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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

६६ रसतरङ्गिणी सन्धिबन्द करके सुखा लें। इस यंत्र को चूल्हे पर रखकर नीचे मन्द-मन्द अग्नि जलायें। इस प्रकार धूप देने से स्वर्णपत्र काले और भस्म रूप में हो जाते हैं। जिन्हें पारद शीघ्र ही खा जाता है और वे पत्र पारद में शीघ्र ही द्रवरूप हो जाते हैं। अर्थात् शीघ्र गर्भद्रुति हो जाती है। तारकर्म अर्थात् चाँदी के पात्रों को धूपन करने में चाँदी के पात्रों को वंग या वंगभस्म से धूपन किया जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त अन्यान्य उपरसों द्वारा भी धूपन किया जाता है। जारणार्थ द्रव्य को प्रस्तुत करने के लिए इस धूपयन्त्र का प्रयोग होता है। (र. र. स.) कोष्ठीयन्त्र धातुओं का सत्त्वपातन करने के लिये सामान्यतः १६ अंगुल व्यास की और एक हाथ ऊँची जो भट्टी बनायी जाती है, उसे कोष्ठीयन्त्र कहते हैं। कोष्ठीयन्त्र बनाने के लिये एक बालिस्त लम्बी छः अंगुल चौड़ी दो दृढ मूषा बना लें। पहिले

चतुर्थस्तरङ्ग ६७ एक मूषा को सीधा मुख जमीन में गाड़ दें, उसके मुख पर दूसरी मूषा में सत्त्वपातनार्थ द्रव्यों को भरकर और उसके मुख पर एक छिद्रयुक्त शराव टिका- कर औंधामुख करके रख दें । और दोनों मूषा मुखों का सन्धि-बन्धन कर दें । अब लोहारों की भाँति ऊपर की मूषा के चारों तरफ नीचे से ऊपर को चौड़ा कोयलों को रखने का एक आधार ( सोलह अंगुल ऊँचा ) बनावें । इसमें कोयले भर दें । इस आधार के ऊपर की मूषा के कण्ठ प्रदेश के सामने जमीन पर धौंकनी द्वारा हवा देने के लिये एक छिद्र भी बना दें । अब भट्ठी में कोयले डालकर बीच में मूषा रख धौंकनी से धौंककर आवश्यकतानुसार मात्रा में अग्नि को तीव्र करना चाहिए ।

वलभीयन्त्र

एक बृहदाकार गोल लोहे का पात्र या टब बनायें, इसके भीतरी कण्ठप्रदेश पर आमने- सामने दो कड़े बनायें । इसी प्रकार इस पात्र के मुख में आने योग्य दूसरा लोहपात्र बनायें, किन्तु इसके बाह्य कण्ठ प्रदेश पर दो कड़े बनायें । अब बड़े पात्र में कजली भरकर इसके मुख पर दूसरा पात्र अच्छी तरह फँसा देवें और इसमें मूर्च्छित पारद डालकर इसको चूल्हे पर रखकर छः घण्टे की अग्नि दें । यह पारद की मूर्च्छना को दूरकर उसमें पुनः जागृति उत्पन्न करने के लिये प्रयुक्त होता है । इसे वलभी ( कड़ा ) यन्त्र कहते हैं ।

६८ रसतरङ्गिणी स्वेदनीयन्त्र जल अथवा द्रव द्रव्य (स्वरस, कषाय, काञ्जी, दुग्ध आदि) को एक हाँडी में भर कर फिर इस वस्त्र के ऊपर पाक्य (स्वेद्य) द्रव्य को रख ऊपर से किसी शराव से ढक दें, फिर इस हाँडी को चूल्हे पर चढ़ा कर पकावें। इस प्रकार जो स्वेदन द्वारा पाक किया जाता है उसे "स्वेदनीयन्त्र" विधान कहते हैं। (र. र. स.) पातनायन्त्र एक हाँडी जिसके पेंदे का व्यास १६ अंगुल हो, लें, उसको उलटाकर उसकी पीठ पर एक जलाधार (पाली या थांला) बनावें। जलाधार की लम्बाई १० अंगुल, चौड़ाई ८ अंगुल और ऊँचाई ४ अंगुल, होनी चाहिये। पश्चात् एक दूसरी हाँडी जिसका मुख पहिली हाँडी से कुछ कम चौड़ा हो और ऊपर की हाँडी के मुख में जा सके, लें। अब इस हाँडी को नीचे सीधी रखकर उसमें पारद या हिंगुल आदि द्रव्य डाल दें। तदनन्तर जला- धारयुक्त हाँडी को औंधा मुँह कर पारदयुक्त हाँडी के मुख को उस हाँडी के मुख में प्रविष्ट कर दें। दोनों हाँडियों की मुखसन्धि पर भैंस का दूध, चूना,

चतुर्थस्तरङ्गः ६३ मण्डूर, फाणित (सीरा) इन्हें एकत्र मिलाकर अच्छी तरह लेप कर दें और शुष्क कर लें । सूखने के बाद यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ाकर जलाधार में जल भर दें । इसको 'पातनायन्त्र' कहते हैं । (र. र. स.) पातालयन्त्र का एक अन्य प्रकार चूल्हे पर एक मिट्टी की नाँद को औंधा रखें और नाँद के ऊपर लोहे या मिट्टी की एक परात रखें । बराबर परात और नाँद के बीच में एक छेद करें । अथवा चूल्हे पर औंधी परात रख इसके ऊपर दूसरी एक बड़ी परात रखें, फिर बराबर दोनों के बीच में छेद करें । अथवा एक ही परात रख उसमें छेदकर शीशी को लोहे की तार के आधार से सम्हाल कर रख लें ! छेद इतना बड़ा करें कि उसमें से शीशा का मुख नीचे चूल्हे में ४ अंगुल बाहर निकले, शीशी पर ५-७ कपड़मिट्टी करें । अब जिस औषधि का तेल निकालना हो उसे शीशी में भर शीशी के मुँह में लोहे के तारों की जाली डालकर मुख बन्द कर दें जिससे औषधि बाहर न गिर जाय और तेल बराबर झरता रहे । फिर इस शीशी को परात में रख दोनों की सन्धि को मिट्टी से बन्द कर दें और चूल्हे के भीतर शीशी के नीचे एक कांच का ग्लास रख दें जिसमें तेल गिरता रहे । शीशी और ग्लास दोनों एक नली के भीतर रहें । ऐसी लोहे के पत्र की नली बनाकर रखें जिससे तेल भाफ के साथ उड़ न जाय, किन्तु ग्लास में बराबर टपकता रहे । इस तरह करने के बाद ऊपर- वाली परात में अग्नि देते रहें जिससे तेल टपकता रहेगा । ऊपर अग्नि, जब तक तेल टपके, देते रहें । तेल निकलना बन्द होने पर अग्नि देना बन्द कर दें । चूल्हे पर नाँद रखकर यन्त्र तैयार करने से बाहर से तेल टपकता हुआ दिखाई दे सकता है । उष्मायन्त्र एक पात्र या हाँडी में जल काञ्जी भरें और पात्र के ऊपर एक लोह- शलाका रख दें । अब बादाम, पिस्ता अथवा अन्य तेल निकालने की औषधि को कूटकर पोटली बना बाँधकर एक डोरे से उक्त शलाका में लटका दें ।

