रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 101, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ५६ पात्रमेतत्तु गर्तस्थे पात्रे यत्नेन विन्यसेत् । विदध्यादनयोर्यत्नात् सुदृढं सन्धिबन्धनम् ॥४९॥ मृदा सम्पूर्य गर्तन्तु वह्निं दद्यात् प्रयोगवित् । स्वांगशीतं ततो ज्ञात्वा रसतन्त्रविचक्षणः ॥५०॥ उपरिस्थन्तु वै पात्रं शनैः समवतारयेत् । अधःपात्रगतं तैलं गृह्णीयात्तु विधानतः ॥५१॥ एतद् बुधैः समाख्यातं यन्त्रं पातालसंज्ञकम् । आहर्तुं गन्धकादीनां तैलमेतत्प्रयुज्यते ॥५२॥ पातालयन्त्रम्—सुबोधम् ॥ ४७-५२ ॥ भा.टी.—जमीन में एक हाथ गहरा गढ़ा खोदकर उसमें एक पात्र रख दें। अब ऐसा ही एक दूसरा पात्र लें और इसमें औषधि भर दें और इसके मुख को बहुत सूक्ष्म छिद्रयुक्त एक शराव से बन्द करके औंधामुख इस शराव सहित पात्र को गढ़ेवाले पात्र के मुख पर अच्छी तरह टिकाकर दोनों की मुखसन्धि को कपड़मिट्टी कर दें। अब गढ़े के रिक्त स्थान को मिट्टी से भर
[चित्र-संकेत: कोयले, औषधि, जाली, प्याला]