भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

चतुर्थस्तरङ्गः ५१ तरफ का भाग ढालते या बनाते समय से ही बन्द हो, दूसरी तरफ के मुख पर ढक्कन को ठीक बैठाने के लिए पाँच सात चूड़ियाँ बना दी जायें। अब इसके लिए एक दृढ़ पिधान (ढक्कन) बनावें। इस ढक्कन के भीतरी किनारे में भी चूड़ियाँ बनी हुई होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त ढक्कन के बाहरी तरफ आमने-सामने दो दृढ़ कुएडे लगे हुए होने चाहिए जिससे ढक्कन को पात्र के मुख पर फिट करने के लिए इनको घुमाकर ढक्कन ठीक बैठाया जा सके। अब यन्त्र या पात्र में पारद और गन्धक को उचित मात्रा में डालकर ढक्कन को घुमाकर ठीक बैठा दें। अब जमीन में आमने-सामने साढ़े तीन हाथ ऊँचे दो खम्भे गाड़कर उनके ऊपर एक और खम्भा या डंडा रखकर इसमें उक्त यन्त्र को बाँध कर दोनों खम्भों के बीच में लटका दें और निर्दिष्ट माना- नुसार अग्नि देकर कृत्रिम हिंगुल बनायें। इसे ही मृदंगयन्त्र कहते हैं। यही यन्त्र आजकल कृत्रिम हिंगुल बनाने के काम आता है॥२२-२७॥

५२ रसतरङ्गिणी स्थालीयन्त्रम् स्थाल्यां संस्थाप्य लोहादि मल्लेनावृणुयान्मुखम् । स्थाल्यधोज्वालयेदग्निं स्थालीयन्त्रमिदं स्मृतम् ॥२८॥ मल्लेन शरावेण ॥ २८ ॥ भा. टी.—किसी हाँडी या पात्र में लोहा आदि धातुओं को अम्ल आदि द्रव्यों के साथ भरकर उसके मुख को एक सिकोरे से बन्द करके चूल्हे में रख- कर पकाने के लिए काम में आनेवाले यन्त्र को स्थालीयन्त्र कहते हैं ॥२८॥ वालुकायन्त्रम् सवस्त्रकुट्टितमृदा लिप्ताङ्गीञ्च विशोषिताम् । रसादिपूर्णजठरां काचकूपोन्तु विन्यसेत् ॥२९॥ स्थाल्यां मृत्तललिप्तायां सुदृढायां प्रयत्नतः । आकण्ठं कूपिकां तत्र वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥३०॥ भाण्डाधो ज्वालयेदग्निं यथाकालं यथाक्रमम् । एतद् बुधैः समाख्यातं वालुकायन्त्रसंज्ञकम् ॥३१॥ वालुकायन्त्रे—स्फुटनभयाल्लेपस्य दृढताऽपेक्षिता, अत आह सवस्त्रकुट्टितमृ- देति । अत्र च वालुका स्थूलशर्करा ग्राह्या, सम्यक् तापार्थं चालनीशोधिता च । स्पष्टमन्यत् । अत्रेदमवधेयम्—उक्तप्रचलितवालुकायन्त्रद्वारा मकरध्वजादिसाध- नेन न स्वर्णसहितो रस ऊर्ध्वं लगतीति, तथाच निःस्वर्णक एवासौ नाधिकमुप- युक्तः स्यादिति विमृशद्भिर्मित्रवंशावतंसैः श्रीनरेन्द्रनाथनामधेयैः सूक्ष्मेक्षणमनु- निश्चितं यत् प्रचलितं वालुकायन्त्रमेव न सम्यक्, अतिप्राचीनतन्त्रेष्ववर्णितञ्चे- ति प्राचीनाचार्य्यसम्मतेन वालुकायन्त्रेण मकरध्वजादिनिर्माणे स्वर्णसाहित्यं भवति रसेश्वरस्येति । तदेतद्रहस्यमत्यन्तकृपोपलब्धमाविष्कुर्मः सतां लाभाय । तद् यथा—“आदौ पुष्टां दीर्घनालां काचकूपीं विचक्षणः । समाहृत्य तत्तृतीयं भागं द्रव्येण पूरयेत् ॥ तस्या मुखं मुद्रयित्वा लिम्पेन्मृद्वस्त्रसप्तकैः । विशोष्य च सुगम्भीरे भाण्डे संस्थाप्य यत्नतः ॥ यथा तु कूपिकास्थेऽपि वालुका स्यात् षडङ्गुला । तथा च मुखपर्य्यन्तं भाण्डमापूरयेद् बुधः ॥ मृत्पंकविलिप्ताङ्गश- रावेणाथ योजयेत् । तस्याधोऽग्निं तथा दद्याद्यथा भाण्डमुखोपरि ॥ क्षिप्तं तृणं दहेदग्निः, स्वाङ्गशीतन्ततो नयेत् । एषोऽन्तर्धूमसिन्दूरनिर्माणे सिद्धस- म्मतः ॥ प्रकारो वालुकायन्त्रस्यैतद्भिन्नो न चोत्तमः ॥” इति । अत एव च “अधः

