यैश्चापि निर्मिता । क्षीरैश्च माहिषैर्मूषा वज्रद्रावणिका मता ॥ ११ ॥ वज्रद्रावणिका मूषा वज्रसत्त्वप्रसाधिका । यामद्वयमपि ध्माता नासौ द्रवति कर्हिचित् ॥ १२ ॥ भूनागः कञ्चुलिकस्ताम्रवर्णः कीटविशेषः सरीसृपो वर्षासु जायमानः । गारो जलप्लुता मृत्तिका । यामद्वयमपि ध्मातेति अत्यन्तदृढेत्यर्थः ॥११, १२॥ भा.टी.-सूखे केंचुए, गारा तथा तुष भस्म आदि को सम भाग में लेकर भैंस के दूध के साथ मर्दन करके बनाई मूषा को वज्रद्रावणिका मूषा कहते हैं । यह मूषा वज्र (हीरा) के सत्त्वपातन करने में काम आती है । छः घण्टे निर- न्तर अग्नि देने पर भी यह पिघलती या जलती नहीं है ॥११, १२॥ वक्तव्य-तन्त्रान्तर में इस मूषा को चार पहर की अग्नि सहन करनेवाली लिखा है और इसका निर्माण निम्न प्रकार से लिखा है "गारभूनागधौताभ्यां तुषमष्टशणेन च । समैः समा च मूषामृन्महिषोद्दुग्धमर्दिता ॥ तया विरचिता मूषा लिप्ता मत्कुणशोणितैः । बालाऽब्दध्वनिमूलैश्च वज्रद्रावणक्रौञ्चिका । सह- तेऽग्निं चतुर्यामं द्रवेण व्यथिता सती ॥" गारमूषा दग्धषड्गुणगारेण मृदा चासितया तु या । विधीयते च किट्टाद्यैर्गारमूषा तु सा मता ॥१३॥ यामयुग्ममपि ध्माता नासौ द्रवति निश्चितम् । ढालनादौ विशेषेण रसज्ञैः सा प्रयुज्यते ॥१४॥ असितया कृष्णया ॥१३, १४॥ भा.टी.-काली मिट्टी एक भाग, तुषभस्म या गारा छः भाग लेकर उसमें आवश्यकतानुसार लोह कीट तथा शण आदि मिलाकर बनाई हुई मूषा को गारमूषा कहते हैं । छः घण्टे निरन्तर अग्नि में रखकर तपाने से भी यह नहीं पिघलती है । और यह मूषा विशेषा कर धातु को पिघलाकर ढालने के काम में आती है ॥ १३, १४ ॥

तृतीयस्तरङ्गः ३१ वक्तव्य—रसरत्नसमुच्चय में इसका लक्षण निम्न प्रकार से बहुत स्पष्ट मिलता है। और "दग्ध” स्थान पर "दुग्ध” पाठ मिलता है "दुग्धषड्गुणगा- राष्ट्रकिट्टाङ्गारशणान्विता । कृष्णमृद्भिः कृता मूषा गरमूषेत्युदाहृता ॥” गोस्तनीमूषा सापिधाना शिखोपेता गोस्तनाकारसन्निभा । सत्त्वद्रावणशुद्ध्यर्था सा मूषा गोस्तनोमता* ॥१५॥ शिखोपेता शिखायुक्ता, ग्रहणसौकर्यार्थ ॥ १५ ॥ भा. टी.—गोस्तन के आकार की एक मूषा बनाकर उसके मुख पर रखने के लिए एक ऐसा पिधान ( ढकन ) बनायें जो नीचे को चौड़ा और ऊपर की तरफ पतला शिखाकार हो । इसे गोस्तनी मूषा कहते हैं। यह मूषा अभ्रक आदि सत्त्वों के द्रावण तथा शुद्धि के काम आती है ॥ १५ ॥ मल्लमूषा सम्पुटाकारतां नीता मल्लद्वितययोजनात् । मल्लमूषा समाख्याता पर्पट्यादिप्रसाधिका ॥ १६ ॥ मल्लद्वितयं = चषकयुगम् । पर्पट्यादिप्रसाधिकेति न स्वर्णपर्पट्यादिसाधन- मत्राभिप्रेतम्, अपि तु विशिष्टो रसः कश्चित् । यथा रसरत्नसमुच्चये त्रैलोक्य- सुन्दरः— “विमर्दिताभ्यां रसगन्धकाभ्यां नीरेण कुर्यादिह गोलकन्तु। भाण्डे नवीने विनिवेश्य पश्चात्तद्गोलकस्योपरि ताम्रपात्रम् ॥ सार्धंमुहूर्त्तं विनिरुध्य धीमानुद्दी- पयेद्दीप्तकृशानुनास्य । अधस्ततः सिद्ध्यति पर्पटीयं नवज्वरारण्यकृशानुमेषः ॥” इति॥ १६ ॥ भा. टी.—दो गोल प्यालों को आपस में जोड़ कर संपुट के रूप में बना लेने को मल्लमूषा कहा जाता है । इसके द्वारा पर्पटीरस आदि रसों को बनाया जाता है ॥ १६ ॥ महामूषा वर्तुला चिपिटा मूले स्थूला चायामविस्तरा । विस्तृतास्या च या मूषा महामूषा तु सा मता ॥१७॥ लोहाभ्रताप्यसत्त्वादेः पुटनार्थं भिषग्वरैः । प्रयुज्यते महामूषा स्थूलमूषा च सा स्मृता ॥१८॥

