रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयस्तरङ्गः ३६ आ.टी.—जमीन के ऊपर आठ जंगली उपलों से रसादिकों की सिद्धि के निमित्त जो पुट दिया जाता है उसे कपोतपुट कहते हैं ॥ ४३ ॥ गोर्वरपुटम् गोर्वरैर्वा तुषैर्वापि खलु कुण्डेऽथवा क्षितौ । पुटं यद्दीयते विज्ञैस्तद् गोर्वरपुटं स्मृतम् ॥४४॥ भाण्डपुटम् मूषागर्भे तुषापूर्णे स्थूले भाण्डेऽग्नियोजनात् । दीयते यत्पुटं विज्ञैस्तद् भाण्डपुटमुच्यते ॥४५॥ वालुकापुटम् प्रतप्तवालुकागर्भे न्यस्य मूषादिकं दृढम् । यद् दीयते पुटं तत्त वालुकापुटमुच्यते ॥४६॥ स्थूले भाण्डे कुसूलादौ ॥ ४४-४६ ॥ आ.टी.—जमीन के गढ़े अथवा किसी पात्र में गोबर चूर्णं या तुष भर कर बीच में मूषा रख दें और अग्नि जला दें। इस प्रकार के पुट को गोबर- पुट कहा जाता है ॥४४॥ एक दृढ़ मोटे मिट्टी के पात्र के भीतर आधे भाग में धान जौ आदि के तुष भर उनके ऊपर मूषा रखकर शेष भाग को भी तुषों से भरकर अग्नि जलायी जाती है ; इस प्रकार से जो पुट दिया जाता है उसे भाण्डपुट कहते हैं ॥४५॥ पुटनद्रव्ययुक्त मूषा को ऊपर नीचे गरम-गरम रेत से आच्छादित कर देना वालुकापुट कहाता है ॥ ४६ ॥ वक्तव्य-अथवा एक दृढ़ मिट्टी के पात्र में आधा रेत भरकर उस पर मूषा आदि रख ऊपर और रेत भर दें और एक शराव ( सिकोरा ) से पात्र का मुख बन्दकर सन्धि लेप कर दें और पात्र को अग्नि में रखकर पकावें । अथवा पात्र में रेत को भरकर रेत ऊपर जंगली उपले रखकर उनको अग्नि देवें । ये तीन प्रकार वालुकापुट के हैं । भूधरपुटम् भूमिगर्भे कुमुदिकां विन्यस्य द्व्यङ्गुलोपरि । यद् दीयते पुटं त्ततु पुटं भूधरसंज्ञकम् ॥४७॥ द्वयङ्गुलोपरि अङ्गुलयुगमितां वालुकामापूर्य तदुपरीत्यर्थः । कुमुदिका मूषा । मूषाया उपरि समन्ततश्चापि द्व्यङ्गुलमिता वालुका पूरणीया ॥ ४७ ॥