चतुर्थस्तरङ्गः ५३ स्थश्च रसो ग्राह्य ऊर्ध्वलग्नं बलिन्यजेदि"ति प्राचीनोक्तिः सङ्गच्छते । तथा च तन्त्रान्तरे “तलस्थतामनोज्ञत्वम्” इति । मकरध्वजः— मकरध्वजपरीक्षायां कश्चिदाह । यथा चातिप्राचीनसम्मतोऽयं पन्थास्तथा तत्र तत्रैव कणोहृत्य अवलोकनीयं सुधीरैरित्यलमत्राम्रेडितेन । एतदेव च वालुकास्थाने लवणप्रक्षेपाल्लवणयन्त्रनाम, तच्च मृगाङ्करसादिसाधनम् । लवणस्य च पिष्टस्यैवात्र क्षेपः । इति ॥ २६–३१ ॥ भा.टी.—एक काँच की बोतल या आतशी शीशी लेकर उसके ऊपर सात बार अच्छी तरह कपड़मिट्टी करके सुखा लें । अब एक बारह अंगुल गहरी- चौड़ी हाँडी लें । इस पर भी दो तीन कपड़मिट्टी कर दें । कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में तृतीय भाग तक नीचे पारद आदि द्रव्य भर दें । अब इस पारदयुक्त शीशी को उक्त हाँडी के भीतर बीच में रख हाँडी के शेष भाग को गले तक मोटी साफ बालू से भर दें और हाँडी को चूल्हे या भट्ठी में रखकर नीचे आवश्यकतानुसार अग्नि दें । इसको वालुका-यन्त्र कहते हैं ॥ २६–३१ ॥ वालुका, लवण और भस्म यन्त्र

५४ रसतरङ्गिणी लवणयन्त्रम् लवणस्य च निक्षेपादेवं लवणयन्त्रकम् । प्रकीर्तितं भिषग्वर्यैर्मृगाङ्कादिरसार्थकम् ॥ ३२ ॥ भा.टी.—वालुकायन्त्र में जहाँ हाँडी में बालू भरी जाती है वहाँ यदि बालू के स्थान में नमक भरकर पकाया जाय तो इसे लवण-यन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा मृगांकरस आदि का निर्माण किया जाता है ॥ ३२ ॥ पुटयन्त्रम् पुटनीयं तु कुम्भादौ विन्यस्यावृणुयात् पुनः । पिधानेन दृढेनाथ विदध्यात्सन्धिबन्धनम् ॥ ३३ ॥ करीषाग्नौ चुल्लिकायां वा पचेदग्निमानवित् । लोहादीनां मारणार्थं पुटयन्त्रं प्रशस्यते ॥ ३४ ॥ पुटयन्त्रम्—आवृणुयात् आच्छादयेदिति ॥ ३३, ३४ ॥ भा.टी.—किसी हाँडी या सकोरे में पुट देने योग्य वस्तु भरकर उसके मुख को ढक्कन से अच्छी तरह बन्दकर सन्धिलेप करके सुखा दें, पश्चात् इस पात्र को चूल्हे या उपलों की अग्नि में रखकर द्रव्य के अनुसार पाक करें। इसे पुटयन्त्र कहते हैं। यही यन्त्र साधारण रूप से लोह अभ्रक आदि को पुट देने के काम आता है ॥ ३३–३४ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्रम् नीरपूरितगर्भं तु पात्रे पात्रं निवेशयेत् । पार्श्वयोः कर्णिकापेतं द्रव्यक्वाथप्रपूरितम् ॥ ३५ ॥ चुल्लिकायां निधायाथ वह्निं प्रज्वालयेद्बुधः । संशोषयेत्ततः क्वाथं यावदायाति चूर्णताम् ॥ ३६ ॥ बाष्पेन स्वेदनं यस्माद् रसतन्त्रविशारदैः । तस्माद्यन्त्रमिदं ख्यातं बाष्पस्वेदनसंज्ञकम् ॥ ३७ ॥ वन्यौषधिविशेषाणां सत्त्वनिर्माणसाधकम् । यन्त्रमेतत्समाख्यातं भिषजां सुखहेतवे ॥ ३८ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्रम्—वन्यौषधिसत्त्वनिर्माणसाधनं निगदव्याख्यातम् ॥३५-३८॥ भा.टी.—एक बड़े से पात्र में जल ( ३/४ भाग ) भर दें, अब एक दूसरे पात्र में जिसके दोनों तरफ एक-एक कड़ा या पकड़ने के लिए कुण्डे लगे हों,

चतुर्थस्तरङ्गः ५५ औषधियों का काथ या स्वरस भरकर इस अर्ध जल-पूरित पात्र में टिकाकर बड़े जलवाले पात्र को चूल्हे पर रखें और अग्नि जलायें। जब अग्नि ताप से काथ आदि द्रव्य चूर्ण रूप में रह जाय तो पात्र को नीचे उतार लें। क्योंकि इस विधि से जल वाष्प द्वारा औषधि का स्वेदन किया जाता है। अतः इसे बाष्प- स्वेदन यन्त्र कहते हैं। इस यन्त्र के द्वारा वनौषधियों के सत्त्वनिर्माण कार्य में बड़ी सुविधा होती है ॥ ३५-३८ ॥ बाष्पस्वेदनयन्त्र का दूसरा प्रकार स्वेद्य द्रव्य तृण का जाली जल