  • इयमेव मूषा रसार्णवे अन्धमूषाख्यया प्रतिपादिता । तथा हि— “अन्धमूषा तु कर्तव्या गोस्तनाकारसन्निभा । पिधानकसमायुक्ता किञ्चिदुन्नत मस्तका” ॥ १ ॥

३२ रसतरङ्गिणी आयामविस्तरेति आयामे विस्तारे च समा, विस्तृतं आस्यं मुखं यस्याः सा विस्तृतास्या ॥ १७, १८ ॥ भा.टी.-एक ऐसा पात्र जिसकी लम्बाई-चौड़ाई सम भाग हो और मूल (नीचे की तरफ) में गोल और चपटा (जिससे जमीन में अच्छी तरह स्थिर रह सके) हो औ मोटा हो ऊपर मुख की तरफ बहुत खुला हुआ हो तो उसे महामूषा कहते हैं। इसी को स्थूलमूषा भी कहा जाता है। इस मूषा को वैद्यलोग लोह, अभ्रक, स्वर्णमाक्षिक के सत्त्वादि को पुट देने के लिए काम में लाते हैं ॥ १७, १८ ॥ वृन्ताकमूषा धत्तूरपुष्पाकारेण सच्छिद्राष्टाङ्गुलेन च । नालेन तूर्ध्वतः श्लिष्टां सुदृढ़ं द्वादशाङ्गुला ॥१६॥ वृन्ताकसदृशाकारा मूषा वृन्ताकभूषिका । साधयेत्खर्परादीनां सत्त्वं वै मूषयाऽनया ॥२०॥ वृन्ताकमूषायां धत्तूरपुष्पाभनालनिर्देशः सत्वपातसुखार्थः नालस्थ विस्तृतं मुखं मूषामुखे सन्धिवन्धनं विधेयम् ॥ १६, २० ॥ भा.टी.-बारह अंगुल लम्बी चौड़ी बैंगन के आकार की एक मूषा बनायें इसके मुख में आने योग्य एक ऐसा ढक्कन बनायें जो धतूरे के फूल के सदृश ऊपर को चौड़ा और नीचे को पतला आठ अंगुल लम्बी नलीवाला हो जिससे मूषा में द्रव्य भरकर धतूर-आकार ढक्कन को उसमें जोड़कर अग्नि में रखा जाता है। इस प्रकार से बनाई हुई मूषा को बैंगन के समान आकार होने से वृन्ताकमूषा कहते हैं। इसके द्वारा खर्पर आदि द्रव्यों का सत्त्वपातन आदि कार्य किया जाता है ॥ १६-२० ॥ मूषाप्यायनकम् द्रव्ये द्रवोन्मुखे जाते मूषाया वह्नियोगतः । निष्कासनं क्षणं यत्तु तन्मूषाप्यायनं मतम् ॥२१॥ मूषाऽप्यायनं मूषारक्षार्थमौषधदाहनिवारणार्थञ्च । द्रवोन्मुखे जात इति तदानीं मूषाऽऽप्यायनकालो नार्वाक् ॥ २१ ॥ भा.टी.--मूषा में द्रव्य रखकर अग्नि में रखने पर जब द्रव्य मिलने लगता है थोड़ी देर के लिये उसे बाहर निकालने को मूषाप्यायन कहते हैं। इससे मूषा में अग्निसहनशक्ति बढ़ जाती है ॥ २१ ॥

३ तृतीयस्तरङ्गः ३३ अङ्गारधानिका अङ्गारधानिका ख्याता हसन्ती च हसन्तिका । अङ्गारशकटी चापि हसनी च निगद्यते ॥२२॥ अङ्गारधानिका ह्येषा मृदुद्रव्यप्रसाधिका । वङ्गादीनां ढालनादौ विशेषेण प्रयुज्यते ॥२३॥ अङ्गारधानिका यथार्थनाम्नी । उज्ज्वलनासादृश्याद् हसन्ती च ॥२२ २३॥ भा.टी.—कोयलों की अँगेठी को अङ्गारधानिका, हसन्ती, हसन्तिका, अँगारशकटी और हसनी नाम से कहा जाता है । यह अँगेठी मृदु द्रव्यों के लगाने और पकाने के काम आती है, विशेष रूप से राँगा तथा वंग को पिघला कर शोधन या ढालन के काम आती है ॥ २२-२३ ॥ कोष्ठिका सत्त्वादियातनार्थं द्रव्यढालनसाधिका । वह्निसन्धानिका या तु कोष्ठिका सा निगद्यते ॥२४॥ वह्निसन्धानिका सर्वतोऽवरुद्धवह्नितया सम्यग्द्रव्यतापक्री ॥ २४ ॥ भा.टी.—सत्त्वादि के पातनार्थ तथा पिघले हुए द्रव्यों के ढालनार्थ जो कोयलों की भट्टी बनायी जाती है उसे कोष्ठिका कहते हैं । इसमें चारों तरफ से रुकावट होने से अग्नि अधिक तीव्र होती है ॥ २४ ॥ अङ्गारकोष्ठिका नृपहस्तमितोत्सेधे तदर्धाय्यामविस्तृता । मध्यतश्चतुरस्रा च मृदा च परिलेपिता ॥२५॥ चतुरङ्गुलमानेन रन्ध्रेण परिशोभिता । नालिकां समकोणाञ्च रन्ध्रे तिर्यङ् निवेशयेत् ॥२६॥ नालिकाया मुखे चैव भस्त्रावक्त्रं निवेशयेत् । आपूर्य कोकिलैः कोष्ठीं द्रव्यमूषान्वितां धमेत् ॥२७॥ अङ्गारकोष्ठिका ख्याता द्रव्यढालनसाधिका । सत्त्वानां पातने चेयं विशेषाद्विनियुज्यते ॥२८॥ उत्सेधे = उच्चतायां, नृपहस्तमिता = सपादहस्तपरिमाणा, चतुरस्रा = चतुष्कोणा ॥ २५-२८ ॥ भा.टी.—समतल जमीन के ऊपर एक ऐसी भट्टी बनायें जो नृपहस्त (एक गज) ऊँची और आधा गज चौड़ी (बीच में खाली जगहवाली)