७० रसतरङ्गिणी

(ऊपर के चित्र में लिखित शब्द: 'औषधि-पोटली', 'द्रव')

जल या काञ्जी से पोटली ऊँची रहनी चाहिए । उसमें केवल भाफ लगनी चाहिए । इस तरह यन्त्र तय्यार होने पर उसे चूल्हे पर रख कर मन्द-मन्द अग्नि दें । जब औषधि स्विन्न ( पसीजना ) हो जाय तो पोटली को निकालकर उसका तेल निचोड़ लेवें । इसे उष्पायन्त्र अथवा स्वेदनयन्त्र भी कहते हैं ।

आकाशपातनयन्त्र

(नीचे के चित्र में लिखित शब्द: 'शीतल जलपूर्ण पात्र', 'औषधि', 'बाष्पबिन्दु', 'गिलास', 'औषधि')

एक मिट्टी की खुले मुँहवाली हाँड़ी लें । उसके पेंदे में भीतर मिट्टी का लेप करके उस पर एक ईंट जमा दें । ईंट के चारों तरफ जिस औषधि का अर्क या तेल निकालना हो उसे डाल दें । अब इस ईंट पर एक चीनी-मिट्टी का ग्लास रख दें । हाँड़ी के मुख पर ताम्बे की एक ऐसी डेगची रख दें जिसके बाहर चारों तरफ कलई की हो । फिर हाँडी और डेगची की सन्धि पर गेहूँ का आटा अथवा कपड़मिट्टी से लेप कर दें—जिससे भाफ बाहर न निकल सके । इस तरह यन्त्र तैयार होने पर उसको चूल्हे पर रख दें और ऊपर की डेगची में

पञ्चमस्तरङ्गः ७१ जल भर दें। नीचे और जलाने पर जब डेगची का जल गरम हो जाय तो उसे निकालकर ठंडा जल भरते रहें कि जिससे औषधि का अर्क (भाफ बन कर) डेगची के पेंदे में लगकर भीतर के ग्लास में टपकता रहे। दो-तीन घण्टे अग्नि देने पर सब अर्क ग्लास में इकट्ठा हो जाता है। यन्त्र को खोलकर सावधानी से ग्लास के अर्क या द्रव को छानकर रख लें। इस तरह शंखद्राव आदि निकाले जाते हैं। इसे आकाशपातनयन्त्र कहते हैं। तप्त खरल यन्त्र तप्त खरलविधि के पारद का मर्दन करने के लिए एक लोहे की ६ अंगुल लम्बी, ६ अंगुल गहरी खरल बनानी चाहिए। इसकी मूसली आठ अंगुल लम्बी होनी चाहिए। इसमें पारद डालकर तप्तखरलविधि से मर्दन करना चाहिए। (र. र. स.) इति यंत्रविज्ञानीय नाम चतुर्थ तरङ्ग समाप्त हुआ। अथ पारदस्य अष्टसंस्कारविज्ञानीयः पञ्चमस्तरङ्गः । पारदस्य नामानि रसो रसेन्द्रः सूतश्च रसेशश्च रसेश्वरः । चपलो रसराजश्च पारदश्च शिवाह्वयः ॥१॥ रसनादभ्रकादीनां धातूनां कीर्तितो रसः। अभ्रकाद्यधिराजत्वाद्रसेन्द्र इति कथ्यते ॥२॥

७२ रसतरङ्गिणी देहलोहमयीं सिद्धिं सूतेऽतः सूत उच्यते । स्वभावाच्चपलो यस्मात् ततोऽसौ चपलः स्मृतः ॥३॥ आतङ्कपङ्कमग्नानां पारदानाच्च पारदः । अभ्रादिरसराजत्वाद्रासराजः स्मृतो बुधैः ॥४॥ अत्र पारदनामानि तन्त्रव्यवहारसाधनानि, शिवाह्वयो यावच्छिवनामभि- र्वाच्यः । नामनिरुक्तिः शिष्यबोधार्था । रसनात् भक्षणात्, अधिराजत्वात् प्रधानत्वात्, देहसिद्धिः नीरोगता, लोहसिद्धिः स्वर्णादिरूपा, चपलश्चञ्चलः, आतङ्क एव पङ्कः, तत्र मग्नानां पारदानात् पारद इति ॥ १-४ ॥ पारद के नाम भा.टी.—रस, रसेन्द्र, सूत, रसेश्वर, चपल, रसराज, पारद; ये सब पारे के नाम कहे जाते हैं । इसके अतिरिक्त शिव के जितने नाम हैं वे सभी पारे के नाम कहे जाते हैं । अभ्रक आदि महारसों तथा स्वर्णा आदि धातुओं का भक्षण करने के कारण पारद को रस शब्द से कहा जाता है । अभ्रक आदियों में सर्वोपरि होने के कारण इसे रसेन्द्र कहते हैं । शरीर में स्वास्थ्य उत्पादन करने तथा स्वर्णादि धातुओं को बनाने के कारण इसे सूत कहते हैं । यह स्वभावतः चंचल होता है, अतः इसे चपल भी कहते हैं । रोगरूपी कीचड़ में फँसे हुए प्राणियों का उद्धार करने से पारद और अभ्रक आदि उत्तम औषधियों में यह राजा के समान होने से इसे रसराज कहा जाता है ॥ १-४ ॥ विशुद्धाविशुद्धसूतस्य स्वरूपम् शुद्धः सूतो यतस्त्वन्तः सुनीलो बहिरुज्ज्वलः । सूर्य्यप्रभश्चाविशुद्धो धूम्रो वा परिपाण्डुरः ॥५॥ अविशुद्धसूतस्य हेयत्वम् सदोषो रसराजस्तु विदध्याद्विविधान् गदान् । तस्माद् दोषविहीनस्तु योगेषु विनियोजयेत् ॥६॥ तत्र शुद्धसूतस्वरूपम्—अन्तःसुनीलः मध्यावच्छेदेन नीलप्रभः । अविशुद्धस्तु परिपाण्डुरः ईषत्पीतवर्णः, स च त्याज्यः—"अन्तः सुनीलो बहिरुज्जवलो यो मध्याह्नसूर्यप्रतिमप्रकाशः । शस्तोऽथ धूम्रः परिपाण्डुरश्च चित्रो न योज्यो रस- कर्मसिद्धयै" इति प्राचीनसंवादात् ॥ ५-६ ॥