५६ रसतरङ्गिणी दर्विकायन्त्रम् चषकं दर्विकाकल्पं दीर्घहस्तकसंयुतम् । दर्विकायन्त्रमेतद्धि गन्धशोधनसाधकम् ॥ ३६ ॥ भा.टी.—एक ऐसा प्याला, जिसका आकार करछी की तरह हो बनायें। इसमें करछी की तरह ही एक या डेढ़ हाथ लम्बा बेंत लगा दें। इसे दर्विका- यन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा गंधक, रांगा, सीसा आदि का शोधन किया जाता है ॥ ३६ ॥ वक्तव्य—यह यन्त्र एक प्रकार की करछी ही समझना चाहिए। करछी की बेंत छोटी और धातु की होती है जिससे वह शीघ्र ही गरम हो जाती है। अतः लकड़ी का बेंत लगा दिया जाय तो बड़ी सुविधा रहती है। पालिकायन्त्रम् एतदेव हि यन्त्रन्तु नतहस्तकसंयुतम् । पालिकायन्त्रमुद्दिष्टं रसन्त्रविचक्षणैः ॥ ४० ॥ पालिकायन्त्रम्—तैलपात्रात्तैलोद्धारार्थमधुनापि प्रयुज्यमानं “पैला” इति भाषायाम्, तत्प्रयोगश्च रसेंद्रसारसंग्रहे कपर्दभस्मनिर्माणाय ॥ ४० ॥ पालिकायन्त्र

चतुर्थस्तरङ्ग ५७ भा.टी.—किसी प्याले या करछी में यदि सीधी डण्डी के स्थान पर ऊपर को डण्डी करके उसको अन्त में कुछ मोड़ दिया जाय तो उसे पालिकायन्त्र कहते हैं। इसका आकार ठीक तैल निकालने के लिए बनायी गयी पैली की तरह होता है ॥४०॥ डमरुकाख्ययन्त्रम् स्थालिकोपरि विन्यस्य स्थालीं न्युब्जतयापराम् । पचेद्यथाक्रमं त्वेतद्यन्त्रं डमरुकाह्वयम् ॥ ४१ ॥ डमरुसमाकारं डमरुयन्त्रम्—अत्र केचिदधःस्थालीमुखमुपरितनस्थालीमुखा- न्तर्गतमिच्छन्ति सम्यग् द्रव्यपातार्थम् । एतत्प्रयोगो हिङ्गुलात्पारदोत्थापने गन्ध- कशोधनकर्मणि च । अनेन न गन्धकशुद्धिर्वद्द्यते ॥ ४१ ॥ भा.टी.—एक हाँडी के मुख पर दूसरी उसी प्रकार की हाँडी को औंधा मुख जोड़कर सन्धिलेप करके डमरु के आकार का यन्त्र बना लेने को डम- रुयन्त्र कहते हैं। यह पारद, संखिया आदि उड़ाने के काम आता है ॥४१॥ नाडिकायन्त्रम् घटे तु चुल्लिकासंस्थे निक्षिपेत्सलिलादिकम् । अधोमुखं घटं त्वन्यं मुखे तस्य निधापयेत् ॥ ४२ ॥ उभयोर्मुखमालिप्य मृदा संशोषयेत्ततः । उपरिस्थे ततो भाण्डे नाडिकान्तु निवेशयेत् ॥ ४३ ॥ एतान्तु नाडिकां प्राज्ञो यत्नतः कुण्डलीकृताम् । जलद्रोण्यां विनिक्षिप्य भित्त्वा चाथ निवेशयेत् ॥ ४४ ॥ काचकूपीमुखे सम्यक्, वह्निं प्रज्वालयेत्ततः । यावद् घटस्थितद्रव्यसारो यातीह बाष्पताम् ॥ ४५ ॥

५८ रसतरङ्गिणी एतद्धि नाडिकायन्त्रं भिषग्भिः परिकीर्तितम् । परिस्रुताम्बुनिर्माणे विशेषेण प्रयुज्यते ॥४६॥ नाडिकायन्त्रम्—परिस्रुताम्बु इत्युपलक्षणम्, तेन सुरादिनिर्माणोऽपि बोद्ध- व्यम् ॥ ४२-४६ ॥ भा.टी.—एक घड़े या पात्र में जल आदि द्रव द्रव्य भरकर उसके मुख पर एक दूसरा घड़ा औंधामुख रख के दोनों के मुखों को अच्छी तरह मिट्टी से लीप कर सन्धिबन्धन कर दें। अब ऊपर के घड़े की पेंदी पर एक तरफ एक अंगुष्ठ- प्रमाण छिद्र करके उसमें एक नली फिट कर दें। यह नली नीचे को आकर कुंड- लाकार बना दी जाय और एक शीतल जल के टव में से इसे पार करते हुए इसका दूसरा सिर टव के बाहर रखी हुई बोतल के मुख से लगा दें। अब जलादि से पूर्ण घड़े या पात्र के नीचे अग्नि जलावें। अग्नि के ताप से घड़े में पड़े हुए द्रव्यों का सार वाष्प रूप में उड़कर नली के सहारे बोतल में बिन्दु रूप से इकट्ठा होता जायगा। इसको नाडिकायंत्र कहते हैं। इस यन्त्र द्वारा शुद्ध जल (Distiled Water) अथवा अर्क या सञ्जीवनी सुरा आदि निकाले जाते हैं ॥४२-४६॥ नळिका शीतल जलपूर्ण टब पातालयन्त्रम् भूमौ हस्तमितं निम्नं विदध्याद् गर्त्तमुत्तमम् । तस्मिन् पातं निधायाथ तद्रूपं पात्रमन्यकम् ॥ ४७ ॥ आददीत ततस्तस्मिन्नौषधानि निधापयेत् । आस्यमस्य शरावेण छिद्रगर्भेण रोधयेत् ॥ ४८ ॥