३४ | रसतरङ्गिणी

हो । बीच का यह आधा गज रिक्तस्थान गोल न होकर चतुष्कोण होना चाहिए। अर्थात् भीतरी चारों कोने एक हाथ गहरे और चौड़े हों। अब इस भट्ठी की भीतरी और बाहर की दीवारों को चिकनी मिट्टी से अच्छी तरह लीप दिया जाय जिससे अग्नि बाहर न जाने पाये। फिर इस भट्ठी की एक दीवार में तलप्रदेश पर एक चार अंगुल गोल छिद्र बनायें। इस छिद्र में एक लोहे या बाँस की समकोण गोल नली लगा दें, नली में बाहर की तरफ से चमड़े की धौंकनी का मुख जोड़ दें और भट्ठी में कोयले डालकर उन पर द्रव्ययुक्त मूषा रखकर अग्नि जलाकर धौंकें। इस प्रकार से बनी हुई कोष्ठी को अंगारकोष्ठी कहते हैं। यह कोष्ठी द्रव्यों के ढालनार्थ प्रयुक्त होती है और सत्त्वपातन कार्य में विशेष रूप से काम आती है ॥ २५-२८ ॥ वक्तव्य-नृपहस्त से सवा हाथ का भी ग्रहण किया जाता है। अतः सवा हाथ ऊँची और १५ अंगुल चौड़ी गड़रवाली कोष्ठी बनायी जा सकती है। रसरत्नसमुच्चय में निम्न प्रकार से अंगारकोष्ठी का वर्णन है जो इससे कुछ भिन्न है-"राजहस्तसमुत्सेधा तदर्द्धायमविस्तरा। चतुरस्रा च कुब्जेन वेष्टिता मृन्मयेन च ॥ एकभित्तौ न्वरेद् द्वारं वितस्त्याभोगसंयुतम्। द्वारं सार्द्धवितस्त्या च सम्मितं सुदृढं शुभम् ॥ देहल्यधो विधातव्यं धमनाय यथोचितम्। प्रादेशप्र- मिता भित्तिरुत्तरङ्गस्य चोर्ध्वतः॥ द्वारं चोपरि कर्तव्यं प्रादेशप्रमितं खलु। ततश्चैष्टकया रुद्ध्वा द्वारसन्धि विलिप्य च ॥ शिखित्रैस्तान् समापूर्य घमेदस्रा- द्वयेन च। शिखित्रान् धमनद्रव्यमूर्ध्वद्वारेण निक्षिपेत् ॥ सत्वपातनगोलांश्च पञ्च पञ्च पुनः पुनः। भवेदंगारकोष्ठियं खराणां सत्त्वपातिनी ॥" पातालकोष्ठिका वितस्तिविस्तृतं गर्तं भूमौ कुर्याद्विधानतः । तन्मध्ये वर्तुलं छिद्रं निम्नवेशे प्रकल्पयेत् ॥२६॥ गर्तमध्यगते छिद्रे तिर्यङ् नालं निवेशयेत् । नालवक्त्रे च भस्त्राया मुखं सम्यङ् निरोधयेत् ॥३०॥ द्रव्यमूषां कोष्ठिकायां निधाय भस्त्रया धमेत् । पातालकोष्ठिका ह्येषा मृदुद्रव्यप्रसाधिका ॥ ३१ ॥ वितस्तिविस्तृतं = द्वादशाङ्गुलमानम् । तदुक्तम्—"पातालकोष्ठिका ह्येषा मृदूनां सत्वपातनी। ध्मानसाध्यपदार्थानां नन्दिना परिकीर्तिता" ॥ २६-३१ ॥ आ.टी.-जमीन पर एक ऐसा गढ़ा बनायें जो एक बालिश्त ( बारह