पञ्चमस्तरङ्गः ७३

भा. टी.- धात्वन्तर संयोगरहित पारद बाहर से अत्यन्त स्वच्छ, चम- कीला, सूर्य के समान और भीतरी चमक में कुछ नीलप्रभ होता है । परन्तु अशुद्ध पारद धूम्रवर्ण या पाण्डुर ( कुछ पीतवर्ण ) का होता है ॥५॥ दोषयुक्त पारद सेवन करने से शरीर में अनेक प्रकार के रोगों को पैदा करता है । अतः दोषरहित पारद ही योगों में काम लाना चाहिए ॥६॥ अथ पारदस्य नैसर्गिका दोषाः नागवङ्गौ वह्निमलौ चापल्यं गरलं गिरिः । असह्याग्निश्च विज्ञेया दोषा नैसर्गिका रसे ॥७॥ नागाद् व्रणं भवेत्कुष्ठं वङ्गात्तापोऽग्निदोषतः । मलाज्जाड्यं तु चापल्याद् बोजनाशो विषान्मृतिः ॥८॥ गिरेः स्फोटोऽथ मोहश्च ह्यसह्याग्नेः प्रजायते । एतैर्दोषैर्विहीनञ्च रसेन्द्रमिह योजयेत् ॥ ६ ॥ पारददोषा नैसर्गिकाः, तापो देहसन्तापः जाड्यं चेष्टाहानिः । बीजनाशः शुक्रक्षयः, मोहो वैचित्यम् ॥ ७-६ ॥ आ.टी.-पारद में स्वभावतः नाग, वंग, वह्नि, मल, चापल्य, विष, गिरि, असह्याग्नि ये दोष उपस्थित रहते हैं । इनमें से नागदोष के कारण वह शरीर में व्रण, वंगदोष से कुष्ठ, अग्निदोष से तापवृद्धि, मलदोष से जड़ता, चाप- ल्यदोष से शुक्रक्षय, विषदोष से मृत्यु, गिरिदोप से शरीर में स्फोट और अस- ह्याग्नि से मोह विकारों को उत्पन्न करता है । अतः इन दोषों से रहित करके पारद को प्रयोग में लाना चाहिए ॥ ७-६ ॥ वक्तव्य—तन्त्रान्तर में पारदस्थित नाग और वंग दोष को यौगिक दोष माना है । "यौगिकौ नागवंगौ द्वौ-" परन्तु पारद में शीशा और राँगा स्व- भावतः खानों द्वारा पाया जाता है, अतः कई रसवैद्य इनको स्वाभाविक या नैसर्गिक दोष मानते हैं । व्यापार की दृष्टि से भी नाग और वंग को प्रायः पारद में मिलाया जाता है । इन धातुओं के मिलाने से पारद की उड़नशी- लता बहुत कम हो जाती है । अतएव तन्त्रान्तर में रससिन्दूरादि योगों के बनाते हुए पारद की शीघ्र उड़नशीलता को कम करने के लिये उसमें कुछ अंश शीशा का डालने को लिखा है—"भागो रसस्य त्रय एव भागा गन्धस्य माषः पवनाशनस्य ( नागस्य ) ।" इन बातों से पूर्वकालीन विज्ञान के साथ-

· ७४ रसतुरङ्गिणी साथ पूर्वकालीन पारद व्यापार की बहुलता तथा कुशलता भी प्रकट होती है। विष, वह्नि तथा मलदोषों को नैसर्गिक माना जाता है। खान से निकलते समय पारद में नाग, वंग धातुओं के योग के अतिरिक्त अन्य धातु (सुरमा आदि) की अशुद्धि पायी जाती है। जिससे पारद में उस धातु के विषैले प्रभाव उपस्थित होते हैं जिनसे मूर्च्छा उपद्रव होता है। इस विषय को फार्माकालोजी थेरापुडिक्स एण्ड मेटेरियामेडिका में इस प्रकार लिखा है (Other metals especially lead arsenic and antimony may be present)। अतः पारद में अन्य धातुओं के कारण मलिनता (मलदोष) या अशुद्धि संभव होती है और स्वाभाविक रूप से पायी जाती है। वह्निदोष (दाहकता) तात्का- लिक पारद-विष-प्रभाव को देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पारद के यौगिक रसकर्पूर, दालचिकना, मुग्धरा, ग्रेपाऊडर कोष्ठ में जाकर भयंकर प्रभाव करते हैं जिससे शरीर में पित्त (अग्नि) का प्रकोप होकर वमन, विरे- चन, शूल, रक्तातिसार, मूर्च्छा आदि उपद्रव उत्पन्न होकर अन्त में मृत्यु तक हो जाती है। अतः यह भी पारदीय स्वाभाविक दोष है। घोष की मेटेरिया मेडिका में भी इसी बात को पुष्ट किया है “Acute Toxication acute poisoning is not common mercurial, especially the mercuris salts produce severe gestro enterites with vomiting pains purging and bloody stool of collapes and even death।” विषदोष पारद खान से निकलते समय खान की अनेक विषैली और उड़नशील संखिया आदि खनिजों को अपने में मिला देता है। इससे युक्त पारद पातन-क्रिया करने पर भी शीघ्र शुद्ध नहीं होता है। अतः यह विष- दोष भी पारद का एक मुख्यतया महादोष है। इस दोष के कारण ही पारद यौगिक मृत्यु के कारण बनते हैं। चाञ्चल्यदोष-चपलता द्रवता इसके पर्यायवाचक शब्द हैं। चापल्यदोष के सम्बन्ध में नवीन विचार है कि वह दोष पारद में चपलधातु (जिसे कोई- कोई विस्मिथ कहते हैं) के मिलाने से उत्पन्न होता है। व्यापार के लिए अन्य धातुओं की भाँति कभी-कभी पारद में उसके द्रवणांक ( melting point ) को न्यून करने के लिए चपल मिलाया जाता है। जिससे पारद शीघ्र ही अत्यन्त मंद अग्नि पर पिघल जाता है। चपल धातुमिश्रित पारद प्रायः स्टीरियो टाइपिंग (Stereo Typing) के व्यापार में लगाया जाता है। इस व्यापार