चतुर्थस्तरङ्गः ५६ पात्रमेतत्तु गर्तस्थे पात्रे यत्नेन विन्यसेत् । विदध्यादनयोर्यत्नात् सुदृढं सन्धिबन्धनम् ॥४९॥ मृदा सम्पूर्य गर्तन्तु वह्निं दद्यात् प्रयोगवित् । स्वांगशीतं ततो ज्ञात्वा रसतन्त्रविचक्षणः ॥५०॥ उपरिस्थन्तु वै पात्रं शनैः समवतारयेत् । अधःपात्रगतं तैलं गृह्णीयात्तु विधानतः ॥५१॥ एतद् बुधैः समाख्यातं यन्त्रं पातालसंज्ञकम् । आहर्तुं गन्धकादीनां तैलमेतत्प्रयुज्यते ॥५२॥ पातालयन्त्रम्—सुबोधम् ॥ ४७-५२ ॥ भा.टी.—जमीन में एक हाथ गहरा गढ़ा खोदकर उसमें एक पात्र रख दें। अब ऐसा ही एक दूसरा पात्र लें और इसमें औषधि भर दें और इसके मुख को बहुत सूक्ष्म छिद्रयुक्त एक शराव से बन्द करके औंधामुख इस शराव सहित पात्र को गढ़ेवाले पात्र के मुख पर अच्छी तरह टिकाकर दोनों की मुखसन्धि को कपड़मिट्टी कर दें। अब गढ़े के रिक्त स्थान को मिट्टी से भर

[चित्र-संकेत: कोयले, औषधि, जाली, प्याला]

६० रसतरङ्गिणी दें और ऊपरवाले पात्र की पेंदी पर उपलों की अग्नि जलायें। जब अग्नि स्वतः शान्त हो जाय तो ऊपर के पात्र को धीरे से उठाकर अलग रख दें । निचले पात्र में इकट्ठे हुए तेल को निकाल लें। इसे पाताल यन्त्र कहते हैं। यह यन्त्र गन्धक आदि द्रवों के तेल निकालने के काम आता है ॥ ४७-५२ ॥ खल्लयन्त्रम् चषकोपममत्यच्छं सुदृढ पिच्छिलोपमम् । सच्छिलाविहितं पात्रं खल्लयन्त्रमिहोच्यते ॥५३॥ भा.टी.—गोल प्याले की भांति अच्छे पत्थर के बने हुए चिकने और मजबूत साफ पात्र को खल्लयन्त्र (खरल) कहा जाता है ॥ ५३ ॥ खल्लयन्त्रस्य प्रयोजनम् रसोपरसलोहादेः पेषणादिककर्मणि । रसतन्त्रक्रियादक्षैः खल्वयन्त्रं प्रयुज्यते ॥५४॥ भा. टी.—रस, उपरस, लोह आदि को पीसने-घोटने आदि के कामों में विभिन्न प्रकार के खरलों का प्रयोग होता है ॥ ५४ ॥ खल्लयन्त्रस्य द्वैविध्यम् खल्लयन्त्रं द्विधा प्रोक्तं रसतन्त्रे विशेषतः । प्रथमं वर्तुलाकारं द्रोणीरूपं द्वितीयकम् ॥५५॥ भा. टी.—रस-शास्त्र में खरल दो प्रकार के बनाये गये हैं—१— गोलाकार, २—द्रोणीरूप (किश्तीनुमा खरल ) ॥ ५५ ॥ वर्तुलः खल्वः विस्तारे तपनांगुलः समतलो नीलाब्जतुल्यप्रभः निम्नत्वे च नवांगुलः सुमस्सृणो रुद्रांगुलोच्छ्रायवान् । भित्त्या द्वयंगुलसंमितः खलु यथा चेन्द्रांगुलो घर्षकः खल्वोऽयं खलु वर्तुलो निगदितः सूतादिसिद्धिप्रदः ॥५६॥ वर्तुलखल्वः—तपनाङ्गुलः द्वादशाङ्गुलः, रुद्राङ्गुलः एकादशाङ्गुलः, इन्द्रा- ङ्गुलश्चतुर्दशाङ्गुलः ॥ ५६ ॥ भा.टी.—गोल खरल चौड़ाई में बारह अंगुल, गहराई में नौ अंगुल और ऊँचाई में ग्यारह अंगुल होना चाहिए । इसका सब प्रदेश सम होना चाहिए । यह अत्यन्त चिकना और नील कमल के वर्ण का होना चाहिए । इसकी दीवारें दो अंगुल मोटी बनानी चाहिए । । इसकी मूसली १४ अंगुल लम्बी बनानी

