रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ५७
दें। अब इस हाँडी की ग्रीवा को एक दूसरी लम्बी ग्रीवावाली हाँडी (उसके साथ जुड़ी हुई) को चूल्हे के पास बनायी हुई ईंटों के चूल्हे के बराबर ऊँची चौकी पर रख दें। चूल्हे के नीचे अग्नि जलायें। पारद अग्नितप से उड़कर दूसरे रिक्त घड़े में जा गिरेगा। परन्तु इस रिक्त घड़े के ऊपर बाहर से शीतल जल से सिंचन करते रहना चाहिए। इस यन्त्र के द्वारा पारद का तिर्यक्पातन होता है अतः इसे तिर्यक्पातनयन्त्र कहते हैं॥ १३-१५॥ वक्तव्य—यदि दूसरे घड़े या हाँडी को पारदवाली हाँडी के साथ रिक्त न जोड़कर उसमें जल भर के जोड़ दें तो बाहर से जलसिंचन करने की आवश्यकता नहीं रहती है। अथवा इसके अतिरिक्त हाँडी को एक शीतल जल से भरे हुए टब में रखने से भी बाहर से जल डालने की आवश्यकता नहीं रहती है।
भस्मयन्त्रम् मृन्निर्मितं पात्रमिहाहरेद् दृढं वितस्तिगम्भीरमथोऽतिनूतनम् । भूत्यातदधं परिपूर्य यत्नात्तालादिगोलान् क्रमशो निदध्यात् ॥१६॥ निर्दिष्टभूत्यैव तदूर्ध्वभागं अपूर्य संमुद्रय च भाण्डवक्त्रम् । चुल्ल्यां निधायाग्निसथ प्रदद्यादेतन्मतं वै खलु भस्मयन्त्रम् ॥१७॥ अथ भस्मयन्त्रम्—मृन्निर्मितमिति धात्वादिपात्रव्यावृत्तिरतिवह्नितापभयात्, दृढं वह्नितापसहम्, वितस्तिगम्भीरं द्वादशाङ्गुलनिम्नम्, यत्नादितिभूतिस्तरका- ठिन्यार्थम्, भस्म चात्र व अपूतं सम्यक्श्वेतं कोकिलांशरहितञ्च ग्राह्यम्, सकोकिलं स्थालीनिहितं प्रस्फुटितस्तरं विकस्वरञ्च स्यात्, तथा चौषधधूमरोधो न सम्यग् जायेत। न सम्यक् श्वेतञ्चेत् पुनः पाकेन श्वेतं विधाय पश्चात्त्तस्य स्तरे पाक्य- द्रव्यचक्रिका निवेशनीया, मुखपर्यन्तञ्च भाण्डपूर्तिर्भस्मना कार्य्या ॥१६-१७॥ भा. टी.—एक मजबूत बारह अँगुल चौड़ी-गहरी नई हाँडी लें। अब इस हाँडी में आधे भाग तक पीपल छाल, अमलतास छाल, थोहर आदि किसी की भस्म अच्छी तरह दबा कर भरें। अब इसके ऊपर हरताल या संखिया आदि की टिकियाओं को अलग-अलग रखकर दबा दें। अब इनके ऊपर फिर उसी भस्म को दबा-दबाकर अच्छी हाँडी के मुख तक भर दें। अन्त में हाँडी के मुख पर एक सिकोरा रखकर उसको अच्छी तरह सन्धिलेप कर दें। अब इस हाँडी को चूल्हे पर रखकर निर्दिष्ट समय तक अग्नि देवें। इसीको भस्मयन्त्र कहते हैं॥ १६, १७॥