रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ चतुर्थस्तरङ्गः ४९ आच्छाद्य दीप्तैरुपलैर्यन्त्रं भूधरसंज्ञकम् ॥ २१ ॥ मूषां कुण्डे गर्ते वा निधाय वालुकाभिर्द्व्यङ्गुलं सर्वत आच्छाद्य उपरि दीप्तोपलाग्नियोगेन भूधरमन्वर्थम्भवति यन्त्रम् ॥ २१ ॥ भा.टी.—एक मिट्टी के छोटे कुंडे में दो अंगुल मोटी बालू की तह बिछाकर उस पर औषधियुक्त मूषा रखें और इसके चारों तरफ दो अंगुल बालुका आ जाय इस तरह भरकर इसके ऊपर उपले रख दें और अग्नि जलाकर पाक करें। इसे भूधर यन्त्र कहते हैं । अथवा जमीन में एक गढ़ा खोद कर उसमें दो-तीन अंगुल बालुका भर दें, इसके ऊपर पारद आदि पाक्य औषधियुक्त मूषा रख दें, फिर इस मूषा के चारों तरफ ऊपर नीचे दो अंगुल बालू भरकर ऊपर से उपलों की अग्नि जलायें ॥२१॥ मृदङ्गयन्त्रम् मृदङ्गसदृशाकारं शून्यगर्भञ्च सुदृढम् । पात्रं निर्मापयेद् युक्त्या रसतन्त्रविचक्षणः ॥२२॥ व्यावर्तनपिधानेन संयुक्तं त्वेकपार्श्वतः । परिश्रमरणशीलौ च वारङ्गौ पार्श्वयोस्तथा ॥२३॥ कारयेच्च ततो युक्त्या सूतं गन्धञ्च निक्षिपेत् । व्यावर्तनपिधानञ्च सुदृढं सन्निवेशयेत् ॥२४॥ ततो नरोत्सेधमितौ स्तम्भौ भूमौ तु विन्यसेत् । सम्मुखीनतया तत्र विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ २५ ॥ ततः प्रलम्बयेद् यन्त्रं स्तम्भयोर्दण्डसंश्रितम् । मृदङ्गयन्त्रकमिदं रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥२६॥