तृतीयस्तरङ्गः ३५ अंगुल) लम्बा और उतना ही चौड़ा गोल हो। अब गढ़े के मध्यप्रदेश में चार अंगुल चौड़ा गोल एक और छिद्र बनायें जिसका मुख बाहर की तरफ तिरछा होना चाहिए। इस तिरछे मुखवाले निम्नगर्त के मुख पर निचले सिरे से ऊपर पृथ्वी तक तिरछी नली लगाकर इन नली का मुख धौंकनी के मुख के साथ अच्छी तरह जोड़ दें। अब कोष्ठ में कोयलों के ऊपर द्रव्ययुक्त मूषा रख के धौंकनी से धौंकें। इसे पातालकोष्ठी कहते हैं। इसके द्वारा मृदुद्रव्यों का सत्त्वपातन आदि कार्य किया जाता है॥ २६-३१॥ वक्तव्य-रसरत्नसमुच्चय में इस कोष्ठी के विषय में इतनी विशेषता लिखी हुई है कि "बीच के छिद्र के ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला मिट्टी का प्याला या फलक रख दिया जाता है।" अथ पुटलक्षणम् रसोपरसलोहादेः पाकमानप्रसापकम्। उत्पलाद्यग्निसंयोगात् यत्तदत्र पुटं स्मृतम्॥३२॥ अथ क्रमप्राप्तं पुटलक्षणमाह-रसः पारदः, उपरसोऽभ्रादयः, लोहाः सुवर्णादयः, तेषां पाको वह्निसंयोगेन गुणान्तरपरिणामः, तस्य मानज्ञापकम्, उत्पलादित्यत्रादिना तुषादिग्रहः॥ ३२॥ आ.टी.-रस उपरस धातु उपधातुओं में से किसको कितनी बार कितनी अग्नि से पकाया गया है इस बात को सूचित करने के लिए जो औषधि को सम्पुट में बन्दकर न्यून या अधिक उपले-तुष आदि की अग्नि दी जाती है उसे "पुट" कहा जाता है॥ ३२॥ वक्तव्य-प्रत्येक उपरस धातु आदि अपनी-अपनी अग्निताप-सहन शक्ति रखता है। उसके अनुसार उसे उतनी ही अग्नि देने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के पुटों की आवश्यकता होती है जिससे कि वह न अधिक नन्यून रूप से पकने पाये। इसी अभिनय को लेकर रसरत्नसमुच्चय में भी लिखा है-"रसादि- द्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम्। नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः, सुपाकं हितमौषधम्॥" पुटप्रयोजनम् अवेद्यतः पुटादेव दोषहानिर्गुणोदयः। रसोपरसलोहानां पुटपाकस्ततः स्मृतः॥ ३३॥ पुटपाकेन लोहादेर्निरुत्थत्वञ्च दीपनम्। अभेद्यारितरत्वञ्च पुटपाकस्ततः स्मृतः॥ ३४॥

३६ रसतरङ्गिणी मृतलोहादिकं यस्मादतिशेते मृतं रसम् । पुटपाकविधानेन पुटं तस्मात्प्रशस्यते ॥३५॥ अथ विशिष्टं प्रयोजनम्—दोषाणां रोगहेतूनाम् , गुणानां=रोगापनयन- शक्तीनाम् । दीपनं = तीव्रगुणता । तदुक्तम्—“रसादिद्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम् । नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः सुपाकं हितमौषधम् ॥ लोहादेरपुनर्भावो गुणा- धिक्यं ततोऽप्यता । नचाप्सु मज्जनं रेखापूर्णता पुटतो भवेत् ॥ पुटाद्रागो लघुत्वञ्च शीघ्रं व्याप्तिश्च दीपनम् ॥ जारितादपि सूतेन्द्रालोहानाधिको गुणः”॥३३-३५॥ भा०टी०—क्योंकि पुट द्वारा पाक करने पर रस, उपरस, धातु आदि में स्थित विभिन्न प्रकार के रोगोत्पादक दोषों का नाश होता है, और भिन्न-भिन्न औषधियों के योग से उनमें (धात्वादि में) रोगनाशक शक्ति की उत्पत्ति होती है । अतः पुटपाक करना आवश्यक होता है । इसके अतिरिक्त पुटपाक द्वारा लोह आदि की भस्म निरुत्थ हो जाती है और उसमें दीपनता (गुणों में तीव्रता) आ जाती है । इसके द्वारा बनी हुई भस्म वारितर हो सकती है । अतः पुट- पाक की आवश्यकता होती है । इसके अतिरिक्त सम्यक् पुटपाक विधान से भी बनी हुई धातु आदि की भस्म कई बार पारद की भस्म की अपेक्षा अधिक गुणकारी सिद्ध होती है ॥३३-३५॥ वक्तव्य—योग्य अग्नि न मिलने पर भस्म कच्ची रह जाती है जो अन्तः- प्रयोग करने पर शरीर की जीवनशक्ति या सेलों को नष्ट करती हैं, जिससे उदर-सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः शीघ्रता तथा अल्प प्रयास द्वारा एक साथ ही तीव्र अग्नि देकर बनाई हुयी औषधियाँ लाभदायक नहीं होती हैं । वैज्ञानिकों का यह मत है कि प्रत्येक पदार्थ आकाश की तरफ ऊपर को डालने पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे पृथ्वी की ओर आता है । पुट देने से पदार्थ की यह अधोगमन शक्ति कम हो जाने से उसकी भस्म आमा- शयादि अंगों में देर तक रहेगी जिससे उसका परिपाक ठीक होकर सूक्ष्मरूप से शरीर में अधिक-से-अधिक मात्रा में शोषित होकर रक्त में मिल सारे शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में होनेवाली विकृति को दूर करने में समर्थ होती है । अतः पुटप्रयोग विधान आयुर्वेदीय रसशास्त्र का एक अद्भुत विज्ञान है । सामान्यपुटक्रमः मूषागते तु लोहादौ पुटनीये विशेषतः । वह्निस्तु स्वानुकूल्येन तथा स्यात्तु पुटक्रमः ॥ ३६ ॥