चतुर्थस्तरङ्गः ६१ चाहिए। इस प्रकार के खरल को वर्तुल ( गोल ) खरल कहते हैं। इसमें पारद आदि का घर्षण-मर्दन आदि कार्य किया जाता है ॥ ५६ ॥ द्रोणीरूपः खल्वः उत्सेधे तुरगांगुलः खलु कलातुल्यांगुलश्चायतौ विस्तारे तपनांगुलश्च मसृण। भित्त्या च वै द्वयंगुलः । घर्षः सूर्यसमांगुलः सुविशदो लोहादिभिर्निर्मितः खल्वोऽयं रससिद्धिकृन्निगदितो द्रोणीनिभोऽत्युत्तमः ॥५७॥ द्रोणीखल्वः—तुरगांगुलः सप्तांगुलः, कलातुल्यांगुलः षोडशांगुलः । आयतौ दैर्ये । तपनसूर्य्यशब्दाभ्यां द्वादशाङ्गा ग्राह्याः ॥ ५७ ॥ भा.टी.—यह खरल ऊँचाई में सात अंगुल, लम्बाई में सोलह अंगुल, बीच की चौड़ाई में बारह अंगुल चिकना बनाना चाहिए। इसकी चारों तरफ की दीवारें दो-दो अंगुल मोटी होनी चाहिए। साथ ही इसकी एक लोह पाषाण आदि की बनी हुई साफ बारह अंगुल की मूसली भी होनी चाहिए। इस प्रकार के खरल को द्रोणीरूप खरल कहते हैं ॥ ५७ ॥ उलूखलयन्त्रम् दशांगुलन्तु विस्तारे तूत्सेधे षोडशांगुलम । त्रयोदशांगुलं चैव निम्नत्वेन च संदृढम् ॥ ५८ ॥ अयसा निर्मितञ्चैव मध्येऽतिमसृणीकृतम् । विंशत्यंगुलदीर्घश्च लोहदण्डः सुशोभनः ॥ ५६ ॥ उलूखलाभिधं यन्त्रं बुधैरेतत्प्रकीर्तितम् । ताप्यादीनां कुट्टनार्थं यन्त्रमेतत्प्रयुज्यते ॥ ६० ॥ लघूनि चाथ दीर्घाणि युक्त्या यन्त्राणि कारयेत् । द्रव्यमानाानुकूल्येन विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ ६१ ॥ यन्त्राण्येतानि प्रोक्तानि दिग्दर्शनतया मया । अध्येतॄणां शिशूनान्तु सुखबोधाय सत्वरम् ॥ ६२ ॥ इति यन्त्रविज्ञानीयो नाम चतुर्थस्तरङ्गः उलूखलयन्त्रे—ताप्यं माक्षिकम् । स्पष्टमन्यत् ॥ ५८–६२ ॥ भा.टी.—उलूखल ( इमामदस्ता ) सोलह अंगुल ऊँचा, दश अंगुल विस्तृत ( चौड़ा ), तेरह अंगुल गहरा, अत्यन्त चिकना मजबूत लोहे का

६२ रसतस्रङ्गिणी

बनाना चाहिए। इसकी मूसली भी लोहे की बीस अंगुल लम्बी सुन्दर चिकनी होनी चाहिए। इस प्रकार के यन्त्र को विद्वान् लोग उलूखल (ऊखल) यन्त्र कहते हैं। सोनामाखी, रूपामाखी, लोहचूर्ण, ताम्रचूर्ण आदि कूटने के लिए इसे काम में लिया जाता है। इसके अतिरिक्त द्रव्य की मात्रा की अपेक्षा करके छोटे-बड़े अनेक अन्य यन्त्र भी बनाये जा सकते हैं। रस शास्त्र पढ़ने- वाले बालकों को जल्दी ही समझ में आनेवाले इन कुछ-कुछ यन्त्रों का यहाँ मार्ग दर्शन करा दिया है। अर्थात् शास्त्रों में और भी ढेकी आदि यंत्र पाये जाते हैं। उनको आवश्यकतानुसार शास्त्रविधि से बनाकर काम में लाना चाहिए ॥ ५८-६२ ॥

इष्टिकायन्त्र

जमीन में एक गोलाकार गर्त (गढ़ा) बनाकर उस पर एक मोटा शराव या प्याला रख दें, अब इसके ऊपर बीच में आवश्यकतानुसार दो अंगुल चौड़ा गहरा गढ़ा की हुई ईंट जमाकर ईंट के गर्त के चारों तरफ एक अंगुल ऊँची पालिक (थाँला, मेंड़) बना दें। पश्चात् ईंट के गढ़े में पारद भरकर गढ़े के मुँह पर एक दृढ़ वस्त्र बाँध दें, फिर इस वस्त्र के ऊपर गन्धक डालकर दूसरे शराव से ढक दें और शराव तथा पालि के बीच सन्धि को अच्छी तरह मिट्टी से बन्द कर दें। अब शराव के ऊपर जंगली उपलें रखकर कपोतपुट के रूप में अग्नि लगा दें। कपोतपुट में अग्नि तीव्र नहीं देनी चाहिए। क्योंकि तीव्र अग्नि से पारद- गन्धक उड़ जाने की सम्भावना रहती है। इसको इष्टिकायन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा गन्धक का जारण किया जाता है। (र. र. स.)

