रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
तृतीयस्तरङ्गः ३६ आ.टी.—जमीन के ऊपर आठ जंगली उपलों से रसादिकों की सिद्धि के निमित्त जो पुट दिया जाता है उसे कपोतपुट कहते हैं ॥ ४३ ॥ गोर्वरपुटम् गोर्वरैर्वा तुषैर्वापि खलु कुण्डेऽथवा क्षितौ । पुटं यद्दीयते विज्ञैस्तद् गोर्वरपुटं स्मृतम् ॥४४॥ भाण्डपुटम् मूषागर्भे तुषापूर्णे स्थूले भाण्डेऽग्नियोजनात् । दीयते यत्पुटं विज्ञैस्तद् भाण्डपुटमुच्यते ॥४५॥ वालुकापुटम् प्रतप्तवालुकागर्भे न्यस्य मूषादिकं दृढम् । यद् दीयते पुटं तत्त वालुकापुटमुच्यते ॥४६॥ स्थूले भाण्डे कुसूलादौ ॥ ४४-४६ ॥ आ.टी.—जमीन के गढ़े अथवा किसी पात्र में गोबर चूर्णं या तुष भर कर बीच में मूषा रख दें और अग्नि जला दें। इस प्रकार के पुट को गोबर- पुट कहा जाता है ॥४४॥ एक दृढ़ मोटे मिट्टी के पात्र के भीतर आधे भाग में धान जौ आदि के तुष भर उनके ऊपर मूषा रखकर शेष भाग को भी तुषों से भरकर अग्नि जलायी जाती है ; इस प्रकार से जो पुट दिया जाता है उसे भाण्डपुट कहते हैं ॥४५॥ पुटनद्रव्ययुक्त मूषा को ऊपर नीचे गरम-गरम रेत से आच्छादित कर देना वालुकापुट कहाता है ॥ ४६ ॥ वक्तव्य-अथवा एक दृढ़ मिट्टी के पात्र में आधा रेत भरकर उस पर मूषा आदि रख ऊपर और रेत भर दें और एक शराव ( सिकोरा ) से पात्र का मुख बन्दकर सन्धि लेप कर दें और पात्र को अग्नि में रखकर पकावें । अथवा पात्र में रेत को भरकर रेत ऊपर जंगली उपले रखकर उनको अग्नि देवें । ये तीन प्रकार वालुकापुट के हैं । भूधरपुटम् भूमिगर्भे कुमुदिकां विन्यस्य द्व्यङ्गुलोपरि । यद् दीयते पुटं त्ततु पुटं भूधरसंज्ञकम् ॥४७॥ द्वयङ्गुलोपरि अङ्गुलयुगमितां वालुकामापूर्य तदुपरीत्यर्थः । कुमुदिका मूषा । मूषाया उपरि समन्ततश्चापि द्व्यङ्गुलमिता वालुका पूरणीया ॥ ४७ ॥
भा.टी.—जमीन में एक ऐसा गढ़ा बनावे जिसमें मूषा या सम्पुट के अनुसार नीचे-ऊपर चारों तरफ दो अंगुल स्थान खाली रहे । अर्थात् गढ़े में पहिले दो अंगुल रेत भरे और उस पर फिर मूषा रख देवे । अब मूषा के ऊपर दो अंगुल और चारों तरफ के दो अंगुल रिक्त स्थान को भी वालुका से भर दे और इसके ऊपर अग्नि देकर पुट दे। इसको भूधरपुट कहते हैं॥४७॥ वक्तव्य—तन्त्रान्तर में भूधरपुट का स्पष्ट लक्षण इस प्रकार लिखा है— “वालुकागूढसर्वाङ्गीं गर्ते मूषां रसान्विताम्। दीप्तोपलैः संवृणुयाद् यन्त्रं तद्भू- धराह्नयम्॥” चित्र से यह स्पष्ट हो जाता है । लावकपुटम् गोर्वरैर्वा तुषैर्वापि वितस्त्यूर्ध्वं पुटन्तु यत् । मृदुद्रव्यप्रसिद्ध्यर्थं दल्लावकपुटं मतम् ॥४८॥ पुटमानानुक्तौ पुटप्रदानप्रकारः पुटनामनामनिर्देशे वीक्ष्य द्रव्यबलाबलम् । पुटेष्वन्यतमं दद्यात् यत्स्याद्युक्ततमं भृशम् ॥४६॥ उपलनामानि उपलं चोत्पलं ख्यातं गिरिएडं पिष्टकं तथा । छागणञ्च छगणञ्चैव करीषञ्च निगद्यते ॥५०॥ लावकपुटेऽपि सर्वतः वितस्तिप्रामैतैः गोर्वरैस्तुषैर्वा मूषाऽऽच्छादनीया । अन्यत्स्पष्टम् ॥ ४८-५० ॥ भा.टी.—साधारण मृदु द्रव्यों को पकाने के लिए जमीन के ऊपर एक बालिस्त ऊँचा चौड़ा गोबर या तुषों का ढेर बनाकर उसके भीतर सम्पुट या मूषा रखकर पुट देने को लावकपुट कहा जाता है ॥ ४८ ॥ किसी द्रव्य को पुट देने के लिए यदि कहीं पर पुट का नाम न दिया गया हो तो द्रव्य की कठिन और मृदु प्रकृति को देख कर युक्तिपूर्वक उपर्युक्त पुटों में से किसी एक पुट की कल्पना खुद कर लेनी चाहिए ॥ ४६ ॥ उपलों ( गोहरे ) को उत्पल, गिरिएड, पिष्टक, छाण, छगण तथा करीष नाम से कहा जाता है । अर्थात् उपलों के ये पर्यायवाची शब्द या नाम हैं ॥ ५० ॥ इति मूषादिविज्ञानीय नाम तृतीय तरङ्ग समाप्त हुआ ।