तृतीयस्तरङ्गः ३७ सूर्यपुटलक्षणम् द्रव्याणां भावितानान्तु भावनौषधजै रसैः ॥ शोषणां सूर्यतापे यत्तत्सूर्यपुटमुच्यते ॥ ३७ ॥ भा. टी. — आवश्यकतानुसार पुट इस प्रकार देना चाहिए जिससे मूषा या सम्पुट में रखे हुए पुटनीय लोह आदि धातु में दी जानेवाली अग्नि सुविधा के साथ पुटनीय द्रव्य के सर्वांश में ठीक-ठीक रूप से पहुँच सके ॥३६॥ भावना देनेवाली औषधियों के स्वरस कषाय आदि से द्रव्यों को भावित कर या तर करके धूप में रखकर सुखाने को सूर्यपुट कहते हैं । इसीको रौद्रपुट भी कहा जाता है ॥ ३७ ॥ महापुटम् व्यामार्द्धनिम्ने चतुरस्ररूपे हस्तद्वयायाममिते च कुण्डे । वन्योत्पलापूरितगर्भभागे मूषां निदध्यात्पुटनीयपूर्णाम् ॥३८॥ पुनस्तु विन्यस्य वनोत्पलानि सम्पूरयेत्कुण्डमुखं रसज्ञः । सन्दीष्य वह्निं पुटनं ततस्तन्महापुटाख्यं विबुधैः प्रदिष्टम् ॥३९॥ व्यामो नाम विस्तारितबाहुयुगस्य पुंसः दक्षिणहस्तमध्यमाङ्गुल्यग्रभागाद् वामहस्तमध्यमाङ्गुल्यग्रभागपर्य्यन्तं दीर्घता । “चतुरशीत्यङ्गुलो व्यामः” इति कौटिल्यः । 'व्यामो बाह्वोः...रन्तरमि'त्यमरश्च ॥ ३८-३९ ॥ भा. टी. — आधा व्याम ( दोनों हाथों को सीधा फैलाकर जितनी लम्बाई हो उसे व्याम करते हैं ) गहरे और दो हाथ चौड़े गोल गढ़े को महापुट कहा जाता है । इस गढ़े के आधे भाग में जंगली उपले भरकर उन पर द्रव्य सम्पुट रख दें और अवशिष्ट ऊपर के आधे भाग को फिर उपलों से भर दें, फिर इसमें अग्नि देकर पुट दें ॥ ३८-३९ ॥ वक्तव्य—पुटों को जमीन में यदि ईंटों से बनाया जाय तो उनके टूटने का डर नहीं रहता है और अग्नि अच्छी तरह लगती है । पुट में आधे उपले भरकर मूषा या सम्पुट रखकर अग्नि देनी चाहिए । फिर और उपले भरने चाहिये । इससे दोनों तरफ अग्नि एक साथ लगती है । गजपुटम् नृपकरचतुरस्रोत्सेधदैर्घ्ये तु कुण्डे छगणगणभृतार्द्धे मूषिकां स्थापयित्वा । पुटनमिह भवेत्तच्छाणपूर्णोऽद्धेभागे गजपुटमिह तन्त्रे भाषितं तद्रसज्ञैः ॥४०

३८ रसतरङ्गिणी गजपुटन्तु नृपकरचतुरस्रोत्सेधदीर्घं सपादहस्तं सर्वत इत्यर्थः। छागणशङ्काणो वन्योपल इत्यर्थान्तरम् ॥ ४० ॥ भा.टी.—एक गज या सवा हाथ गहरे और चौड़े गढ़े में आधे भाग तक उपलों से भरकर मूषा रख दें और फिर आधे भाग को उपलों से भर कर अग्नि देने को गजपुट कहा जाता है । यही पुट साधारण रूप से अभ्रक लोह आदि द्रव्यों को पुट देने में काम आता है ॥ ४० ॥ वाराहपुटम् कुण्डे त्वरत्निमानेन चतुरस्रे तथोच्छ्रिते । पुटं यद् दीयते तच्च वाराहपुटमुच्यते ॥ ४१ ॥ अरत्निः विस्तृतकनिष्ठिको मुष्टिः ॥ ४१ ॥ भा.टी.--भूमि में एक अरत्नि लम्बा चौड़ा और गहरा एक गढ़ा खोद कर उसके आधे भाग में जंगली उपले भरकर उन पर मूषा को टिकाकर अवशेष भाग को पुनः उपलों से भरकर पुट देने को वाराहपुट कहा जाता है ॥ ४१ ॥ वक्तव्य--हाथ की कोहनी से लेकर सबसे छोटी हाथ की अंगुली तक की लम्बाई को अरत्नि शब्द से लिया जाता है । यह लगभग बीस या इक्कीस अंगुल लम्बी होती है । कुक्कुटकपुटम् वितस्तिद्वयमानेन निम्ने च चतुरस्रके । पुटं यद्दीयते तत्त मतं कुक्कुटकं बुधैः ॥ ४२ ॥ वितस्तिः = द्वादशाङ्गुलः ॥ ४२ ॥ भा.टी.—दो बालिस्त गहरे चौड़े गढ़े में उपले भरकर पुट देने को कुक्कुटपुट कहते हैं ॥ ४२ ॥ वक्तव्य--वितस्ति १२ अंगुल की होतीं है । कोई वैद्य जमीन के ऊपर ही उक्त प्रकार से पुट देने को कुक्कुटपुट कहते हैं । परन्तु जमीन के अन्दर देना अधिक लाभदायक है । कपोतपुटम् वन्योत्पलैरष्टसंख्यैः क्षितौ यद्दीयते पुटम् । रसादीनान्तु सिद्ध्यर्थं तत्कपोतपुटं स्मृतम् ॥ ४३ ॥ क्षितौ इति न विनैव गर्ते, किन्तु ईषदगर्त्तं विधायेत्यर्थः ॥ ४३ ॥

