रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्ग ५७ भा.टी.—किसी प्याले या करछी में यदि सीधी डण्डी के स्थान पर ऊपर को डण्डी करके उसको अन्त में कुछ मोड़ दिया जाय तो उसे पालिकायन्त्र कहते हैं। इसका आकार ठीक तैल निकालने के लिए बनायी गयी पैली की तरह होता है ॥४०॥ डमरुकाख्ययन्त्रम् स्थालिकोपरि विन्यस्य स्थालीं न्युब्जतयापराम् । पचेद्यथाक्रमं त्वेतद्यन्त्रं डमरुकाह्वयम् ॥ ४१ ॥ डमरुसमाकारं डमरुयन्त्रम्—अत्र केचिदधःस्थालीमुखमुपरितनस्थालीमुखा- न्तर्गतमिच्छन्ति सम्यग् द्रव्यपातार्थम् । एतत्प्रयोगो हिङ्गुलात्पारदोत्थापने गन्ध- कशोधनकर्मणि च । अनेन न गन्धकशुद्धिर्वद्द्यते ॥ ४१ ॥ भा.टी.—एक हाँडी के मुख पर दूसरी उसी प्रकार की हाँडी को औंधा मुख जोड़कर सन्धिलेप करके डमरु के आकार का यन्त्र बना लेने को डम- रुयन्त्र कहते हैं। यह पारद, संखिया आदि उड़ाने के काम आता है ॥४१॥ नाडिकायन्त्रम् घटे तु चुल्लिकासंस्थे निक्षिपेत्सलिलादिकम् । अधोमुखं घटं त्वन्यं मुखे तस्य निधापयेत् ॥ ४२ ॥ उभयोर्मुखमालिप्य मृदा संशोषयेत्ततः । उपरिस्थे ततो भाण्डे नाडिकान्तु निवेशयेत् ॥ ४३ ॥ एतान्तु नाडिकां प्राज्ञो यत्नतः कुण्डलीकृताम् । जलद्रोण्यां विनिक्षिप्य भित्त्वा चाथ निवेशयेत् ॥ ४४ ॥ काचकूपीमुखे सम्यक्, वह्निं प्रज्वालयेत्ततः । यावद् घटस्थितद्रव्यसारो यातीह बाष्पताम् ॥ ४५ ॥