चतुर्थस्तरङ्गः ४१ अथ यन्त्रविज्ञानीयश्चतुर्थस्तरंगः यन्त्रलक्षणम् रसोपरसलोहाद्य। मारणाद्यर्थसिद्धये । यन्त्र्यन्तेऽनेन यस्मात्तु तस्माद् यन्त्रं प्रकीर्तितम् ॥१॥ अथादौ यन्त्रलक्षणम्—मारणशोधनादौ रसादिनियमनप्रयोजनं यन्त्र- मिति निष्कर्षः । तदुक्तं रसवाग्भटे-“स्वेदादि कर्म निर्मातुं वर्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः । यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम्” ॥ १ ॥ भा.टी.—पारद, उपरस, धातु आदि के मारण, शोधन, स्वेदन आदि क्रियाओं को करते हुए मारण आदि क्रियाओं की सफलता के लिए अर्थात् रस आदि को गिरने, उड़ने या जलने आदि से बचाने के लिए जिन उपायों और उपकरणों का प्रयोग किया जाता है उसे यन्त्र कहते हैं ॥ १ ॥ वक्तव्य-रसवाग्भट में यन्त्र का लक्षण इस प्रकार लिखा है कि “स्वेदा- दिकर्म निर्मातुं वर्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः । यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम् ॥” यन्त्र की यन्त्र्यते, नियम्यते, बध्यते, रक्ष्यते वा पारदादिरनेनोपायेन तद्यन्त्रम्”—यह व्युत्पत्ति कही जाती है ॥ दोला यन्त्र
४२ रसतरङ्गिणी दोलायन्त्रलक्षणम् सूतादिकं स्वेदनीयं निक्षिपेत् त्रिगुणाम्बरे । स्फीतकेन निरुध्याथ पोट्टलीं कारयेद् भृशम् ॥ पूरितार्द्धोदरे भाण्डे द्रवैस्तन्मुखपार्श्वयोः । रन्ध्रद्वयं विधायाथ तत्र दण्डं विनिक्षिपेत् ॥३॥ दण्डमध्ये तु सुदृढं बध्नीयाद् द्रव्यपोट्टलीम् । गुरुदर्शितमार्गेण वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥४॥ स्वेदयेच्च ततश्चैतद् दोलायन्त्रमिति स्मृतम् । द्रव्याणां शोधनाद्यर्थं विशेषेण नियुज्यते ॥५॥ त्रिगुणाम्बरे त्रिपुटीकृतवस्त्रे, केचित्तु वस्त्रमध्येऽपि भूर्जपत्रादिकं निधाय तत्र सूतादिप्रक्षेपमाहुः सम्प्रदायात् । स्फीतकेन “फीता” इति भाषाप्रसिद्धेन, सुदृढं बध्नीयादिति यथा तलस्पर्शो न भवति । शोधनाद्यर्थमिति आदिशब्देन दीपदादावपि प्रयुज्यते यथा दीपने—“निक्षिप्याथ दिनद्वयं बुधवरो दोलाख्य- यन्त्रे पचेत्” । उत्थापने च—“क्षाराद्यैः स्वेदयेत्सम्यग् दोलायन्त्रे भिषग्वरः” इति च वक्ष्यते पञ्चमतरङ्गे ॥ २-५ ॥ भा. टी.—पारद आदि स्वेदनीय द्रव्यों को तीन तहवाले कपड़े में रख- कर पोटली बनाकर उसको एक मजबूत फीते या डोरी से बाँध लें । अब एक हाँड़ी या पतेली लें, इसमें आधे भाग तक लिखित क्वाथ स्वरस आदि भर दें और पतेली या हाँड़ी के गले में दोनों तरफ आमने-सामने एक एक छेद कर उसमें एक मजबूत लकड़ी या सींक डाल दें । अब इस लकड़ी या डंडे के बीच भाग में उक्त औषधि की पोटली को अच्छी तरह बाँधकर नीचे द्रव में लटका दें । और गुरु के द्वारा बताये हुए विधान से इस हाँड़ी को अग्नि के ऊपर रखकर पकावें और द्रव्य का स्वेदन करें । इस विधि से बनाये हुए यन्त्र को दोलायन्त्र कहते हैं । यह यन्त्र द्रव्यों के शोधन आदि कर्म करने के लिए विशेष रूप से काम आता है ॥ २-५ ॥ वक्तव्य—दोलायन्त्र में यदि कोई द्रव वस्तु जैसे पारद का स्वेदन करना हो उसे खाली कपड़े में न रखकर पहिले भोजपत्र में रखें, फिर कपड़े में रखकर पोटली बनानी चाहिए । पोटली द्रव में इस प्रकार लटकनी चाहिए कि जिससे हाँड़ी का द्रव पोटली के आधा ऊपर और आधा नीचे रहे । इस प्रकार ज्यों- ज्यों द्रव कम होता जाय पोटली को भी नीचे ढीली करते जायँ, जब