तृतीयस्तरङ्गः ३६ आ.टी.—जमीन के ऊपर आठ जंगली उपलों से रसादिकों की सिद्धि के निमित्त जो पुट दिया जाता है उसे कपोतपुट कहते हैं ॥ ४३ ॥ गोर्वरपुटम् गोर्वरैर्वा तुषैर्वापि खलु कुण्डेऽथवा क्षितौ । पुटं यद्दीयते विज्ञैस्तद् गोर्वरपुटं स्मृतम् ॥४४॥ भाण्डपुटम् मूषागर्भे तुषापूर्णे स्थूले भाण्डेऽग्नियोजनात् । दीयते यत्पुटं विज्ञैस्तद् भाण्डपुटमुच्यते ॥४५॥ वालुकापुटम् प्रतप्तवालुकागर्भे न्यस्य मूषादिकं दृढम् । यद् दीयते पुटं तत्त वालुकापुटमुच्यते ॥४६॥ स्थूले भाण्डे कुसूलादौ ॥ ४४-४६ ॥ आ.टी.—जमीन के गढ़े अथवा किसी पात्र में गोबर चूर्णं या तुष भर कर बीच में मूषा रख दें और अग्नि जला दें। इस प्रकार के पुट को गोबर- पुट कहा जाता है ॥४४॥ एक दृढ़ मोटे मिट्टी के पात्र के भीतर आधे भाग में धान जौ आदि के तुष भर उनके ऊपर मूषा रखकर शेष भाग को भी तुषों से भरकर अग्नि जलायी जाती है ; इस प्रकार से जो पुट दिया जाता है उसे भाण्डपुट कहते हैं ॥४५॥ पुटनद्रव्ययुक्त मूषा को ऊपर नीचे गरम-गरम रेत से आच्छादित कर देना वालुकापुट कहाता है ॥ ४६ ॥ वक्तव्य-अथवा एक दृढ़ मिट्टी के पात्र में आधा रेत भरकर उस पर मूषा आदि रख ऊपर और रेत भर दें और एक शराव ( सिकोरा ) से पात्र का मुख बन्दकर सन्धि लेप कर दें और पात्र को अग्नि में रखकर पकावें । अथवा पात्र में रेत को भरकर रेत ऊपर जंगली उपले रखकर उनको अग्नि देवें । ये तीन प्रकार वालुकापुट के हैं । भूधरपुटम् भूमिगर्भे कुमुदिकां विन्यस्य द्व्यङ्गुलोपरि । यद् दीयते पुटं त्ततु पुटं भूधरसंज्ञकम् ॥४७॥ द्वयङ्गुलोपरि अङ्गुलयुगमितां वालुकामापूर्य तदुपरीत्यर्थः । कुमुदिका मूषा । मूषाया उपरि समन्ततश्चापि द्व्यङ्गुलमिता वालुका पूरणीया ॥ ४७ ॥

भा.टी.—जमीन में एक ऐसा गढ़ा बनावे जिसमें मूषा या सम्पुट के अनुसार नीचे-ऊपर चारों तरफ दो अंगुल स्थान खाली रहे । अर्थात् गढ़े में पहिले दो अंगुल रेत भरे और उस पर फिर मूषा रख देवे । अब मूषा के ऊपर दो अंगुल और चारों तरफ के दो अंगुल रिक्त स्थान को भी वालुका से भर दे और इसके ऊपर अग्नि देकर पुट दे। इसको भूधरपुट कहते हैं॥४७॥ वक्तव्य—तन्त्रान्तर में भूधरपुट का स्पष्ट लक्षण इस प्रकार लिखा है— “वालुकागूढसर्वाङ्गीं गर्ते मूषां रसान्विताम्। दीप्तोपलैः संवृणुयाद् यन्त्रं तद्भू- धराह्नयम्॥” चित्र से यह स्पष्ट हो जाता है । लावकपुटम् गोर्वरैर्वा तुषैर्वापि वितस्त्यूर्ध्वं पुटन्तु यत् । मृदुद्रव्यप्रसिद्ध्यर्थं दल्लावकपुटं मतम् ॥४८॥ पुटमानानुक्तौ पुटप्रदानप्रकारः पुटनामनामनिर्देशे वीक्ष्य द्रव्यबलाबलम् । पुटेष्वन्यतमं दद्यात् यत्स्याद्युक्ततमं भृशम् ॥४६॥ उपलनामानि उपलं चोत्पलं ख्यातं गिरिएडं पिष्टकं तथा । छागणञ्च छगणञ्चैव करीषञ्च निगद्यते ॥५०॥ लावकपुटेऽपि सर्वतः वितस्तिप्रामैतैः गोर्वरैस्तुषैर्वा मूषाऽऽच्छादनीया । अन्यत्स्पष्टम् ॥ ४८-५० ॥ भा.टी.—साधारण मृदु द्रव्यों को पकाने के लिए जमीन के ऊपर एक बालिस्त ऊँचा चौड़ा गोबर या तुषों का ढेर बनाकर उसके भीतर सम्पुट या मूषा रखकर पुट देने को लावकपुट कहा जाता है ॥ ४८ ॥ किसी द्रव्य को पुट देने के लिए यदि कहीं पर पुट का नाम न दिया गया हो तो द्रव्य की कठिन और मृदु प्रकृति को देख कर युक्तिपूर्वक उपर्युक्त पुटों में से किसी एक पुट की कल्पना खुद कर लेनी चाहिए ॥ ४६ ॥ उपलों ( गोहरे ) को उत्पल, गिरिएड, पिष्टक, छाण, छगण तथा करीष नाम से कहा जाता है । अर्थात् उपलों के ये पर्यायवाची शब्द या नाम हैं ॥ ५० ॥ इति मूषादिविज्ञानीय नाम तृतीय तरङ्ग समाप्त हुआ ।

