रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ रसतरङ्गिणी तक पूरी समा जाय। इसमें हाँडी को डालकर ऊपर की हाँडी के पेंदे में बाहर से उपलों की अग्नि देवें। इस प्रकार पारद ऊपर के अग्नितप से धीरे-धीरे नीचे जल में आगिरेगा। इसको अधःपातन यन्त्र कहते हैं ॥ ११-१२ ॥ वक्तव्य—कई वैद्य हाँडी को जमीन में इतना गाड़ते हैं जिसमें सम्पूर्ण नीचे की हाँडी और ऊपर की हाँडी का बीच का चौड़ा भाग जहाँ तक पारद का लेप किया हुआ है आ जाय। इस विधि से अग्नि देने में सुविधा रहती है। तिर्यक्पातनयन्त्रम् नतनाले घटे दीर्गे रसराजं विनिक्षिपेत्। तन्नालं योजयेदन्यकुम्भगर्भे प्रयत्नतः ॥ १३ ॥ रोधयेच्च यत्नेन रसगर्भघटीमुखम् । ततो रसघटस्याधो वह्निं प्रज्वालयेद् भृशम् ॥ १४ ॥ पूरयेच्च घटं त्वन्यं विमलैः शीतलैर्जलैः । यन्त्रमेतत्समाख्यातं तिर्यक्पातनसंज्ञकम् ॥ १५ ॥ तिर्यक्पातनयन्त्रम् सुगमम् ॥ १३-१५ ॥ भा.टी.-एक ऐसी लम्बे आकार की और आगे को कुछ झुकी हुई गर्दन- वाली (सुराही की तरह) हाँडी लें। और उसमें औषधि मर्दित पारद को डाल तिर्यक्पातन यन्त्र