भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

५८ रसतरङ्गिणी एतद्धि नाडिकायन्त्रं भिषग्भिः परिकीर्तितम् । परिस्रुताम्बुनिर्माणे विशेषेण प्रयुज्यते ॥४६॥ नाडिकायन्त्रम्—परिस्रुताम्बु इत्युपलक्षणम्, तेन सुरादिनिर्माणोऽपि बोद्ध- व्यम् ॥ ४२-४६ ॥ भा.टी.—एक घड़े या पात्र में जल आदि द्रव द्रव्य भरकर उसके मुख पर एक दूसरा घड़ा औंधामुख रख के दोनों के मुखों को अच्छी तरह मिट्टी से लीप कर सन्धिबन्धन कर दें। अब ऊपर के घड़े की पेंदी पर एक तरफ एक अंगुष्ठ- प्रमाण छिद्र करके उसमें एक नली फिट कर दें। यह नली नीचे को आकर कुंड- लाकार बना दी जाय और एक शीतल जल के टव में से इसे पार करते हुए इसका दूसरा सिर टव के बाहर रखी हुई बोतल के मुख से लगा दें। अब जलादि से पूर्ण घड़े या पात्र के नीचे अग्नि जलावें। अग्नि के ताप से घड़े में पड़े हुए द्रव्यों का सार वाष्प रूप में उड़कर नली के सहारे बोतल में बिन्दु रूप से इकट्ठा होता जायगा। इसको नाडिकायंत्र कहते हैं। इस यन्त्र द्वारा शुद्ध जल (Distiled Water) अथवा अर्क या सञ्जीवनी सुरा आदि निकाले जाते हैं ॥४२-४६॥ नळिका शीतल जलपूर्ण टब पातालयन्त्रम् भूमौ हस्तमितं निम्नं विदध्याद् गर्त्तमुत्तमम् । तस्मिन् पातं निधायाथ तद्रूपं पात्रमन्यकम् ॥ ४७ ॥ आददीत ततस्तस्मिन्नौषधानि निधापयेत् । आस्यमस्य शरावेण छिद्रगर्भेण रोधयेत् ॥ ४८ ॥