पञ्चमस्तरङ्गः ७५ के लिये नाये हुए पारद को यदि औषधिकार्य में लाया जाय तो इसमें अशुद्धि बहुत सम्भावनीय है । नवीन अन्वेषकों का विचार है कि बहुत सम्भव है कि प्राचीनकाल में भी व्यापारी लोग चपल के मिश्रक (Alloy Of Bismith) बनाते हों । आयुर्वेद में लिखे चपलधातु के गुणों में भी यह लिखा है कि चपल रस बन्धकारक है । “चपलो वृष्यो रसबन्धकारकः ।” अतः चपलधातु मिश्रित पारद में चपल दोष का होना स्वाभाविक दोष हो सकता है । असह्याग्निदोष--नवीन अन्वेषकों के अनुसार पारद के खनिजों में कुछ ऐसे खनिजों का पता लगा है जो उड़नशील निश्चित हुए हैं । जैसे ऑक्सिजन गैस, लवणगैस (Chlorin) आदि । इन खनिजों की विद्यमानता में पारद अपने तापक्रम के पूर्व ही उड़ने लगता है । अर्थात् जो शुद्ध पारद ३५७ डिग्री के तापक्रम पर उड़ने लगता है यदि वह किन्हीं खनिजों की विद्यमानता से अल्प तापक्रम पर ही उड़ने लगे तो उसमें असह्याग्नि दोष माना जाता है । गिरिदोष-पर्वत के जिस अंतराल से पारद बाहर आता है उसमें पाई जानेवाली विकृतियों तथा दोषों के सम्पर्क को गिरिदोष कहा जाता है। अतः पारद के संबंध में पर्वतों तथा स्थानों का भी पूर्ण निश्चय करना चाहिये कि अमुक पर्वत में अमुक धातु या विष अधिक पाया जाता है, अतः इस स्थान या खान के पारद में यह विकृति हो सकती है । इस विषय की ओर ध्यान देकर उस ( पारद ) का ग्रहण करना गिरिदोष का ज्ञान है । पारदस्य सप्तकञ्चुकाः भेदी द्रावी मलकारी ध्वाङ्क्षी पर्पटिका च सा । अन्धकारी पाटनिका कञ्चुकाः सप्त कीर्तिताः ॥१०॥ अथ सप्त कञ्चुकाः-कञ्चुकवद् बहिरावरणे समाः । तन्नामानि यौगि- कानि ध्वाङ्क्षी, काकवत् , कृष्णवर्णत्वात् , पाटनिका, स्फोटहेतुः ॥ १० ॥ आ.टी.-पारद में उक्त दोषों के अतिरिक्त भेदी, द्रावी, मलकारी,ध्वांक्षी, पर्पटिका, अंधकारी, पाटनिका, ये सात कंचुक दोष भी माने जाते हैं ॥१०॥ सप्त कंचुकानां परिचयः धातवो रससंश्लिष्टा यदा विष्णुपदामृतम् । गृह्णन्ति हि तदा तेषां कश्चिद् भागोऽवशीर्यते ॥ ११ ॥ ततश्चूर्णत्वमापन्ना रसमाच्छादयन्ति ते । तेनावरणसाम्येन धातवः सूतसंगताः ॥ १२ ॥

७६ रसतरङ्गिणी कञ्चुकाख्यां भजन्तीति प्राच्यपाश्चात्यसम्मतिः । केचिदेते कञ्चुकाख्या दोषा औपाधिकाः स्मृताः ॥१३॥ सप्तकंचुकानां परिचयः स्वरूपनिर्णयाय-रससंश्लिष्टाः प्राप्तपारदसंयोगधात- वो नाग-वङ्गादयः यदा विष्णुपदामृतमम्बरपीयूषं (ऑक्सीजन् इत्याङ्गलभाषा- याम्) गृह्णन्ति विशीर्णावयवत्वेनात्मनि लीनयन्ति, अवशीर्य्यते स्वरूपाच्च्यवते, तथा चावरणसामान्यात् रससंगतानां धातूनां कंचुकाख्येति प्राचां पाश्चात्यानाञ्च रासायनिकानीं सम्मतिः तथा च धातुसम्पर्कविनाशाय शुद्धिविधेया सूतस्येति । औपाधिका वणिग्भिः छलनाथं मिश्रितैर्धातुभिः समुत्पन्ना एवैति दोषा इति केचित् ॥ ११-१३ ॥ आ.टी.-पारद में मिश्रित नाग वंग आदि धातु जब विष्णुपदामृत (oxigen) रूप होकर पृथक् होते हैं तब उनका कुछ अवशिष्ट भाग चूर्ण रूप में होकर पारद के ऊपर रह जाता है अर्थात् इस चूर्ण से पारद सर्वतः आच्छा- दित हो जाता है । पारद में मिश्रित और चूर्ण रूप से पारद को कंचुक (आव- रण) के समान ढकनेवाले इन्हीं धातुओं को कंचुक कहा जाता है । यह प्राचीन और अर्वाचीन सम्मति (सिद्धान्त) है और रसतन्त्रकारों ने इन कञ्चुकों को औपाधिक (व्यापारियों के द्वारा ठगने के लिए धातुओं का मिश्रण) दोष माना है ॥ ११-१३ ॥ वक्तव्य--कञ्चुकों के विषय में H. E. Roscoe and C. Schorle- mmer. F. R. S. की Chemistry में निम्न प्रकार से प्रकाश डाला है- Impure mercury when shaken with air yields a black powder caused by the oxidation of the metallic impurities, and the film of the oxide incloses a small globule of the liquid metal. पारदशोधनस्यावश्यकता नैसर्गिकास्तु ये दोषा ये चान्ये कंचुकाह्वयाः । तेषान्तु परिहाराय सामान्यं शोधनं स्मृतम् ॥ १४ ॥ विशुद्धो रसराजस्तु सत्यं पीयूषसोदरः । सदोषस्तु रसौ वैद्यैर्यमोऽयमपरः स्मृतः॥ १५ ॥ तस्मात्सूतविशुद्ध्यर्थं युक्तः सुपरिचारकः । सर्वमादाय सामग्रीं रसशुद्धिं समारभेत् ॥ १६ ॥