चतुर्थस्तरङ्गः ४३ द्रवभाव सूख जाय तब पोटली को निकाल लेना चाहिए । पोटली के द्रव्य को अच्छी तरह स्वेद पहुँचाने के लिए कई वैद्य हाँडी के मुख पर एक शराव या पात्र भी रखने को कहते हैं । ऊर्ध्वपातनयन्त्रम् द्वादशाङ्गुलमुखी सुवर्तुला सुदृढा च खलु गर्भविस्तृता । अङ्गुलद्वयमितौष्ठसंयुता पातने भवति निम्नगा घटी ॥७॥ उक्तसर्वगुणसंयुता तले छिद्रयुक्तदृढवृत्तिकान्विता । ऊर्ध्वगा च जठरोज्ज्वला घटी तूर्ध्वपातनविधौ प्रशस्यते ॥७॥ निम्नगायां रसं क्षिप्त्वा मेलयेदनयोर्मुखम् । सम्वेष्ट्य शोषयेत् सन्धि चुल्ल्यामारोपयेत्ततः ॥८॥ नलिकां वृत्तिकाछिद्रे न्यस्य सन्धि प्रलेपयेत् । वृत्तिमध्ये क्षिपेत्तोयं नलिकामुखमार्गतः ॥६॥ तप्तं निष्कासयेत्तोयं शीतलंञ्च विनिक्षिपेत् । रसज्ञैः कीर्तितमिदमूर्ध्वपातनयन्त्रकम् ॥१०॥ द्वयंगुलमित ओष्ठो मुखवृत्तिका यस्याः, तच्च सुष्ठु मुखसन्धानाय द्रव्यनिर्ग- मरोधाय च । अस्याश्च तलंबहिर्भागे जलस्थापनाय दृढा वृत्तिका एकतश्छिद्र- युता कार्या, सा च जलमृत्स्नया विधातव्या, यद्वा तादृशवृत्तिकायुक्तमेव भाण्डं ग्राह्यम् । जलमृत्तिकालक्षणं यथा--“लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम् । जीर्णकिट्टरर्जः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम् । इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु ॥” जठरञ्चास्या औषधनैर्मल्याय उज्ज्वलं निर्मलं विधेयम् । वृत्तिकाछिद्रे नलिकान्यास उष्णीभूतजलनिष्कासनार्थः । अन्यत् सुगमम् ॥ ६-१० ॥ भा. टी.—एक गोल मजबूत हाँड़ी लें, जो मुख में बारह अंगुल चौड़ी और विस्तृत गर्भवाली हो । उसके मुख में किनारे दो अंगुल चौड़े होने चाहिए । एक और पूर्वोक्त प्रकार की दूसरी हाँड़ी लें इसके भी भीतर से अच्छी तरह रगड़कर साफ कर लें । इसके बाहरी तल प्रदेश में जलमृत्तिका द्वारा चार अंगुल ऊँचा चौड़ा एक थाला या जलाधार बनायें और इसके एक किनारे पर नीचे एक अंगुल छेद बनाकर उसमें एक नली लगा दें और नली के मुख को एक डाट से बन्द रखे । अब पहिले की हाँड़ी को सीधा रखकर उसमें औषधियों के साथ मर्दित पारद भर दें । अब इसके ऊपर दूसरी थांलावाली हाँड़ी अधोमुख ( औंधी ) रख के दोनों के मुख की सन्धि
३४ रसतरङ्गिणी ...र कपड़मिट्टी करके अच्छी तरह सुखा लें। अब इस यन्त्र को चूल्हे पर रख कर नीचे अग्नि जलावें। ऊपर की हाँड़ी के थांले में जल भर दें। जब थांले का पानी गरम हो जाय उसे नली का डाट खोलकर निकाल दें और फिर डाट बन्द करके थांले में शीतल जल भर दें। इस विधि से अग्नि देने पर पारद धीरे-धीरे उड़कर ऊपर की हाँड़ी के भीतरी पेंदे में चिपक जाता है। जिसे ठण्डा होने पर खोलकर भीतरी प्रदेश को रगड़कर निकाला जाता है। पारद को इस विधि से ऊपर उड़ाने के लिए काम में आनेवाले यन्त्र को ऊर्ध्वपातन यन्त्र कहते हैं॥ ६-१०॥ वक्तव्य—ऊपर की हांड़ी में थांला (आलवाल) जलमृत्तिका से बनायें अथवा इस प्रकार बना बनाया पात्र ही ले लेना चाहिए। जलमृत्तिका का लक्षण इस प्रकार लिखा है—"लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम्। जीर्णांकिट्ट- रजः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम्। इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु॥" ऊर्ध्वपातन यन्त्र
चतुर्थस्तरङ्गः ४५ अधःपातनयन्त्रम् ऊर्ध्वपात्रान्तरे सूतं लिप्त्वाधः पात्रके जलम् । निक्षिप्य भूमौ गर्तञ्च विधाय विन्यसेद् दृढम् ॥ ११ ॥ प्रदीप्तैश्छगणैस्तत्र वह्निं प्रज्वालयेद् भृशम् । रसज्ञैः कीर्तितमिदमधः पातनयन्त्रकम् ॥ १२ ॥ ऊर्ध्वपात्रान्तरे सूतं लिप्त्वेति तत्तदौषधमर्दितस्य पारदस्य ऊर्ध्वपात्रोदरे लेपं विधायेत्यर्थः । अधःपात्रके जलं क्षिप्त्वा गर्ते जलपूरितमधःपात्रमेव सन्धि- बन्धः पूरणीयः । अथवाधोमुखीनतया स्थापितस्योर्ध्वभाण्डस्य सूतलिप्तान्तर्ज- ठरभागं बाह्यतो विहायान्यत्सर्वं यन्त्रं गर्ते दृढं स्थापनीयम् ॥ ११-१२॥ भा.टी.—अधःपातन यन्त्र के लिए भी उक्त प्रकार से दो हाँडी लें, परन्तु दूसरी हाँडी में जलाधार आदि कोई न बनावें । ऊपर की हाँडी के भीतर औषधियों के साथ मर्दित पारद का लेप कर दें और नीचे की हाँडी में आधे भाग तक या कण्ठ तक जल ( शीतल ) भर दें । अब जलवाली- हाँडी के मुख पर पारदवाली हाँडी को अधोमुख टिकाकर दोनों की मुख सन्धि को कपड़मिट्टी से अच्छी तरह लेप करके सुखा लें । अब जमीन में इतना लम्बा चौड़ा गढ़ा बनायें जिसमें कि निचली जलवाली हाँडी मुख अधःपातन यन्त्र
३६ रसतरङ्गिणी तक पूरी समा जाय। इसमें हाँडी को डालकर ऊपर की हाँडी के पेंदे में बाहर से उपलों की अग्नि देवें। इस प्रकार पारद ऊपर के अग्नितप से धीरे-धीरे नीचे जल में आगिरेगा। इसको अधःपातन यन्त्र कहते हैं ॥ ११-१२ ॥ वक्तव्य—कई वैद्य हाँडी को जमीन में इतना गाड़ते हैं जिसमें सम्पूर्ण नीचे की हाँडी और ऊपर की हाँडी का बीच का चौड़ा भाग जहाँ तक पारद का लेप किया हुआ है आ जाय। इस विधि से अग्नि देने में सुविधा रहती है। तिर्यक्पातनयन्त्रम् नतनाले घटे दीर्गे रसराजं विनिक्षिपेत्। तन्नालं योजयेदन्यकुम्भगर्भे प्रयत्नतः ॥ १३ ॥ रोधयेच्च यत्नेन रसगर्भघटीमुखम् । ततो रसघटस्याधो वह्निं प्रज्वालयेद् भृशम् ॥ १४ ॥ पूरयेच्च घटं त्वन्यं विमलैः शीतलैर्जलैः । यन्त्रमेतत्समाख्यातं तिर्यक्पातनसंज्ञकम् ॥ १५ ॥ तिर्यक्पातनयन्त्रम् सुगमम् ॥ १३-१५ ॥ भा.टी.-एक ऐसी लम्बे आकार की और आगे को कुछ झुकी हुई गर्दन- वाली (सुराही की तरह) हाँडी लें। और उसमें औषधि मर्दित पारद को डाल तिर्यक्पातन यन्त्र
चतुर्थस्तरङ्गः ५७
दें। अब इस हाँडी की ग्रीवा को एक दूसरी लम्बी ग्रीवावाली हाँडी (उसके साथ जुड़ी हुई) को चूल्हे के पास बनायी हुई ईंटों के चूल्हे के बराबर ऊँची चौकी पर रख दें। चूल्हे के नीचे अग्नि जलायें। पारद अग्नितप से उड़कर दूसरे रिक्त घड़े में जा गिरेगा। परन्तु इस रिक्त घड़े के ऊपर बाहर से शीतल जल से सिंचन करते रहना चाहिए। इस यन्त्र के द्वारा पारद का तिर्यक्पातन होता है अतः इसे तिर्यक्पातनयन्त्र कहते हैं॥ १३-१५॥ वक्तव्य—यदि दूसरे घड़े या हाँडी को पारदवाली हाँडी के साथ रिक्त न जोड़कर उसमें जल भर के जोड़ दें तो बाहर से जलसिंचन करने की आवश्यकता नहीं रहती है। अथवा इसके अतिरिक्त हाँडी को एक शीतल जल से भरे हुए टब में रखने से भी बाहर से जल डालने की आवश्यकता नहीं रहती है।
भस्मयन्त्रम् मृन्निर्मितं पात्रमिहाहरेद् दृढं वितस्तिगम्भीरमथोऽतिनूतनम् । भूत्यातदधं परिपूर्य यत्नात्तालादिगोलान् क्रमशो निदध्यात् ॥१६॥ निर्दिष्टभूत्यैव तदूर्ध्वभागं अपूर्य संमुद्रय च भाण्डवक्त्रम् । चुल्ल्यां निधायाग्निसथ प्रदद्यादेतन्मतं वै खलु भस्मयन्त्रम् ॥१७॥ अथ भस्मयन्त्रम्—मृन्निर्मितमिति धात्वादिपात्रव्यावृत्तिरतिवह्नितापभयात्, दृढं वह्नितापसहम्, वितस्तिगम्भीरं द्वादशाङ्गुलनिम्नम्, यत्नादितिभूतिस्तरका- ठिन्यार्थम्, भस्म चात्र व अपूतं सम्यक्श्वेतं कोकिलांशरहितञ्च ग्राह्यम्, सकोकिलं स्थालीनिहितं प्रस्फुटितस्तरं विकस्वरञ्च स्यात्, तथा चौषधधूमरोधो न सम्यग् जायेत। न सम्यक् श्वेतञ्चेत् पुनः पाकेन श्वेतं विधाय पश्चात्त्तस्य स्तरे पाक्य- द्रव्यचक्रिका निवेशनीया, मुखपर्यन्तञ्च भाण्डपूर्तिर्भस्मना कार्य्या ॥१६-१७॥ भा. टी.—एक मजबूत बारह अँगुल चौड़ी-गहरी नई हाँडी लें। अब इस हाँडी में आधे भाग तक पीपल छाल, अमलतास छाल, थोहर आदि किसी की भस्म अच्छी तरह दबा कर भरें। अब इसके ऊपर हरताल या संखिया आदि की टिकियाओं को अलग-अलग रखकर दबा दें। अब इनके ऊपर फिर उसी भस्म को दबा-दबाकर अच्छी हाँडी के मुख तक भर दें। अन्त में हाँडी के मुख पर एक सिकोरा रखकर उसको अच्छी तरह सन्धिलेप कर दें। अब इस हाँडी को चूल्हे पर रखकर निर्दिष्ट समय तक अग्नि देवें। इसीको भस्मयन्त्र कहते हैं॥ १६, १७॥