चतुर्थस्तरङ्गः ४१ अथ यन्त्रविज्ञानीयश्चतुर्थस्तरंगः यन्त्रलक्षणम् रसोपरसलोहाद्य। मारणाद्यर्थसिद्धये । यन्त्र्यन्तेऽनेन यस्मात्तु तस्माद् यन्त्रं प्रकीर्तितम् ॥१॥ अथादौ यन्त्रलक्षणम्—मारणशोधनादौ रसादिनियमनप्रयोजनं यन्त्र- मिति निष्कर्षः । तदुक्तं रसवाग्भटे-“स्वेदादि कर्म निर्मातुं वर्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः । यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम्” ॥ १ ॥ भा.टी.—पारद, उपरस, धातु आदि के मारण, शोधन, स्वेदन आदि क्रियाओं को करते हुए मारण आदि क्रियाओं की सफलता के लिए अर्थात् रस आदि को गिरने, उड़ने या जलने आदि से बचाने के लिए जिन उपायों और उपकरणों का प्रयोग किया जाता है उसे यन्त्र कहते हैं ॥ १ ॥ वक्तव्य-रसवाग्भट में यन्त्र का लक्षण इस प्रकार लिखा है कि “स्वेदा- दिकर्म निर्मातुं वर्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः । यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम् ॥” यन्त्र की यन्त्र्यते, नियम्यते, बध्यते, रक्ष्यते वा पारदादिरनेनोपायेन तद्यन्त्रम्”—यह व्युत्पत्ति कही जाती है ॥ दोला यन्त्र

४२ रसतरङ्गिणी दोलायन्त्रलक्षणम् सूतादिकं स्वेदनीयं निक्षिपेत् त्रिगुणाम्बरे । स्फीतकेन निरुध्याथ पोट्टलीं कारयेद् भृशम् ॥ पूरितार्द्धोदरे भाण्डे द्रवैस्तन्मुखपार्श्वयोः । रन्ध्रद्वयं विधायाथ तत्र दण्डं विनिक्षिपेत् ॥३॥ दण्डमध्ये तु सुदृढं बध्नीयाद् द्रव्यपोट्टलीम् । गुरुदर्शितमार्गेण वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥४॥ स्वेदयेच्च ततश्चैतद् दोलायन्त्रमिति स्मृतम् । द्रव्याणां शोधनाद्यर्थं विशेषेण नियुज्यते ॥५॥ त्रिगुणाम्बरे त्रिपुटीकृतवस्त्रे, केचित्तु वस्त्रमध्येऽपि भूर्जपत्रादिकं निधाय तत्र सूतादिप्रक्षेपमाहुः सम्प्रदायात् । स्फीतकेन “फीता” इति भाषाप्रसिद्धेन, सुदृढं बध्नीयादिति यथा तलस्पर्शो न भवति । शोधनाद्यर्थमिति आदिशब्देन दीपदादावपि प्रयुज्यते यथा दीपने—“निक्षिप्याथ दिनद्वयं बुधवरो दोलाख्य- यन्त्रे पचेत्” । उत्थापने च—“क्षाराद्यैः स्वेदयेत्सम्यग् दोलायन्त्रे भिषग्वरः” इति च वक्ष्यते पञ्चमतरङ्गे ॥ २-५ ॥ भा. टी.—पारद आदि स्वेदनीय द्रव्यों को तीन तहवाले कपड़े में रख- कर पोटली बनाकर उसको एक मजबूत फीते या डोरी से बाँध लें । अब एक हाँड़ी या पतेली लें, इसमें आधे भाग तक लिखित क्वाथ स्वरस आदि भर दें और पतेली या हाँड़ी के गले में दोनों तरफ आमने-सामने एक एक छेद कर उसमें एक मजबूत लकड़ी या सींक डाल दें । अब इस लकड़ी या डंडे के बीच भाग में उक्त औषधि की पोटली को अच्छी तरह बाँधकर नीचे द्रव में लटका दें । और गुरु के द्वारा बताये हुए विधान से इस हाँड़ी को अग्नि के ऊपर रखकर पकावें और द्रव्य का स्वेदन करें । इस विधि से बनाये हुए यन्त्र को दोलायन्त्र कहते हैं । यह यन्त्र द्रव्यों के शोधन आदि कर्म करने के लिए विशेष रूप से काम आता है ॥ २-५ ॥ वक्तव्य—दोलायन्त्र में यदि कोई द्रव वस्तु जैसे पारद का स्वेदन करना हो उसे खाली कपड़े में न रखकर पहिले भोजपत्र में रखें, फिर कपड़े में रखकर पोटली बनानी चाहिए । पोटली द्रव में इस प्रकार लटकनी चाहिए कि जिससे हाँड़ी का द्रव पोटली के आधा ऊपर और आधा नीचे रहे । इस प्रकार ज्यों- ज्यों द्रव कम होता जाय पोटली को भी नीचे ढीली करते जायँ, जब

