रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ रसतरङ्गिणी लवणयन्त्रम् लवणस्य च निक्षेपादेवं लवणयन्त्रकम् । प्रकीर्तितं भिषग्वर्यैर्मृगाङ्कादिरसार्थकम् ॥ ३२ ॥ भा.टी.—वालुकायन्त्र में जहाँ हाँडी में बालू भरी जाती है वहाँ यदि बालू के स्थान में नमक भरकर पकाया जाय तो इसे लवण-यन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा मृगांकरस आदि का निर्माण किया जाता है ॥ ३२ ॥ पुटयन्त्रम् पुटनीयं तु कुम्भादौ विन्यस्यावृणुयात् पुनः । पिधानेन दृढेनाथ विदध्यात्सन्धिबन्धनम् ॥ ३३ ॥ करीषाग्नौ चुल्लिकायां वा पचेदग्निमानवित् । लोहादीनां मारणार्थं पुटयन्त्रं प्रशस्यते ॥ ३४ ॥ पुटयन्त्रम्—आवृणुयात् आच्छादयेदिति ॥ ३३, ३४ ॥ भा.टी.—किसी हाँडी या सकोरे में पुट देने योग्य वस्तु भरकर उसके मुख को ढक्कन से अच्छी तरह बन्दकर सन्धिलेप करके सुखा दें, पश्चात् इस पात्र को चूल्हे या उपलों की अग्नि में रखकर द्रव्य के अनुसार पाक करें। इसे पुटयन्त्र कहते हैं। यही यन्त्र साधारण रूप से लोह अभ्रक आदि को पुट देने के काम आता है ॥ ३३–३४ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्रम् नीरपूरितगर्भं तु पात्रे पात्रं निवेशयेत् । पार्श्वयोः कर्णिकापेतं द्रव्यक्वाथप्रपूरितम् ॥ ३५ ॥ चुल्लिकायां निधायाथ वह्निं प्रज्वालयेद्बुधः । संशोषयेत्ततः क्वाथं यावदायाति चूर्णताम् ॥ ३६ ॥ बाष्पेन स्वेदनं यस्माद् रसतन्त्रविशारदैः । तस्माद्यन्त्रमिदं ख्यातं बाष्पस्वेदनसंज्ञकम् ॥ ३७ ॥ वन्यौषधिविशेषाणां सत्त्वनिर्माणसाधकम् । यन्त्रमेतत्समाख्यातं भिषजां सुखहेतवे ॥ ३८ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्रम्—वन्यौषधिसत्त्वनिर्माणसाधनं निगदव्याख्यातम् ॥३५-३८॥ भा.टी.—एक बड़े से पात्र में जल ( ३/४ भाग ) भर दें, अब एक दूसरे पात्र में जिसके दोनों तरफ एक-एक कड़ा या पकड़ने के लिए कुण्डे लगे हों,