पञ्चमस्तरङ्गः ७७ शुद्धस्तु पारदः सत्यं पीयूषसोदरः सर्वथाऽमृततुल्यः, सदोषस्तु अपरो यम इति प्रभूतपीडाकर इत्यर्थः ॥ १४-१६ ॥ आ.टी.—पारद में जो स्वाभाविक दोष और कञ्चुक दोष पाये जाते हैं उनको हटाने के लिये पारद का सामान्य शोधन करना आवश्यक है । शुद्ध पारद सेवन करने पर निश्चित ही अमृत के समान गुणकारी होता है, इसके विपरीत दोषयुक्त पारद दूसरे यमराज के समान घातक होता है । अतः पारद की शुद्धि के लिये अच्छे परिचारकों के साथ सब पारदशोधन सामग्री जुटाकर इसकी शुद्धि करनी चाहिए ॥ १४-१६ ॥ शोधनार्थे रसपरिमाणम् पलानां शतकं ग्राह्यं तदर्धार्धमथापि वा । पलानां दशकं वापि पञ्चकं वा पलोन्मितम् ॥ १७ ॥ पलान्यूनो न संग्राह्यः संस्कारार्थे रसो बुधैः । बहुप्रयाससाध्यत्वाल्लाभाभावाच्च निश्चितम् ॥ १८ ॥ शोधनाय रसपरिमाणं बहुप्रयाससाध्यस्य फललाभाय ॥ १७-१८ ॥ भा.टी.—शोधन करने के लिये पारद को सौ पल, पचास पल, या पच्चीस पल, या दस पल, पाँच पल अथवा कम-से-कम एक पल तक परिमाण (तौल) में लेना चाहिए । किन्तु समझदार वैद्यों को एक पल से कम परिमाण में शोधन के लिये पारा नहीं लेना चाहिए । क्योकि इतने कम पारद के लिये भी प्रयत्न परिश्रम सामग्री साधन वही जुटाने होगे जो सौ पल पारद के लिये जुटाने पड़ते हैं । इतने परिश्रम के बाद आर्थिक दृष्टि से कोई विशेष लाभ नहीं रहता है ॥ १७-१८ ॥ अथ समय शोधनम् सुदिने शुभनक्षत्रे स्वेष्टदेवं च शङ्करम् । भैरवं चापि सम्पूज्य रसकर्म समाचरेत् ॥ १६ ॥ समयशोधनमन्तरायप्रतीकाराय अभीष्टसिद्धये च । सुदिने व्यतीपातादि- वर्जिते शुभनक्षत्रे पुष्यादौ ॥ १६ ॥ भा.टी.—ज्योतिःशास्त्रानुसार अच्छे दिन अच्छे नक्षत्र में अपने इष्ट देवता तथा शिवजी और भैरव की प्रथम पूजा करके पारदशोधनादि कर्म करने चाहिए ॥ १६ ॥

७८ रसतरङ्गिणी अथ रसपूजनम् अघोरेण च मन्त्रेण खल्वे संस्थापितं रसम्। गन्धधूपादिभिः प्राज्ञः पूजयेद्भिषजां वरः ॥ २० ॥ अघोरमन्त्रेणेति—अघोरमन्त्रश्च रुद्राध्यायोक्तः—"अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च । सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः” ॥ २० ॥ भा.टी.—शोधन करने से पूर्व पारद का खरल में डालकर सुगन्धि धूप, आदि के साथ अघोरमंत्र से पारद की पूजा करनी चाहिए ॥ २० ॥ वक्तव्य—रुद्राध्याय में वर्णित अघोरमन्त्र इस प्रकार पाया जाता है “अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च । सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः" । अथ रसस्य साधारणशोधनम् आधिव्याधिविनाशाथं प्रयोगार्थं रसेषु च । सामान्यं शोधनं शस्तं रसतन्त्रविशारदैः ॥ २१ ॥ साधारणशोधनफलमाधिव्याधिविनाशः रसप्रयोगयोग्यता चेत्यवधेयम्। २१। भा.टी.—शारीरिक तथा मानसिक रोगों को दूर करने तथा विभिन्न रसों में प्रयोग करने के लिये रसतन्त्रविशारद पारद का सामान्य शोधन करना आवश्यक बताते हैं ॥ २१ ॥ प्रथमः शोधनप्रकारः धूमेष्टिकादृष्टविलासिनिनां सोयैस्तु चूर्णैः परिमर्द्य सूतम् । प्रक्षालयेदम्लजलेन सम्यक् ततो रसो मुञ्चति नागदोषम् ॥२२॥ मृगेक्षणाङ्कोलविशोथचूर्णैः सूतो जहातीह तु वङ्गदोषम् । चित्रोऽग्निदोषं विनिहन्ति शीघ्रं दोषं मलोत्थं खलु राजवृक्षः ॥२३॥ चापल्यहारी खलु कृष्णधूर्तो विषापहर्त्री त्रिफला प्रशस्ता । दोषं गिरेस्त्र्यूषणमाशु हन्यात् त्रिकण्टको वह्न्यसहत्वदोषम् ॥२४॥ चूर्णं कलांशप्रमितं तु सूतात् सकन्यकं भाषितभेषजानाम् । विमर्दयेत्खल्वगतं दिनैकं प्रक्षालयेच्चापि ततोऽम्लतोयैः ॥ २५ ॥ रीत्यानया शोधित ईशसंज्ञः सत्यं भवेत्कञ्चुकदोषहीनः । इत्थं विशुद्धं खलु सूतराजं नियोजयेद्वैद्यवरो रसेषु ॥ २६ ॥ साधारणशोधनप्रकारमाह धूमेष्टिकेत्यादिना-धूमः महानसादौ इन्धनानि ष्ठाञः धूमनिःसारकान्तःसुषिरस्तम्भविलग्नो धूमः, इष्टिकापक्केष्टिका हट्टविला-

