रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ५३ स्थश्च रसो ग्राह्य ऊर्ध्वलग्नं बलिन्यजेदि"ति प्राचीनोक्तिः सङ्गच्छते । तथा च तन्त्रान्तरे “तलस्थतामनोज्ञत्वम्” इति । मकरध्वजः— मकरध्वजपरीक्षायां कश्चिदाह । यथा चातिप्राचीनसम्मतोऽयं पन्थास्तथा तत्र तत्रैव कणोहृत्य अवलोकनीयं सुधीरैरित्यलमत्राम्रेडितेन । एतदेव च वालुकास्थाने लवणप्रक्षेपाल्लवणयन्त्रनाम, तच्च मृगाङ्करसादिसाधनम् । लवणस्य च पिष्टस्यैवात्र क्षेपः । इति ॥ २६–३१ ॥ भा.टी.—एक काँच की बोतल या आतशी शीशी लेकर उसके ऊपर सात बार अच्छी तरह कपड़मिट्टी करके सुखा लें । अब एक बारह अंगुल गहरी- चौड़ी हाँडी लें । इस पर भी दो तीन कपड़मिट्टी कर दें । कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में तृतीय भाग तक नीचे पारद आदि द्रव्य भर दें । अब इस पारदयुक्त शीशी को उक्त हाँडी के भीतर बीच में रख हाँडी के शेष भाग को गले तक मोटी साफ बालू से भर दें और हाँडी को चूल्हे या भट्ठी में रखकर नीचे आवश्यकतानुसार अग्नि दें । इसको वालुका-यन्त्र कहते हैं ॥ २६–३१ ॥ वालुका, लवण और भस्म यन्त्र