चतुर्थस्तरङ्गः ४३ द्रवभाव सूख जाय तब पोटली को निकाल लेना चाहिए । पोटली के द्रव्य को अच्छी तरह स्वेद पहुँचाने के लिए कई वैद्य हाँडी के मुख पर एक शराव या पात्र भी रखने को कहते हैं । ऊर्ध्वपातनयन्त्रम् द्वादशाङ्गुलमुखी सुवर्तुला सुदृढा च खलु गर्भविस्तृता । अङ्गुलद्वयमितौष्ठसंयुता पातने भवति निम्नगा घटी ॥७॥ उक्तसर्वगुणसंयुता तले छिद्रयुक्तदृढवृत्तिकान्विता । ऊर्ध्वगा च जठरोज्ज्वला घटी तूर्ध्वपातनविधौ प्रशस्यते ॥७॥ निम्नगायां रसं क्षिप्त्वा मेलयेदनयोर्मुखम् । सम्वेष्ट्य शोषयेत् सन्धि चुल्ल्यामारोपयेत्ततः ॥८॥ नलिकां वृत्तिकाछिद्रे न्यस्य सन्धि प्रलेपयेत् । वृत्तिमध्ये क्षिपेत्तोयं नलिकामुखमार्गतः ॥६॥ तप्तं निष्कासयेत्तोयं शीतलंञ्च विनिक्षिपेत् । रसज्ञैः कीर्तितमिदमूर्ध्वपातनयन्त्रकम् ॥१०॥ द्वयंगुलमित ओष्ठो मुखवृत्तिका यस्याः, तच्च सुष्ठु मुखसन्धानाय द्रव्यनिर्ग- मरोधाय च । अस्याश्च तलंबहिर्भागे जलस्थापनाय दृढा वृत्तिका एकतश्छिद्र- युता कार्या, सा च जलमृत्स्नया विधातव्या, यद्वा तादृशवृत्तिकायुक्तमेव भाण्डं ग्राह्यम् । जलमृत्तिकालक्षणं यथा--“लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम् । जीर्णकिट्टरर्जः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम् । इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु ॥” जठरञ्चास्या औषधनैर्मल्याय उज्ज्वलं निर्मलं विधेयम् । वृत्तिकाछिद्रे नलिकान्यास उष्णीभूतजलनिष्कासनार्थः । अन्यत् सुगमम् ॥ ६-१० ॥ भा. टी.—एक गोल मजबूत हाँड़ी लें, जो मुख में बारह अंगुल चौड़ी और विस्तृत गर्भवाली हो । उसके मुख में किनारे दो अंगुल चौड़े होने चाहिए । एक और पूर्वोक्त प्रकार की दूसरी हाँड़ी लें इसके भी भीतर से अच्छी तरह रगड़कर साफ कर लें । इसके बाहरी तल प्रदेश में जलमृत्तिका द्वारा चार अंगुल ऊँचा चौड़ा एक थाला या जलाधार बनायें और इसके एक किनारे पर नीचे एक अंगुल छेद बनाकर उसमें एक नली लगा दें और नली के मुख को एक डाट से बन्द रखे । अब पहिले की हाँड़ी को सीधा रखकर उसमें औषधियों के साथ मर्दित पारद भर दें । अब इसके ऊपर दूसरी थांलावाली हाँड़ी अधोमुख ( औंधी ) रख के दोनों के मुख की सन्धि

३४ रसतरङ्गिणी ...र कपड़मिट्टी करके अच्छी तरह सुखा लें। अब इस यन्त्र को चूल्हे पर रख कर नीचे अग्नि जलावें। ऊपर की हाँड़ी के थांले में जल भर दें। जब थांले का पानी गरम हो जाय उसे नली का डाट खोलकर निकाल दें और फिर डाट बन्द करके थांले में शीतल जल भर दें। इस विधि से अग्नि देने पर पारद धीरे-धीरे उड़कर ऊपर की हाँड़ी के भीतरी पेंदे में चिपक जाता है। जिसे ठण्डा होने पर खोलकर भीतरी प्रदेश को रगड़कर निकाला जाता है। पारद को इस विधि से ऊपर उड़ाने के लिए काम में आनेवाले यन्त्र को ऊर्ध्वपातन यन्त्र कहते हैं॥ ६-१०॥ वक्तव्य—ऊपर की हांड़ी में थांला (आलवाल) जलमृत्तिका से बनायें अथवा इस प्रकार बना बनाया पात्र ही ले लेना चाहिए। जलमृत्तिका का लक्षण इस प्रकार लिखा है—"लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम्। जीर्णांकिट्ट- रजः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम्। इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु॥" ऊर्ध्वपातन यन्त्र