४८ रसतरङ्गिणी कच्छपयन्त्रस्य स्वरूपम् जलपूरितभाजनमध्यगते घटखर्परके विनिधाय रसम्। बलिमध्यगतं कुमुदीनिहितं चषकेण भृशं पिदधीत ततः ॥१८॥ कृतसन्धिविलेपनमम्बुमृदा खलु खादिरकोकिलकैर्ज्वलनम्। परिदीप्य भृशं सुपचेद् गदितं किल कच्छपसंज्ञकयन्त्रमिदम् ॥१९॥ बलिजारणसिद्धयर्थं यन्त्रं कच्छपसंज्ञकम्। समाख्यातं रसाचार्यै रससिद्धप्रदायकम् ॥२०॥ अथ जारणोपयोगि कच्छपयन्त्रम्--कुमुदीनिहितं मूषास्थापितम्, चषकेण शरावेण, अम्बुमृदा जलेन मृत्तया च । भृशं सुपचेदागन्धकजारणाम् । बलि- र्गन्धकः ॥ १८-२० ॥ भा. टी.--पन्द्रह-बीस अंगुल चौड़ा और गहरा मजबूत मिट्टी का एक पात्र या नाद लें। और उसमें आधे भाग तक शीतल जल भर दें। अब एक और दूसरा मिट्टी का पात्र लें जो पहिले पात्र में पड़े हुए जल को छूता हुआ उसके मुख तक आकर अच्छी तरह टिक जाय। इस ऊपर के जल को छूते हुए पात्र के बीच में पारद गन्धकयुक्तमूषा को रख दें, फिर इस मूषा को एक दृढ़ कच्छप यन्त्र शराव या प्याले से अच्छी तरह ढककर जल और मिट्टी से अच्छी तरह सन्धिलेप कर दें। अब इस ऊपर के पात्र में रखे हुए प्याले के ऊपर चारों तरफ खैर के कोयले भरकर तेज अग्नि जलावे जब तक गन्धक- जारण हो जाय। इसे कच्छप- यन्त्र कहते हैं। रसाचार्यों ने इस यन्त्र को गन्धजारणा करने के लिए वर्णन किया है। इसको अन्यत्र जल कूर्मयन्त्र नाम से लिखा है ॥ १८-२० ॥ भूधरयन्त्रम् बालुकाचितसर्वाङ्गां कुमुदीं कुण्डगां पचेत्।
४ चतुर्थस्तरङ्गः ४९ आच्छाद्य दीप्तैरुपलैर्यन्त्रं भूधरसंज्ञकम् ॥ २१ ॥ मूषां कुण्डे गर्ते वा निधाय वालुकाभिर्द्व्यङ्गुलं सर्वत आच्छाद्य उपरि दीप्तोपलाग्नियोगेन भूधरमन्वर्थम्भवति यन्त्रम् ॥ २१ ॥ भा.टी.—एक मिट्टी के छोटे कुंडे में दो अंगुल मोटी बालू की तह बिछाकर उस पर औषधियुक्त मूषा रखें और इसके चारों तरफ दो अंगुल बालुका आ जाय इस तरह भरकर इसके ऊपर उपले रख दें और अग्नि जलाकर पाक करें। इसे भूधर यन्त्र कहते हैं । अथवा जमीन में एक गढ़ा खोद कर उसमें दो-तीन अंगुल बालुका भर दें, इसके ऊपर पारद आदि पाक्य औषधियुक्त मूषा रख दें, फिर इस मूषा के चारों तरफ ऊपर नीचे दो अंगुल बालू भरकर ऊपर से उपलों की अग्नि जलायें ॥२१॥ मृदङ्गयन्त्रम् मृदङ्गसदृशाकारं शून्यगर्भञ्च सुदृढम् । पात्रं निर्मापयेद् युक्त्या रसतन्त्रविचक्षणः ॥२२॥ व्यावर्तनपिधानेन संयुक्तं त्वेकपार्श्वतः । परिश्रमरणशीलौ च वारङ्गौ पार्श्वयोस्तथा ॥२३॥ कारयेच्च ततो युक्त्या सूतं गन्धञ्च निक्षिपेत् । व्यावर्तनपिधानञ्च सुदृढं सन्निवेशयेत् ॥२४॥ ततो नरोत्सेधमितौ स्तम्भौ भूमौ तु विन्यसेत् । सम्मुखीनतया तत्र विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ २५ ॥ ततः प्रलम्बयेद् यन्त्रं स्तम्भयोर्दण्डसंश्रितम् । मृदङ्गयन्त्रकमिदं रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥२६॥
५० रसततरङ्गिणी
निर्मातुं कृत्रिमं म्लेच्छं रसतन्त्रविचक्षणैः। मृदङ्गयन्त्रमधुना विशेषेण युज्यते ॥ २७॥ मृदङ्गो वाद्यविशेषः, शून्यगर्भं सुषिरम्, व्यावर्तनपिधानेन आवर्तमानरेखायो- गाद् भ्रामणद्वारा स्थिरीकर्तुं योग्येन पिधानकेन इति। वारङ्गौ "वारं वारं गच्छ- तीति" निरुक्त्या वारङ्गो मुष्टिग्राह्य उत्सेधो हस्तक इत्यर्थः । वारङ्गौ चक्राभ्यां सह कार्यौ। व्यावर्तनपिधानस्य दृढं निवेशः पारदादिरुद्धार्थः । नरोत्सेधमितौ सार्धत्रिहस्तौ स्तम्भौ सम्मुखीनतया समरेखायां भूमौ निखान्य तत्र दण्डबद्धं मृदङ्ग- यन्त्रं लम्बयेत् । प्रतिपार्श्वस्थितो दण्डः स्तम्भविहितच्छिद्राद्बहिः सचक्रः कार्यः । म्लेच्छं हिङ्गुलम्, रसगन्धकयोः सम्यङ्मिश्रणार्थमस्य प्रयोगः ॥ २२-२७ ॥ भा. टी.—मृदंग (ढोलक के समान) के आकार का भीतर से रिक्त एक लोह आदि धातु का पात्र बनायें। अर्थात् तैल के लिए आजकल जो बीच में चौड़े और किनारों पर कम चौड़े ड्रम आते हैं उस तरह का पात्र लें। इसका एक