जारणायन्त्र

बारह अंगुल प्रमाण लम्बी छः अंगुल चौड़ी लोहे की एक मूषा और पौने

चतुर्थस्तरङ्गः ६३ बारह अंगुल लम्बी पौने छः अंगुल चौड़ी दूसरी लोहे की मूषा इस प्रकार लोहे की दो मूषा बनावें । पौने बारह अंगुल- वाली मूषा के लम्बाई पारद- वाले भाग में चारों तरफ कुछ बारीक छिद्र करके उसमें पारद के समभाग शुद्ध गन्धक का चूर्ण भर दें । और दूसरी लोह मूषा में पारद भरकर इसमें गन्धक- वाली मूषा को मुख की तरफ से अच्छी तरह फँसाकर दृढ़ करके चूना मण्डूर आदि के कल्क से लेपकर सुखा दें, फिर एक चौड़े नाद में जल भरकर उसके मुख पर बीच में पारदवाली मूषा प्रमाण चौड़ा छिद्रकर एक दूसरा पात्र टिका दें । इस पात्र के छिद्र में पारदवाली मूषा इस तरह फसावें जिससे इसका पारदवाला भाग मात्र जल में डूबा रहे । अब अवशिष्ट मूषा के नीचे ऊपर कोयले या उपलों की अग्नि देवें । इस क्रिया से गन्धक जीर्ण होता है । अतः इसे “जारणायन्त्र” कहते हैं ( र. र. स. ) । सोमनालयन्त्र पारद में गन्धक जारण करने के लिए जिस विधि में पारद- वाली मूषा के नीचे जल और ऊपर अग्नि दी जाती है उसे “सोमनाल यन्त्र” विधान कहा जाता है । इस यन्त्र का उपयोग पारद में गगन आदि को जारण करने के लिए किया जाता है । इसके बनाने की विधि यह है कि एक मिट्टी के पात्र में जल भर

६४ रसतरङ्गिणी कर उसके ऊपर जल को स्पर्श करती हुई एक पारदयुक्त मूषा रखकर (कच्छ- पयन्त्र की भाँति) उसको शराव से बन्द करके जारणायन्त्र या कच्छपयंत्र की भाँति अग्नि देवें । अन्यत्र सोमनालयन्त्र कें लक्षण इस प्रकार पाये जाते हैं- “गजवेल्लिग्रहं सम्यक् पात्रेऽधोमुखविस्तरे । तदर्द्धाच्छादनं रम्यं सोमनाल- मिहोदितम् ॥” रसपद्धति की टीका में इसे माक्षिक सत्त्व तथा अभ्रकसत्त्व के जारणार्थ प्रयोग में लिया है । क्योंकि इस यन्त्र में नीचे सोम ( जल ) भरा रहता है, बीच में मूषा के भीतर पारद रहता है और ऊपर अग्नि जलाते हैं । अतः इसे सोमनालयन्त्र कहा जाता है । ( र. र. स. ) हंसपाकयन्त्र एक खर्पर (मिट्टी के बनेहुए पतले चौड़े कुण्डे) में किनारों तक वालुका भर उसके ऊपर दूसरा चौड़ा ठीकरा या कुण्डा रख उसके ऊपर जवाखार आदि पञ्चक्षार तथा पाँचों नमक तथा पूर्वोक्त विड द्रवों को गोमूत्र के साथ एकत्र पीसकर रखें और धीरे २ मन्द अग्नि से पकावें । हंसपाकयन्त्र उत्तम वार्तिककारों ने इसे “हंस पाकयन्त्र” नाम से कहा है । हंस सूर्य को कहते हैं, इस यन्त्र में अग्नि प्रखर सूर्य की किरणों के बराबर देकर पाक किया जाता है। अतः इसे हंसपाक नाम से लिखा है । वह यन्त्र विड के पाकार्थ प्रयुक्त होता है । ( .र र. स. ) नाभियन्त्र लौह अथवा मिट्टी के तल भाग में पर्याप्त मोटी एक थाली बनावें । इसके किनारे चार अंगुल ऊँचे हों, इसके बीच में पारद-गन्धक आने योग्य एक