पञ्चमस्तरङ्गः ७६ सिनी हरिद्रा, ऊर्णा मेषरोमाणि, अम्लजलेन काञ्जिकेन । अत्र च धूमादि- चूर्णानां भागाः पारदात् षोडशांशाः स्युः । मृगेक्षणा इन्द्रावारुणी, अंकोलः अंकोठः, "ढेरा" इति भाषायाम्, निशा हरिद्रा, एषां चूर्णैः । धूर्तः धत्तूरः, त्रिकण्टको गोक्षुरः, सकन्यकं कुमारीरससहितम् । ईशसंज्ञः पारदः ॥२२-२६॥ भा.टी.-पारद को घर का धुआँ, ईंट का चूर्ण, हरिद्राचूर्ण और बारीक काटी हुई ऊन के साथ एकत्र मिलाकर एक दिन मर्दन कर काञ्जी से धोकर साफ कर लेने से पारद का नाग दोष नष्ट हो जाता है । इन्द्रायण, अंकोला ( ढेरा ), हल्दीचूर्ण के साथ मर्दनकर काञ्जी से धोकर साफ कर लेने से पारद का वंगदोष नष्ट हो जाता है । चित्रक मूलचूर्ण के साथ पारद को मर्दन करने से अग्निदोष, तथा अमलतास की छाल के साथ पारद को मर्दन करने से मलदोष नष्ट हो जाता है । काले धतूरे के पञ्चांग या बीजों के साथ पारद को मर्दन करने से चपलदोष, त्रिफलाचूर्ण के साथ मर्दन करने से विषदोष नष्ट होता है । गिरिदोप को नष्ट करने लिये पारद को त्रिकटु ( सोंठ मिर्च पीपल ) चूर्ण के साथ और असह्याग्निदोष को दूर करने के लिये पारद को गोखरूचूर्ण के साथ मर्दनकर काञ्जी से धो लिया जाता है । उक्त दोषों को नष्ट करने के लिये जिन-जिन औषधियों का चूर्ण बताया गया है उनको पृथक्-पृथक् पारद से १६ वाँ भाग लेकर पारद में डालें और इसके साथ इसमें घीकुआर का रस भी घोटने के योग्य मिलाकर एक दिन मर्दनकर खट्टी काञ्जी से धोकर पारद को साफ कर लें । उक्त विधि से शुद्ध किया हुआ पारद निश्चित ही सामान्यतः कञ्चुक तथा नागादिदोषहीन हो जाता है ॥ २२-२६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः रसेश्वरं समसुधारजसा मर्दयेत् त्र्यहम् । ततो द्विगुणवस्त्रान्तर्गलितं खल्वके न्यसेत् ॥२७॥ रसोनं निस्तुषं तुल्यं तदर्धं लवणं हरेत् । तत्कल्के मर्दयेत्सूतं यावदायाति कृष्णताम् ॥२८॥ कृष्णां कल्कं परित्यज्य तथा प्रक्षाल्य युक्तितः । एवमेकेन वारेण रसेन्द्रः शुद्धिमाप्नुयात् ॥२९॥ श्रीमद्गुरुमुखोद्गीतः कृतश्च बहुशो मया । सौकर्यार्थं प्रयोगेषु प्रकारोऽयं प्रकाशितः ॥३०॥

८० रसतरङ्गिणी अथ द्वितीयशोधनप्रकारः सुखसाधनार्थम्—समसुधारजसा पारदतुल्येन चूर्णकच्छ्लोदेन, ततो द्विगुणवस्त्रान्तर्गलितम् । निस्त्वग्रसोनकल्केन पारदतुल्येन कल्ककृष्णीभावपर्यन्तं युक्त्या मर्दयेत् । स्पष्टमन्यत् । अस्य प्रामाणिकतां बोधयति—श्रीमद्गुरुमुखोद्गीत इति । उक्तञ्चान्यत्रापि—"एकेन लशुनेनापि शुद्धो भवति पारदः । पिष्टो लवणसंयुक्तो मासैकं तप्तखल्वके ॥ आरनालेन चोष्णेन क्षालयेन्मर्दनोत्तरम् । रसं तत्र विलीनंतु शोषयित्वाऽथ पातयेत् ॥” ऊर्ध्वपातनादिनेति शेषः-इति ॥ २७-३० ॥ भा.टी.--पहिले पारद को समभाग चूने के साथ तीन दिन तक मर्दन करके फिर इसे दो तह वस्त्र में छान लें। अब इस छुने हुए पारद को खरल में डालकर इसमें समभाग निस्तुष लहसुन, और पारे से आधा भाग नमक डालकर इनको तब तक मर्दन करें जब तक कि लहसुन का कल्क काला हो जाय। अब इसको शीत जल अथवा काञ्जी से अच्छी तरह धोकर पारद को पृथक् कर लें। इस प्रकार एक ही बार में पारद सर्वथा शुद्ध हो जाता है। यह कई बार का अनुभूत और सरल है। इसके द्वारा प्रयोग निर्माण में बहुत सुविधा होती है ॥ २७-३० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सप्तमलैर्विमुच्यते ॥३१॥ तृतीयःशोधनप्रकारः कुमारिकेत्यादिना--बृहती क्षुद्रभण्टाकी, "क्षुद्रायां क्षुद्रभण्टाक्यां बृहतीति निगद्यते" इति भावप्रकाशात् , न तु कंटकारी, बृहती- कण्टकार्ययोः परस्परं भेदात् । शिष्टं सुगमम् ॥ ३१ ॥ भा.टी.--घीकुआर, चित्रकछाल, लाल सरसों, छोटी भटकटैया और त्रिफलाकषाय के साथ तीन दिन तक मर्दन करके पारद को धोकर साफ कर लेने से भी यह सप्तमल रहित हो जाता है ॥ ३१ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः गुडत्रिकटु यामिनी लवणपञ्चकं पावकः फलत्रिकयवाग्रजौ खलु सुवर्चिकष्टङ्कणः । तथा कितवसर्षपौ खलु समैस्तु विंशांशकैः विशुद्ध्यति विमर्दितो रसवरोऽश्वसंख्यैर्दिनैः ॥३२॥ श्रीमद्गुरुमुखोद्गीतः कृतश्च बहुशो मया । अनुभूतश्च योगेषु प्रकारोऽयं निरूपितः ॥३३॥