चतुर्थस्तरङ्गः ५१ तरफ का भाग ढालते या बनाते समय से ही बन्द हो, दूसरी तरफ के मुख पर ढक्कन को ठीक बैठाने के लिए पाँच सात चूड़ियाँ बना दी जायें। अब इसके लिए एक दृढ़ पिधान (ढक्कन) बनावें। इस ढक्कन के भीतरी किनारे में भी चूड़ियाँ बनी हुई होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त ढक्कन के बाहरी तरफ आमने-सामने दो दृढ़ कुएडे लगे हुए होने चाहिए जिससे ढक्कन को पात्र के मुख पर फिट करने के लिए इनको घुमाकर ढक्कन ठीक बैठाया जा सके। अब यन्त्र या पात्र में पारद और गन्धक को उचित मात्रा में डालकर ढक्कन को घुमाकर ठीक बैठा दें। अब जमीन में आमने-सामने साढ़े तीन हाथ ऊँचे दो खम्भे गाड़कर उनके ऊपर एक और खम्भा या डंडा रखकर इसमें उक्त यन्त्र को बाँध कर दोनों खम्भों के बीच में लटका दें और निर्दिष्ट माना- नुसार अग्नि देकर कृत्रिम हिंगुल बनायें। इसे ही मृदंगयन्त्र कहते हैं। यही यन्त्र आजकल कृत्रिम हिंगुल बनाने के काम आता है॥२२-२७॥
५२ रसतरङ्गिणी स्थालीयन्त्रम् स्थाल्यां संस्थाप्य लोहादि मल्लेनावृणुयान्मुखम् । स्थाल्यधोज्वालयेदग्निं स्थालीयन्त्रमिदं स्मृतम् ॥२८॥ मल्लेन शरावेण ॥ २८ ॥ भा. टी.—किसी हाँडी या पात्र में लोहा आदि धातुओं को अम्ल आदि द्रव्यों के साथ भरकर उसके मुख को एक सिकोरे से बन्द करके चूल्हे में रख- कर पकाने के लिए काम में आनेवाले यन्त्र को स्थालीयन्त्र कहते हैं ॥२८॥ वालुकायन्त्रम् सवस्त्रकुट्टितमृदा लिप्ताङ्गीञ्च विशोषिताम् । रसादिपूर्णजठरां काचकूपोन्तु विन्यसेत् ॥२९॥ स्थाल्यां मृत्तललिप्तायां सुदृढायां प्रयत्नतः । आकण्ठं कूपिकां तत्र वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥३०॥ भाण्डाधो ज्वालयेदग्निं यथाकालं यथाक्रमम् । एतद् बुधैः समाख्यातं वालुकायन्त्रसंज्ञकम् ॥३१॥ वालुकायन्त्रे—स्फुटनभयाल्लेपस्य दृढताऽपेक्षिता, अत आह सवस्त्रकुट्टितमृ- देति । अत्र च वालुका स्थूलशर्करा ग्राह्या, सम्यक् तापार्थं चालनीशोधिता च । स्पष्टमन्यत् । अत्रेदमवधेयम्—उक्तप्रचलितवालुकायन्त्रद्वारा मकरध्वजादिसाध- नेन न स्वर्णसहितो रस ऊर्ध्वं लगतीति, तथाच निःस्वर्णक एवासौ नाधिकमुप- युक्तः स्यादिति विमृशद्भिर्मित्रवंशावतंसैः श्रीनरेन्द्रनाथनामधेयैः सूक्ष्मेक्षणमनु- निश्चितं यत् प्रचलितं वालुकायन्त्रमेव न सम्यक्, अतिप्राचीनतन्त्रेष्ववर्णितञ्चे- ति प्राचीनाचार्य्यसम्मतेन वालुकायन्त्रेण मकरध्वजादिनिर्माणे स्वर्णसाहित्यं भवति रसेश्वरस्येति । तदेतद्रहस्यमत्यन्तकृपोपलब्धमाविष्कुर्मः सतां लाभाय । तद् यथा—“आदौ पुष्टां दीर्घनालां काचकूपीं विचक्षणः । समाहृत्य तत्तृतीयं भागं द्रव्येण पूरयेत् ॥ तस्या मुखं मुद्रयित्वा लिम्पेन्मृद्वस्त्रसप्तकैः । विशोष्य च सुगम्भीरे भाण्डे संस्थाप्य यत्नतः ॥ यथा तु कूपिकास्थेऽपि वालुका स्यात् षडङ्गुला । तथा च मुखपर्य्यन्तं भाण्डमापूरयेद् बुधः ॥ मृत्पंकविलिप्ताङ्गश- रावेणाथ योजयेत् । तस्याधोऽग्निं तथा दद्याद्यथा भाण्डमुखोपरि ॥ क्षिप्तं तृणं दहेदग्निः, स्वाङ्गशीतन्ततो नयेत् । एषोऽन्तर्धूमसिन्दूरनिर्माणे सिद्धस- म्मतः ॥ प्रकारो वालुकायन्त्रस्यैतद्भिन्नो न चोत्तमः ॥” इति । अत एव च “अधः