५ चतुर्थस्तरङ्गः ६५ गर्त बनाकर इसमें पारद गन्धक की कजली डाल दें । गर्त के चारों तरफ एक अंगुल ऊँची कुड्य ( पाली मेंड या दीवार ) बनावें । अब एक ऐसी गोस्तना- कार ( गाय के थन के समान आकार अर्थात् आगे को कुछ पतली गोल और पीछे को चौड़ी चपटी ) मूषा लें, जो कुड्य पर अच्छी तरह जम सकती हो, उसे जमाकर अर्थात् पाली को मूषा से अच्छी तरह ढककर तोय-मृत्तिका से इसकी सन्धियों को अच्छी तरह बन्द कर दें । ( र. र. स. ) धूपयन्त्र एक ऐसा लोहे का पात्र लें जो आठ अंगुल ऊँचा, आठ अंगुल चौड़ा हो । उसमें गन्धक, हरताल तथा मैनसिल धूपन द्रव्य ( धुआँ देनेवाले ) जिनसे स्वर्ण तथा रजतपत्रों को धुँआ देना हो, डाल दें । अथवा सीसाभस्म डाल दें । उस पात्र में कण्ठ प्रदेश के नीचे निर्मित जलाधार पर पतली- पतली लोहे की शलाकायें ( या लोहे की पतली जाली ) लगा दें । उन शलाकाओं या जाली पर स्वर्ण के बारीक कण्टकवेधी पत्र रख दें । अब इस लोहपात्र के ऊपर दूसरा लोहपात्र उलटा मुख रखकर कपड़मिट्टी से

६६ रसतरङ्गिणी सन्धिबन्द करके सुखा लें। इस यंत्र को चूल्हे पर रखकर नीचे मन्द-मन्द अग्नि जलायें। इस प्रकार धूप देने से स्वर्णपत्र काले और भस्म रूप में हो जाते हैं। जिन्हें पारद शीघ्र ही खा जाता है और वे पत्र पारद में शीघ्र ही द्रवरूप हो जाते हैं। अर्थात् शीघ्र गर्भद्रुति हो जाती है। तारकर्म अर्थात् चाँदी के पात्रों को धूपन करने में चाँदी के पात्रों को वंग या वंगभस्म से धूपन किया जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त अन्यान्य उपरसों द्वारा भी धूपन किया जाता है। जारणार्थ द्रव्य को प्रस्तुत करने के लिए इस धूपयन्त्र का प्रयोग होता है। (र. र. स.) कोष्ठीयन्त्र धातुओं का सत्त्वपातन करने के लिये सामान्यतः १६ अंगुल व्यास की और एक हाथ ऊँची जो भट्टी बनायी जाती है, उसे कोष्ठीयन्त्र कहते हैं। कोष्ठीयन्त्र बनाने के लिये एक बालिस्त लम्बी छः अंगुल चौड़ी दो दृढ मूषा बना लें। पहिले

चतुर्थस्तरङ्ग ६७ एक मूषा को सीधा मुख जमीन में गाड़ दें, उसके मुख पर दूसरी मूषा में सत्त्वपातनार्थ द्रव्यों को भरकर और उसके मुख पर एक छिद्रयुक्त शराव टिका- कर औंधामुख करके रख दें । और दोनों मूषा मुखों का सन्धि-बन्धन कर दें । अब लोहारों की भाँति ऊपर की मूषा के चारों तरफ नीचे से ऊपर को चौड़ा कोयलों को रखने का एक आधार ( सोलह अंगुल ऊँचा ) बनावें । इसमें कोयले भर दें । इस आधार के ऊपर की मूषा के कण्ठ प्रदेश के सामने जमीन पर धौंकनी द्वारा हवा देने के लिये एक छिद्र भी बना दें । अब भट्ठी में कोयले डालकर बीच में मूषा रख धौंकनी से धौंककर आवश्यकतानुसार मात्रा में अग्नि को तीव्र करना चाहिए ।

वलभीयन्त्र

एक बृहदाकार गोल लोहे का पात्र या टब बनायें, इसके भीतरी कण्ठप्रदेश पर आमने- सामने दो कड़े बनायें । इसी प्रकार इस पात्र के मुख में आने योग्य दूसरा लोहपात्र बनायें, किन्तु इसके बाह्य कण्ठ प्रदेश पर दो कड़े बनायें । अब बड़े पात्र में कजली भरकर इसके मुख पर दूसरा पात्र अच्छी तरह फँसा देवें और इसमें मूर्च्छित पारद डालकर इसको चूल्हे पर रखकर छः घण्टे की अग्नि दें । यह पारद की मूर्च्छना को दूरकर उसमें पुनः जागृति उत्पन्न करने के लिये प्रयुक्त होता है । इसे वलभी ( कड़ा ) यन्त्र कहते हैं ।

