रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ रसतरङ्गिणी सन्धिबन्द करके सुखा लें। इस यंत्र को चूल्हे पर रखकर नीचे मन्द-मन्द अग्नि जलायें। इस प्रकार धूप देने से स्वर्णपत्र काले और भस्म रूप में हो जाते हैं। जिन्हें पारद शीघ्र ही खा जाता है और वे पत्र पारद में शीघ्र ही द्रवरूप हो जाते हैं। अर्थात् शीघ्र गर्भद्रुति हो जाती है। तारकर्म अर्थात् चाँदी के पात्रों को धूपन करने में चाँदी के पात्रों को वंग या वंगभस्म से धूपन किया जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त अन्यान्य उपरसों द्वारा भी धूपन किया जाता है। जारणार्थ द्रव्य को प्रस्तुत करने के लिए इस धूपयन्त्र का प्रयोग होता है। (र. र. स.) कोष्ठीयन्त्र धातुओं का सत्त्वपातन करने के लिये सामान्यतः १६ अंगुल व्यास की और एक हाथ ऊँची जो भट्टी बनायी जाती है, उसे कोष्ठीयन्त्र कहते हैं। कोष्ठीयन्त्र बनाने के लिये एक बालिस्त लम्बी छः अंगुल चौड़ी दो दृढ मूषा बना लें। पहिले