चतुर्थस्तरङ्गः ५३ स्थश्च रसो ग्राह्य ऊर्ध्वलग्नं बलिन्यजेदि"ति प्राचीनोक्तिः सङ्गच्छते । तथा च तन्त्रान्तरे “तलस्थतामनोज्ञत्वम्” इति । मकरध्वजः— मकरध्वजपरीक्षायां कश्चिदाह । यथा चातिप्राचीनसम्मतोऽयं पन्थास्तथा तत्र तत्रैव कणोहृत्य अवलोकनीयं सुधीरैरित्यलमत्राम्रेडितेन । एतदेव च वालुकास्थाने लवणप्रक्षेपाल्लवणयन्त्रनाम, तच्च मृगाङ्करसादिसाधनम् । लवणस्य च पिष्टस्यैवात्र क्षेपः । इति ॥ २६–३१ ॥ भा.टी.—एक काँच की बोतल या आतशी शीशी लेकर उसके ऊपर सात बार अच्छी तरह कपड़मिट्टी करके सुखा लें । अब एक बारह अंगुल गहरी- चौड़ी हाँडी लें । इस पर भी दो तीन कपड़मिट्टी कर दें । कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में तृतीय भाग तक नीचे पारद आदि द्रव्य भर दें । अब इस पारदयुक्त शीशी को उक्त हाँडी के भीतर बीच में रख हाँडी के शेष भाग को गले तक मोटी साफ बालू से भर दें और हाँडी को चूल्हे या भट्ठी में रखकर नीचे आवश्यकतानुसार अग्नि दें । इसको वालुका-यन्त्र कहते हैं ॥ २६–३१ ॥ वालुका, लवण और भस्म यन्त्र
५४ रसतरङ्गिणी लवणयन्त्रम् लवणस्य च निक्षेपादेवं लवणयन्त्रकम् । प्रकीर्तितं भिषग्वर्यैर्मृगाङ्कादिरसार्थकम् ॥ ३२ ॥ भा.टी.—वालुकायन्त्र में जहाँ हाँडी में बालू भरी जाती है वहाँ यदि बालू के स्थान में नमक भरकर पकाया जाय तो इसे लवण-यन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा मृगांकरस आदि का निर्माण किया जाता है ॥ ३२ ॥ पुटयन्त्रम् पुटनीयं तु कुम्भादौ विन्यस्यावृणुयात् पुनः । पिधानेन दृढेनाथ विदध्यात्सन्धिबन्धनम् ॥ ३३ ॥ करीषाग्नौ चुल्लिकायां वा पचेदग्निमानवित् । लोहादीनां मारणार्थं पुटयन्त्रं प्रशस्यते ॥ ३४ ॥ पुटयन्त्रम्—आवृणुयात् आच्छादयेदिति ॥ ३३, ३४ ॥ भा.टी.—किसी हाँडी या सकोरे में पुट देने योग्य वस्तु भरकर उसके मुख को ढक्कन से अच्छी तरह बन्दकर सन्धिलेप करके सुखा दें, पश्चात् इस पात्र को चूल्हे या उपलों की अग्नि में रखकर द्रव्य के अनुसार पाक करें। इसे पुटयन्त्र कहते हैं। यही यन्त्र साधारण रूप से लोह अभ्रक आदि को पुट देने के काम आता है ॥ ३३–३४ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्रम् नीरपूरितगर्भं तु पात्रे पात्रं निवेशयेत् । पार्श्वयोः कर्णिकापेतं द्रव्यक्वाथप्रपूरितम् ॥ ३५ ॥ चुल्लिकायां निधायाथ वह्निं प्रज्वालयेद्बुधः । संशोषयेत्ततः क्वाथं यावदायाति चूर्णताम् ॥ ३६ ॥ बाष्पेन स्वेदनं यस्माद् रसतन्त्रविशारदैः । तस्माद्यन्त्रमिदं ख्यातं बाष्पस्वेदनसंज्ञकम् ॥ ३७ ॥ वन्यौषधिविशेषाणां सत्त्वनिर्माणसाधकम् । यन्त्रमेतत्समाख्यातं भिषजां सुखहेतवे ॥ ३८ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्रम्—वन्यौषधिसत्त्वनिर्माणसाधनं निगदव्याख्यातम् ॥३५-३८॥ भा.टी.—एक बड़े से पात्र में जल ( ३/४ भाग ) भर दें, अब एक दूसरे पात्र में जिसके दोनों तरफ एक-एक कड़ा या पकड़ने के लिए कुण्डे लगे हों,
चतुर्थस्तरङ्गः ५५ औषधियों का काथ या स्वरस भरकर इस अर्ध जल-पूरित पात्र में टिकाकर बड़े जलवाले पात्र को चूल्हे पर रखें और अग्नि जलायें। जब अग्नि ताप से काथ आदि द्रव्य चूर्ण रूप में रह जाय तो पात्र को नीचे उतार लें। क्योंकि इस विधि से जल वाष्प द्वारा औषधि का स्वेदन किया जाता है। अतः इसे बाष्प- स्वेदन यन्त्र कहते हैं। इस यन्त्र के द्वारा वनौषधियों के सत्त्वनिर्माण कार्य में बड़ी सुविधा होती है ॥ ३५-३८ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्र का दूसरा प्रकार स्वेद्य द्रव्य तृण का जाली जल