६८ रसतरङ्गिणी स्वेदनीयन्त्र जल अथवा द्रव द्रव्य (स्वरस, कषाय, काञ्जी, दुग्ध आदि) को एक हाँडी में भर कर फिर इस वस्त्र के ऊपर पाक्य (स्वेद्य) द्रव्य को रख ऊपर से किसी शराव से ढक दें, फिर इस हाँडी को चूल्हे पर चढ़ा कर पकावें। इस प्रकार जो स्वेदन द्वारा पाक किया जाता है उसे "स्वेदनीयन्त्र" विधान कहते हैं। (र. र. स.) पातनायन्त्र एक हाँडी जिसके पेंदे का व्यास १६ अंगुल हो, लें, उसको उलटाकर उसकी पीठ पर एक जलाधार (पाली या थांला) बनावें। जलाधार की लम्बाई १० अंगुल, चौड़ाई ८ अंगुल और ऊँचाई ४ अंगुल, होनी चाहिये। पश्चात् एक दूसरी हाँडी जिसका मुख पहिली हाँडी से कुछ कम चौड़ा हो और ऊपर की हाँडी के मुख में जा सके, लें। अब इस हाँडी को नीचे सीधी रखकर उसमें पारद या हिंगुल आदि द्रव्य डाल दें। तदनन्तर जला- धारयुक्त हाँडी को औंधा मुँह कर पारदयुक्त हाँडी के मुख को उस हाँडी के मुख में प्रविष्ट कर दें। दोनों हाँडियों की मुखसन्धि पर भैंस का दूध, चूना,

चतुर्थस्तरङ्गः ६३ मण्डूर, फाणित (सीरा) इन्हें एकत्र मिलाकर अच्छी तरह लेप कर दें और शुष्क कर लें । सूखने के बाद यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ाकर जलाधार में जल भर दें । इसको 'पातनायन्त्र' कहते हैं । (र. र. स.) पातालयन्त्र का एक अन्य प्रकार चूल्हे पर एक मिट्टी की नाँद को औंधा रखें और नाँद के ऊपर लोहे या मिट्टी की एक परात रखें । बराबर परात और नाँद के बीच में एक छेद करें । अथवा चूल्हे पर औंधी परात रख इसके ऊपर दूसरी एक बड़ी परात रखें, फिर बराबर दोनों के बीच में छेद करें । अथवा एक ही परात रख उसमें छेदकर शीशी को लोहे की तार के आधार से सम्हाल कर रख लें ! छेद इतना बड़ा करें कि उसमें से शीशा का मुख नीचे चूल्हे में ४ अंगुल बाहर निकले, शीशी पर ५-७ कपड़मिट्टी करें । अब जिस औषधि का तेल निकालना हो उसे शीशी में भर शीशी के मुँह में लोहे के तारों की जाली डालकर मुख बन्द कर दें जिससे औषधि बाहर न गिर जाय और तेल बराबर झरता रहे । फिर इस शीशी को परात में रख दोनों की सन्धि को मिट्टी से बन्द कर दें और चूल्हे के भीतर शीशी के नीचे एक कांच का ग्लास रख दें जिसमें तेल गिरता रहे । शीशी और ग्लास दोनों एक नली के भीतर रहें । ऐसी लोहे के पत्र की नली बनाकर रखें जिससे तेल भाफ के साथ उड़ न जाय, किन्तु ग्लास में बराबर टपकता रहे । इस तरह करने के बाद ऊपर- वाली परात में अग्नि देते रहें जिससे तेल टपकता रहेगा । ऊपर अग्नि, जब तक तेल टपके, देते रहें । तेल निकलना बन्द होने पर अग्नि देना बन्द कर दें । चूल्हे पर नाँद रखकर यन्त्र तैयार करने से बाहर से तेल टपकता हुआ दिखाई दे सकता है । उष्मायन्त्र एक पात्र या हाँडी में जल काञ्जी भरें और पात्र के ऊपर एक लोह- शलाका रख दें । अब बादाम, पिस्ता अथवा अन्य तेल निकालने की औषधि को कूटकर पोटली बना बाँधकर एक डोरे से उक्त शलाका में लटका दें ।

७० रसतरङ्गिणी

(ऊपर के चित्र में लिखित शब्द: 'औषधि-पोटली', 'द्रव')

जल या काञ्जी से पोटली ऊँची रहनी चाहिए । उसमें केवल भाफ लगनी चाहिए । इस तरह यन्त्र तय्यार होने पर उसे चूल्हे पर रख कर मन्द-मन्द अग्नि दें । जब औषधि स्विन्न ( पसीजना ) हो जाय तो पोटली को निकालकर उसका तेल निचोड़ लेवें । इसे उष्पायन्त्र अथवा स्वेदनयन्त्र भी कहते हैं ।

आकाशपातनयन्त्र

(नीचे के चित्र में लिखित शब्द: 'शीतल जलपूर्ण पात्र', 'औषधि', 'बाष्पबिन्दु', 'गिलास', 'औषधि')

एक मिट्टी की खुले मुँहवाली हाँड़ी लें । उसके पेंदे में भीतर मिट्टी का लेप करके उस पर एक ईंट जमा दें । ईंट के चारों तरफ जिस औषधि का अर्क या तेल निकालना हो उसे डाल दें । अब इस ईंट पर एक चीनी-मिट्टी का ग्लास रख दें । हाँड़ी के मुख पर ताम्बे की एक ऐसी डेगची रख दें जिसके बाहर चारों तरफ कलई की हो । फिर हाँडी और डेगची की सन्धि पर गेहूँ का आटा अथवा कपड़मिट्टी से लेप कर दें—जिससे भाफ बाहर न निकल सके । इस तरह यन्त्र तैयार होने पर उसको चूल्हे पर रख दें और ऊपर की डेगची में