रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ४३ द्रवभाव सूख जाय तब पोटली को निकाल लेना चाहिए । पोटली के द्रव्य को अच्छी तरह स्वेद पहुँचाने के लिए कई वैद्य हाँडी के मुख पर एक शराव या पात्र भी रखने को कहते हैं । ऊर्ध्वपातनयन्त्रम् द्वादशाङ्गुलमुखी सुवर्तुला सुदृढा च खलु गर्भविस्तृता । अङ्गुलद्वयमितौष्ठसंयुता पातने भवति निम्नगा घटी ॥७॥ उक्तसर्वगुणसंयुता तले छिद्रयुक्तदृढवृत्तिकान्विता । ऊर्ध्वगा च जठरोज्ज्वला घटी तूर्ध्वपातनविधौ प्रशस्यते ॥७॥ निम्नगायां रसं क्षिप्त्वा मेलयेदनयोर्मुखम् । सम्वेष्ट्य शोषयेत् सन्धि चुल्ल्यामारोपयेत्ततः ॥८॥ नलिकां वृत्तिकाछिद्रे न्यस्य सन्धि प्रलेपयेत् । वृत्तिमध्ये क्षिपेत्तोयं नलिकामुखमार्गतः ॥६॥ तप्तं निष्कासयेत्तोयं शीतलंञ्च विनिक्षिपेत् । रसज्ञैः कीर्तितमिदमूर्ध्वपातनयन्त्रकम् ॥१०॥ द्वयंगुलमित ओष्ठो मुखवृत्तिका यस्याः, तच्च सुष्ठु मुखसन्धानाय द्रव्यनिर्ग- मरोधाय च । अस्याश्च तलंबहिर्भागे जलस्थापनाय दृढा वृत्तिका एकतश्छिद्र- युता कार्या, सा च जलमृत्स्नया विधातव्या, यद्वा तादृशवृत्तिकायुक्तमेव भाण्डं ग्राह्यम् । जलमृत्तिकालक्षणं यथा--“लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम् । जीर्णकिट्टरर्जः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम् । इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु ॥” जठरञ्चास्या औषधनैर्मल्याय उज्ज्वलं निर्मलं विधेयम् । वृत्तिकाछिद्रे नलिकान्यास उष्णीभूतजलनिष्कासनार्थः । अन्यत् सुगमम् ॥ ६-१० ॥ भा. टी.—एक गोल मजबूत हाँड़ी लें, जो मुख में बारह अंगुल चौड़ी और विस्तृत गर्भवाली हो । उसके मुख में किनारे दो अंगुल चौड़े होने चाहिए । एक और पूर्वोक्त प्रकार की दूसरी हाँड़ी लें इसके भी भीतर से अच्छी तरह रगड़कर साफ कर लें । इसके बाहरी तल प्रदेश में जलमृत्तिका द्वारा चार अंगुल ऊँचा चौड़ा एक थाला या जलाधार बनायें और इसके एक किनारे पर नीचे एक अंगुल छेद बनाकर उसमें एक नली लगा दें और नली के मुख को एक डाट से बन्द रखे । अब पहिले की हाँड़ी को सीधा रखकर उसमें औषधियों के साथ मर्दित पारद भर दें । अब इसके ऊपर दूसरी थांलावाली हाँड़ी अधोमुख ( औंधी ) रख के दोनों के मुख की सन्धि