रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ५१ तरफ का भाग ढालते या बनाते समय से ही बन्द हो, दूसरी तरफ के मुख पर ढक्कन को ठीक बैठाने के लिए पाँच सात चूड़ियाँ बना दी जायें। अब इसके लिए एक दृढ़ पिधान (ढक्कन) बनावें। इस ढक्कन के भीतरी किनारे में भी चूड़ियाँ बनी हुई होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त ढक्कन के बाहरी तरफ आमने-सामने दो दृढ़ कुएडे लगे हुए होने चाहिए जिससे ढक्कन को पात्र के मुख पर फिट करने के लिए इनको घुमाकर ढक्कन ठीक बैठाया जा सके। अब यन्त्र या पात्र में पारद और गन्धक को उचित मात्रा में डालकर ढक्कन को घुमाकर ठीक बैठा दें। अब जमीन में आमने-सामने साढ़े तीन हाथ ऊँचे दो खम्भे गाड़कर उनके ऊपर एक और खम्भा या डंडा रखकर इसमें उक्त यन्त्र को बाँध कर दोनों खम्भों के बीच में लटका दें और निर्दिष्ट माना- नुसार अग्नि देकर कृत्रिम हिंगुल बनायें। इसे ही मृदंगयन्त्र कहते हैं। यही यन्त्र आजकल कृत्रिम हिंगुल बनाने के काम आता है॥२२-२७॥