रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ रसतरङ्गिणी कच्छपयन्त्रस्य स्वरूपम् जलपूरितभाजनमध्यगते घटखर्परके विनिधाय रसम्। बलिमध्यगतं कुमुदीनिहितं चषकेण भृशं पिदधीत ततः ॥१८॥ कृतसन्धिविलेपनमम्बुमृदा खलु खादिरकोकिलकैर्ज्वलनम्। परिदीप्य भृशं सुपचेद् गदितं किल कच्छपसंज्ञकयन्त्रमिदम् ॥१९॥ बलिजारणसिद्धयर्थं यन्त्रं कच्छपसंज्ञकम्। समाख्यातं रसाचार्यै रससिद्धप्रदायकम् ॥२०॥ अथ जारणोपयोगि कच्छपयन्त्रम्--कुमुदीनिहितं मूषास्थापितम्, चषकेण शरावेण, अम्बुमृदा जलेन मृत्तया च । भृशं सुपचेदागन्धकजारणाम् । बलि- र्गन्धकः ॥ १८-२० ॥ भा. टी.--पन्द्रह-बीस अंगुल चौड़ा और गहरा मजबूत मिट्टी का एक पात्र या नाद लें। और उसमें आधे भाग तक शीतल जल भर दें। अब एक और दूसरा मिट्टी का पात्र लें जो पहिले पात्र में पड़े हुए जल को छूता हुआ उसके मुख तक आकर अच्छी तरह टिक जाय। इस ऊपर के जल को छूते हुए पात्र के बीच में पारद गन्धकयुक्तमूषा को रख दें, फिर इस मूषा को एक दृढ़ कच्छप यन्त्र शराव या प्याले से अच्छी तरह ढककर जल और मिट्टी से अच्छी तरह सन्धिलेप कर दें। अब इस ऊपर के पात्र में रखे हुए प्याले के ऊपर चारों तरफ खैर के कोयले भरकर तेज अग्नि जलावे जब तक गन्धक- जारण हो जाय। इसे कच्छप- यन्त्र कहते हैं। रसाचार्यों ने इस यन्त्र को गन्धजारणा करने के लिए वर्णन किया है। इसको अन्यत्र जल कूर्मयन्त्र नाम से लिखा है ॥ १८-२० ॥ भूधरयन्त्रम् बालुकाचितसर्वाङ्गां कुमुदीं कुण्डगां पचेत्।