भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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४२ रसतरङ्गिणी दोलायन्त्रलक्षणम् सूतादिकं स्वेदनीयं निक्षिपेत् त्रिगुणाम्बरे । स्फीतकेन निरुध्याथ पोट्टलीं कारयेद् भृशम् ॥ पूरितार्द्धोदरे भाण्डे द्रवैस्तन्मुखपार्श्वयोः । रन्ध्रद्वयं विधायाथ तत्र दण्डं विनिक्षिपेत् ॥३॥ दण्डमध्ये तु सुदृढं बध्नीयाद् द्रव्यपोट्टलीम् । गुरुदर्शितमार्गेण वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥४॥ स्वेदयेच्च ततश्चैतद् दोलायन्त्रमिति स्मृतम् । द्रव्याणां शोधनाद्यर्थं विशेषेण नियुज्यते ॥५॥ त्रिगुणाम्बरे त्रिपुटीकृतवस्त्रे, केचित्तु वस्त्रमध्येऽपि भूर्जपत्रादिकं निधाय तत्र सूतादिप्रक्षेपमाहुः सम्प्रदायात् । स्फीतकेन “फीता” इति भाषाप्रसिद्धेन, सुदृढं बध्नीयादिति यथा तलस्पर्शो न भवति । शोधनाद्यर्थमिति आदिशब्देन दीपदादावपि प्रयुज्यते यथा दीपने—“निक्षिप्याथ दिनद्वयं बुधवरो दोलाख्य- यन्त्रे पचेत्” । उत्थापने च—“क्षाराद्यैः स्वेदयेत्सम्यग् दोलायन्त्रे भिषग्वरः” इति च वक्ष्यते पञ्चमतरङ्गे ॥ २-५ ॥ भा. टी.—पारद आदि स्वेदनीय द्रव्यों को तीन तहवाले कपड़े में रख- कर पोटली बनाकर उसको एक मजबूत फीते या डोरी से बाँध लें । अब एक हाँड़ी या पतेली लें, इसमें आधे भाग तक लिखित क्वाथ स्वरस आदि भर दें और पतेली या हाँड़ी के गले में दोनों तरफ आमने-सामने एक एक छेद कर उसमें एक मजबूत लकड़ी या सींक डाल दें । अब इस लकड़ी या डंडे के बीच भाग में उक्त औषधि की पोटली को अच्छी तरह बाँधकर नीचे द्रव में लटका दें । और गुरु के द्वारा बताये हुए विधान से इस हाँड़ी को अग्नि के ऊपर रखकर पकावें और द्रव्य का स्वेदन करें । इस विधि से बनाये हुए यन्त्र को दोलायन्त्र कहते हैं । यह यन्त्र द्रव्यों के शोधन आदि कर्म करने के लिए विशेष रूप से काम आता है ॥ २-५ ॥ वक्तव्य—दोलायन्त्र में यदि कोई द्रव वस्तु जैसे पारद का स्वेदन करना हो उसे खाली कपड़े में न रखकर पहिले भोजपत्र में रखें, फिर कपड़े में रखकर पोटली बनानी चाहिए । पोटली द्रव में इस प्रकार लटकनी चाहिए कि जिससे हाँड़ी का द्रव पोटली के आधा ऊपर और आधा नीचे रहे । इस प्रकार ज्यों- ज्यों द्रव कम होता जाय पोटली को भी नीचे ढीली करते जायँ, जब