रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० रसतरङ्गिणी दें और ऊपरवाले पात्र की पेंदी पर उपलों की अग्नि जलायें। जब अग्नि स्वतः शान्त हो जाय तो ऊपर के पात्र को धीरे से उठाकर अलग रख दें । निचले पात्र में इकट्ठे हुए तेल को निकाल लें। इसे पाताल यन्त्र कहते हैं। यह यन्त्र गन्धक आदि द्रवों के तेल निकालने के काम आता है ॥ ४७-५२ ॥ खल्लयन्त्रम् चषकोपममत्यच्छं सुदृढ पिच्छिलोपमम् । सच्छिलाविहितं पात्रं खल्लयन्त्रमिहोच्यते ॥५३॥ भा.टी.—गोल प्याले की भांति अच्छे पत्थर के बने हुए चिकने और मजबूत साफ पात्र को खल्लयन्त्र (खरल) कहा जाता है ॥ ५३ ॥ खल्लयन्त्रस्य प्रयोजनम् रसोपरसलोहादेः पेषणादिककर्मणि । रसतन्त्रक्रियादक्षैः खल्वयन्त्रं प्रयुज्यते ॥५४॥ भा. टी.—रस, उपरस, लोह आदि को पीसने-घोटने आदि के कामों में विभिन्न प्रकार के खरलों का प्रयोग होता है ॥ ५४ ॥ खल्लयन्त्रस्य द्वैविध्यम् खल्लयन्त्रं द्विधा प्रोक्तं रसतन्त्रे विशेषतः । प्रथमं वर्तुलाकारं द्रोणीरूपं द्वितीयकम् ॥५५॥ भा. टी.—रस-शास्त्र में खरल दो प्रकार के बनाये गये हैं—१— गोलाकार, २—द्रोणीरूप (किश्तीनुमा खरल ) ॥ ५५ ॥ वर्तुलः खल्वः विस्तारे तपनांगुलः समतलो नीलाब्जतुल्यप्रभः निम्नत्वे च नवांगुलः सुमस्सृणो रुद्रांगुलोच्छ्रायवान् । भित्त्या द्वयंगुलसंमितः खलु यथा चेन्द्रांगुलो घर्षकः खल्वोऽयं खलु वर्तुलो निगदितः सूतादिसिद्धिप्रदः ॥५६॥ वर्तुलखल्वः—तपनाङ्गुलः द्वादशाङ्गुलः, रुद्राङ्गुलः एकादशाङ्गुलः, इन्द्रा- ङ्गुलश्चतुर्दशाङ्गुलः ॥ ५६ ॥ भा.टी.—गोल खरल चौड़ाई में बारह अंगुल, गहराई में नौ अंगुल और ऊँचाई में ग्यारह अंगुल होना चाहिए । इसका सब प्रदेश सम होना चाहिए । यह अत्यन्त चिकना और नील कमल के वर्ण का होना चाहिए । इसकी दीवारें दो अंगुल मोटी बनानी चाहिए । । इसकी मूसली १४ अंगुल लम्बी बनानी