५६ रसतरङ्गिणी दर्विकायन्त्रम् चषकं दर्विकाकल्पं दीर्घहस्तकसंयुतम् । दर्विकायन्त्रमेतद्धि गन्धशोधनसाधकम् ॥ ३६ ॥ भा.टी.—एक ऐसा प्याला, जिसका आकार करछी की तरह हो बनायें। इसमें करछी की तरह ही एक या डेढ़ हाथ लम्बा बेंत लगा दें। इसे दर्विका- यन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा गंधक, रांगा, सीसा आदि का शोधन किया जाता है ॥ ३६ ॥ वक्तव्य—यह यन्त्र एक प्रकार की करछी ही समझना चाहिए। करछी की बेंत छोटी और धातु की होती है जिससे वह शीघ्र ही गरम हो जाती है। अतः लकड़ी का बेंत लगा दिया जाय तो बड़ी सुविधा रहती है। पालिकायन्त्रम् एतदेव हि यन्त्रन्तु नतहस्तकसंयुतम् । पालिकायन्त्रमुद्दिष्टं रसन्त्रविचक्षणैः ॥ ४० ॥ पालिकायन्त्रम्—तैलपात्रात्तैलोद्धारार्थमधुनापि प्रयुज्यमानं “पैला” इति भाषायाम्, तत्प्रयोगश्च रसेंद्रसारसंग्रहे कपर्दभस्मनिर्माणाय ॥ ४० ॥ पालिकायन्त्र
चतुर्थस्तरङ्ग ५७ भा.टी.—किसी प्याले या करछी में यदि सीधी डण्डी के स्थान पर ऊपर को डण्डी करके उसको अन्त में कुछ मोड़ दिया जाय तो उसे पालिकायन्त्र कहते हैं। इसका आकार ठीक तैल निकालने के लिए बनायी गयी पैली की तरह होता है ॥४०॥ डमरुकाख्ययन्त्रम् स्थालिकोपरि विन्यस्य स्थालीं न्युब्जतयापराम् । पचेद्यथाक्रमं त्वेतद्यन्त्रं डमरुकाह्वयम् ॥ ४१ ॥ डमरुसमाकारं डमरुयन्त्रम्—अत्र केचिदधःस्थालीमुखमुपरितनस्थालीमुखा- न्तर्गतमिच्छन्ति सम्यग् द्रव्यपातार्थम् । एतत्प्रयोगो हिङ्गुलात्पारदोत्थापने गन्ध- कशोधनकर्मणि च । अनेन न गन्धकशुद्धिर्वद्द्यते ॥ ४१ ॥ भा.टी.—एक हाँडी के मुख पर दूसरी उसी प्रकार की हाँडी को औंधा मुख जोड़कर सन्धिलेप करके डमरु के आकार का यन्त्र बना लेने को डम- रुयन्त्र कहते हैं। यह पारद, संखिया आदि उड़ाने के काम आता है ॥४१॥ नाडिकायन्त्रम् घटे तु चुल्लिकासंस्थे निक्षिपेत्सलिलादिकम् । अधोमुखं घटं त्वन्यं मुखे तस्य निधापयेत् ॥ ४२ ॥ उभयोर्मुखमालिप्य मृदा संशोषयेत्ततः । उपरिस्थे ततो भाण्डे नाडिकान्तु निवेशयेत् ॥ ४३ ॥ एतान्तु नाडिकां प्राज्ञो यत्नतः कुण्डलीकृताम् । जलद्रोण्यां विनिक्षिप्य भित्त्वा चाथ निवेशयेत् ॥ ४४ ॥ काचकूपीमुखे सम्यक्, वह्निं प्रज्वालयेत्ततः । यावद् घटस्थितद्रव्यसारो यातीह बाष्पताम् ॥ ४५ ॥
५८ रसतरङ्गिणी एतद्धि नाडिकायन्त्रं भिषग्भिः परिकीर्तितम् । परिस्रुताम्बुनिर्माणे विशेषेण प्रयुज्यते ॥४६॥ नाडिकायन्त्रम्—परिस्रुताम्बु इत्युपलक्षणम्, तेन सुरादिनिर्माणोऽपि बोद्ध- व्यम् ॥ ४२-४६ ॥ भा.टी.—एक घड़े या पात्र में जल आदि द्रव द्रव्य भरकर उसके मुख पर एक दूसरा घड़ा औंधामुख रख के दोनों के मुखों को अच्छी तरह मिट्टी से लीप कर सन्धिबन्धन कर दें। अब ऊपर के घड़े की पेंदी पर एक तरफ एक अंगुष्ठ- प्रमाण छिद्र करके उसमें एक नली फिट कर दें। यह नली नीचे को आकर कुंड- लाकार बना दी जाय और एक शीतल जल के टव में से इसे पार करते हुए इसका दूसरा सिर टव के बाहर रखी हुई बोतल के मुख से लगा दें। अब जलादि से पूर्ण घड़े या पात्र के नीचे अग्नि जलावें। अग्नि के ताप से घड़े में पड़े हुए द्रव्यों का सार वाष्प रूप में उड़कर नली के सहारे बोतल में बिन्दु रूप से इकट्ठा होता जायगा। इसको नाडिकायंत्र कहते हैं। इस यन्त्र द्वारा शुद्ध जल (Distiled Water) अथवा अर्क या सञ्जीवनी सुरा आदि निकाले जाते हैं ॥४२-४६॥ नळिका शीतल जलपूर्ण टब पातालयन्त्रम् भूमौ हस्तमितं निम्नं विदध्याद् गर्त्तमुत्तमम् । तस्मिन् पातं निधायाथ तद्रूपं पात्रमन्यकम् ॥ ४७ ॥ आददीत ततस्तस्मिन्नौषधानि निधापयेत् । आस्यमस्य शरावेण छिद्रगर्भेण रोधयेत् ॥ ४८ ॥