रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ४५ अधःपातनयन्त्रम् ऊर्ध्वपात्रान्तरे सूतं लिप्त्वाधः पात्रके जलम् । निक्षिप्य भूमौ गर्तञ्च विधाय विन्यसेद् दृढम् ॥ ११ ॥ प्रदीप्तैश्छगणैस्तत्र वह्निं प्रज्वालयेद् भृशम् । रसज्ञैः कीर्तितमिदमधः पातनयन्त्रकम् ॥ १२ ॥ ऊर्ध्वपात्रान्तरे सूतं लिप्त्वेति तत्तदौषधमर्दितस्य पारदस्य ऊर्ध्वपात्रोदरे लेपं विधायेत्यर्थः । अधःपात्रके जलं क्षिप्त्वा गर्ते जलपूरितमधःपात्रमेव सन्धि- बन्धः पूरणीयः । अथवाधोमुखीनतया स्थापितस्योर्ध्वभाण्डस्य सूतलिप्तान्तर्ज- ठरभागं बाह्यतो विहायान्यत्सर्वं यन्त्रं गर्ते दृढं स्थापनीयम् ॥ ११-१२॥ भा.टी.—अधःपातन यन्त्र के लिए भी उक्त प्रकार से दो हाँडी लें, परन्तु दूसरी हाँडी में जलाधार आदि कोई न बनावें । ऊपर की हाँडी के भीतर औषधियों के साथ मर्दित पारद का लेप कर दें और नीचे की हाँडी में आधे भाग तक या कण्ठ तक जल ( शीतल ) भर दें । अब जलवाली- हाँडी के मुख पर पारदवाली हाँडी को अधोमुख टिकाकर दोनों की मुख सन्धि को कपड़मिट्टी से अच्छी तरह लेप करके सुखा लें । अब जमीन में इतना लम्बा चौड़ा गढ़ा बनायें जिसमें कि निचली जलवाली हाँडी मुख अधःपातन यन्त्र