६ पञ्चमस्तरङ्गः ८१ चतुर्थःशोधनप्रकारः—यामिनीः हरिद्रा। यवाग्रजो यवक्षारः सुवर्चिकः वर्जिङ्गारः कितवः धत्तूरः, अश्वसंख्यैः सप्तभिः ॥ ३२-३३ ॥ भा. टी.—गुड़, त्रिकटुचूर्णं, अजवाइन, पाँचों नमक, चित्रकछालचूर्णं त्रफलाचूर्णं, जवाखार, सज्जीखार, सुहागा, धतूरा बीज और सरसों, इन, सबको पृथक् समभाग में लेकर इनका चूर्ण पारद में बीसवाँ भाग डालकर सात दिन तक मर्दन करने से पारद शुद्ध हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः नागवल्लीदलरसैस्तथा चार्द्रकजै रसैः । क्षारत्रययुतैश्चापि रसराजं त्रिमर्दयेत् ॥३४॥ ततस्तेभ्यः पृथक्कृत्वा सप्तदोषविवर्जितम् । मुक्ताफलसमाकारं रमराजं प्रयोजयेत् ॥३५॥ पञ्चमःशोधनप्रकारः—नागवल्लीदलरसैः ताम्बूलपत्ररसैः, क्षारत्रयं स्वजि- कासौभाग्ययवाग्रजाः ॥३४-३५ ॥ भा.टी.—पारद को पान के रस, अदरख और जवाखार, संज्जीखार तथा सुहागे के साथ मिलाकर तीन दिन तक मर्दन करें । फिर अम्लकाञ्जी या जल से धोकर पारद को पृथक् कर लें । इस विधि से शुद्ध पारद मोती के समान चमकीला और सप्तदोषरहित हो जाता है ॥ ३४-३५ ॥ षष्ठः शोधनप्रकारः विमर्द्य सुधया सप्तदिनं धूमनिषेष्टकैः । त्रिदिनं मर्दयेत्सूतं काञ्जिकैः क्षालयेत्ततः ॥ ३६ ॥ वस्त्रं चतुर्गुणं कृत्वा सूतं निःसारयेत्ततः । सप्तकञ्चुकनिर्मुक्तो जायते निर्मलो रसः ॥३७॥ इति रसस्य सामान्यशोधनम् । षष्ठः शोधनप्रकारः—सुगमः । चतुर्गुणवस्त्रेणेत्युपलक्षणं, शम्बरमृगच- र्मणा चात्यन्ततनुना पारदस्य गालनं कार्यमिति गुरुसम्प्रदायः ॥३६-३७॥ भा. टी.—पारद को पहिले चूने के साथ सात दित तक मर्दन करके चतुर्गुण ( चार तह ) वस्त्र से छान लें । फिर इसे घर का धुवाँ, हरिद्राचूर्ण तथा ईंट के चूर्ण में तीन दिन तक मर्दन करके काञ्जी से धोकर साफ कर लें । अब इस पारद को एक चौहत वस्त्र में रखकर छान लें । इस प्रकार शोधन करने से पारद सप्तकञ्चुक रहित तथा स्वच्छ हो जाता है ॥३६-३७॥

८२ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—लाल ईंटों का चूर्ण, कम्बल की भस्म, बिना बुझा हुआ चूना रसोई का धुँवा, हल्दी, इन पाँचों द्रव्यों को समभाग में लेकर एकत्र कर लें, अब इससे आधा भाग पारद मिला नींबू के रस से एक दिन मर्दन कर डमरु यन्त्र में बन्द करके तीन घंटे की अग्नि देने से पारद ऊपर उड़कर शुद्ध हो जाता है। इसको सब काम में निःशंक होकर प्रयोग करना चाहिए। वक्तव्य—शुद्ध पारद को पान के पत्तों के रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करके उसका गाढ़ा सा कल्क बना लें। अब इस कल्क को एक कपड़े पर लेप करके शिर में बाँधने से शिर के बालों में होनेवाली सब यूका (जूँ) मरकर गिर जाती हैं। शुद्ध पारद दो तोला, सिक्थतैल (मोम का तेल) बारह तोला लेकर इन दोनों को एकत्र खरल में तब तक मर्दन करें जब तक कि पारा मोम के तेल में अच्छी तरह मिल न जाय। यह एक उत्तम मरहम है। यह मरहम शिश्नेन्द्रिय तथा गुद प्रदेश में होनेवाले बहुत पुराने भयंकर फिरंग रोग के व्रणों को निःसन्देह शीघ्र ही भर देता है। इति रस का सामान्य शोधन। अथ हिंगुलोत्थितपारदस्य निर्माणप्रकारः हिङ्गुलं पारिभद्रस्य रसैः सम्पेपयेद् बुधः । चाङ्गेर्या वा रसेनेव द्रवैर्जम्बरीरजैस्तथा ॥३८॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण सप्तकञ्चुकवर्जितम् । गृह्णीयान्निर्मलं सूतं रसतन्त्रविशारदः ॥ ३६ ॥ षोडशांशे निशाचूर्णैस्ततस्तं पेषयेद् बुधः । अम्लेन पटुना चापि मर्दयेद्वा दिनद्वयम् ॥४०॥ वस्त्रं चतुर्गुणीकृत्य ततो निःसारयेद्रसम् । योगेषु योजयेद् वैद्यो रसराजं सुनिर्मलम् ॥४१॥ गुरुदर्शितमार्गेण यन्त्रमानं प्रकल्पयेत् । मानाभावाद्रसेन्द्रस्य लिखितं नैव शक्यते ॥४२॥ अथ हिंगुलात् पारदनिर्माणप्रकारः- पारिभद्रः "फरहद" इति ख्यातः । जम्बीरनिम्बुनीरैर्वा हिंगुल मर्दनं पारदविश्लेषणार्थम् , उर्ध्वपातनेन पारदपातनं नागवङ्गादिदोषोप्रपनोदाय, ततश्च चूर्णैर्नांथवा लवणेनाम्लेन च मर्दनं निर्मली-

