भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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भा.टी.—जमीन में एक ऐसा गढ़ा बनावे जिसमें मूषा या सम्पुट के अनुसार नीचे-ऊपर चारों तरफ दो अंगुल स्थान खाली रहे । अर्थात् गढ़े में पहिले दो अंगुल रेत भरे और उस पर फिर मूषा रख देवे । अब मूषा के ऊपर दो अंगुल और चारों तरफ के दो अंगुल रिक्त स्थान को भी वालुका से भर दे और इसके ऊपर अग्नि देकर पुट दे। इसको भूधरपुट कहते हैं॥४७॥ वक्तव्य—तन्त्रान्तर में भूधरपुट का स्पष्ट लक्षण इस प्रकार लिखा है— “वालुकागूढसर्वाङ्गीं गर्ते मूषां रसान्विताम्। दीप्तोपलैः संवृणुयाद् यन्त्रं तद्भू- धराह्नयम्॥” चित्र से यह स्पष्ट हो जाता है । लावकपुटम् गोर्वरैर्वा तुषैर्वापि वितस्त्यूर्ध्वं पुटन्तु यत् । मृदुद्रव्यप्रसिद्ध्यर्थं दल्लावकपुटं मतम् ॥४८॥ पुटमानानुक्तौ पुटप्रदानप्रकारः पुटनामनामनिर्देशे वीक्ष्य द्रव्यबलाबलम् । पुटेष्वन्यतमं दद्यात् यत्स्याद्युक्ततमं भृशम् ॥४६॥ उपलनामानि उपलं चोत्पलं ख्यातं गिरिएडं पिष्टकं तथा । छागणञ्च छगणञ्चैव करीषञ्च निगद्यते ॥५०॥ लावकपुटेऽपि सर्वतः वितस्तिप्रामैतैः गोर्वरैस्तुषैर्वा मूषाऽऽच्छादनीया । अन्यत्स्पष्टम् ॥ ४८-५० ॥ भा.टी.—साधारण मृदु द्रव्यों को पकाने के लिए जमीन के ऊपर एक बालिस्त ऊँचा चौड़ा गोबर या तुषों का ढेर बनाकर उसके भीतर सम्पुट या मूषा रखकर पुट देने को लावकपुट कहा जाता है ॥ ४८ ॥ किसी द्रव्य को पुट देने के लिए यदि कहीं पर पुट का नाम न दिया गया हो तो द्रव्य की कठिन और मृदु प्रकृति को देख कर युक्तिपूर्वक उपर्युक्त पुटों में से किसी एक पुट की कल्पना खुद कर लेनी चाहिए ॥ ४६ ॥ उपलों ( गोहरे ) को उत्पल, गिरिएड, पिष्टक, छाण, छगण तथा करीष नाम से कहा जाता है । अर्थात् उपलों के ये पर्यायवाची शब्द या नाम हैं ॥ ५० ॥ इति मूषादिविज्ञानीय नाम तृतीय तरङ्ग समाप्त हुआ ।