पञ्चमस्तरङ्गः ८३ करणाय । अद्यत्वे बहवोऽलसा हिंगुलस्य द्विगुणवस्त्रवेष्टितस्य शनैर्ज्वालनद्वारा पारदविश्लेषणामातन्वते, स च लघुरपि प्रकारो रसस्य साकल्येनोर्ध्वपातनस्याभा- वात् नागवङ्गादिदोषांपरिहारकत्वादुपेक्षित आचार्य्यैः,—इत्यवधेयम् ॥३८-४२॥ भा.टी.—सिंगरफ को फरहद के स्वरस से अथवा चांगेरीस्वरस अथवा जम्बीरी नींबू के स्वरस से एक दिन मर्दनकर सुखा करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में डालकर उड़ा लेवैं । इस प्रकार से प्राप्त पारद स्वच्छ और सप्त कञ्चुक रहित हो जाता है । अब इस पारद में १६ वाँ भाग हरिद्राचूर्ण डालकर अथवा नमक और नींबू का रस डालकर दो दिन तक मर्दन करें । मर्दन करने के बाद अच्छी तरह सूख जाने पर इसे चौतह वस्त्र में छान लें । इस शुद्ध पारद को योगों में प्रयोग कर सकते हैं । ऊर्ध्वपातन के लिये कितना बड़ा यन्त्र होना चाहिए इसका निर्णय गुरुपदेशानुसार करना चाहिए । यहाँ पर पारद का मान न होने से यन्त्र मान को भी नहीं लिखा जा सकता है । अथवा केवल नींबू के रस में घोटकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में उड़ा लेने से भी हिंगुल से पारद निकल आता है ॥ ३८-४२ ॥ अथ पारदस्य अष्टौ संस्काराः रसायनप्रयोगेषु रसागमविशारदः । रसराजं प्रयुञ्जीत कर्माष्टकविशोधितम् ॥ ४३ ॥ स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापने तथा । पातनत्रितयञ्चाथ बोधनं सुनियामनम् ॥ ४४ ॥ सुप्रदीपनमित्यष्टौ प्रोक्ताः सर्वोपयोगिनः । संस्कारा रसराजस्य रसशास्त्रविशारदैः ॥ ४५ ॥ अथ पारदस्याष्टौ संस्काराः—रसतन्त्रप्रसिद्धाः सर्वोपयोगिनश्च वर्ण्यन्ते, नाम्नामर्थैरेव तत्त्वमेषां व्याख्यातम् । नामकीर्तनादेव संख्यालाभेऽपि पुनरष्टौ इति कथनं न्यूनाधिकतानिषेधाय । यद्यप्यष्टादशसंस्काराः प्राचीनतन्त्रसिद्धा- स्तथापि न तेषां व्याधावुपयोगोऽतस्त इहोपेक्षिताः परिभाषासौकर्याय, तदेतदाह सर्वोपयोगिन इति ॥ ४३-४५ ॥ भा.टी.—रसशास्त्र के विद्वान् को चाहिए कि वह रसायनप्रयोगों में अष्ट- संस्कार युक्त पारद का प्रयोग करें। स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, त्रिविधपा- तन (ऊर्ध्वपातन, अधःपातन, तिर्यक्पातन), बोधन, नियामन और दीपन—ये आठ संस्कार ही यहाँ पर सर्वोपयोगी होने के कारण बताये जाते हैं ॥४३-४५॥

८४ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—पारद के अठारह संस्कार रसशास्त्र में वर्णित हैं, परन्तु उनमें उक्त आठ संस्कार ही आवश्यक तथा सर्वोपयोगी होने से सर्वत्र विशेष रूप से वर्णन किये गये हैं। अन्यत्र रसप्रधान ग्रन्थों में पारद के अठारह संस्कार इस प्रकार बताये गये हैं। १-स्वेदन, २-मर्दन, ३-मूर्च्छन, ४-उत्थापन, ५-त्रिविधपातन, ६-रोधन, ७-नियमन, ८-सन्दीपन, ९-गगनभक्षण, १०-सञ्चारण, ११- गर्भद्रुति, १२-बाह्यद्रुति, १३-जारण, १४-ग्रास, १५-सारणाकर्म, १६-संक्रा- मण, १७-वेधन, १८-शरीरयोग । संस्कार—पारद के स्वाभाविक अष्ट दोषों की विकृति को दूर करके उसमें एक अद्भुत गुण उत्पन्न करने को संस्कार कहा जाता है—“संस्कारो हि गुणान्तराधानम्” । अतः असंस्कृत पारद में कोई विशेष गुण नहीं होते हैं। इन अठारह संस्कारों में से कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक आठ संस्कार अवश्य करने चाहिए। अठारह संस्कारों में भी प्रथम के आठ संस्कार सुखसाध्य और अवशिष्ट चारण, संक्रामण, ग्रास, सारण आदि कतिपय संस्कार स्पष्टार्थ या निरुक्ति या पारिभाषिक अर्थ के व्यक्त न होने से कष्टसाध्य हैं। संस्कारों की प्रयोजन में भिन्नता होने से अन्यत्र इसके दो भेद किये गये हैं— १-देहकर्मार्थ, २-धातुवादार्थ । शारीरिक रोगों को दूर करने और रसायन तथा वाजीकरणार्थ औषधियों के निर्माण में अष्ट संस्कारयुक्त पारद लिया जाता है। स्वर्ण रजत आदि धातुओं के निर्माणार्थ प्रायः चारणा, जारणा, वेध आदि अठारह संस्कारयुक्त पारद का ग्रहण किया जाता है। “सूतस्यैते च संस्काराः कथिता देहकर्मणि । तथा च दश संस्कारा देहलोहकराः स्मृताः ॥” स्वेदनलक्षणम् दोलायन्त्रे स्थापयित्वा रसेन्द्रं क्षारैरम्लैरौषधैर्वा कषायैः । युक्त्या यत्स्यात्पाचनं स्वेदनं तत् प्राज्ञैरुक्तं दोषशैथिल्यकारि ॥४६॥ स्वेदनलक्षणम्—सुगमम् । तथा च रसवाग्भटः—“क्षाराम्लैरौषधैर्वापि दोला- यन्त्रे स्थितस्य हि । पाचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम्” इति ॥४६॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में क्षारीयद्रव या अम्लीयद्रवों को भरकर अथवा औषधियों को भरकर उसमें पारद को पोटली में बाँधकर युक्तिपूर्वक पकाने को स्वेदन कहा जाता है। इस स्वेदन कर्म से पारद के दोष शिथिल हो जाते हैं ॥ ४६ ॥

पञ्चमस्तरङ्गः ८५ प्रथमः स्वेदनप्रकारः पिप्पलीमरिचचित्रकार्द्रकैर्विश्वसैन्धवफलत्रिकान्वितैः । षोडशांशकमितैर्दिनत्रयं स्वेदयेद्रसवरं सकाञ्जिकैः ॥ ४७ ॥ नूतनं कल्कमादाय नातितीक्ष्णेन वह्निना । प्रत्यहं स्वेदयेद्धीमान् रसतन्त्रविशेषवित् ॥ ४८ ॥ प्रथमः स्वेदनप्रकारः—विश्वं शुण्ठी, पिप्पल्यादिनवद्रव्याणां पृथक्पृथगेको- ऽशः श्लक्ष्णपिष्टः, काञ्जिकमर्धपात्रम्, पारदस्य षोडशांशाः, चतुर्गुणवस्त्रस्थम्- र्जपत्रपोट्टलीस्थं पारदं विधाय दोलया काञ्जिके त्रिदिनं स्वेदनम् । प्रतिदिनञ्च नूतनकाञ्जिककल्कक्षेपः । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ४७-४८ ॥ भा. टी.—पारद से १६ वाँ भाग पिप्पली, मरिच, चित्रक, अदरख, सोंठ; सेंधा नमक तथा त्रिफला लेकर काञ्जी से पीसकर पतला कल्क बना लें, अब इसे दोलायन्त्र में डालकर और काञ्जी मिला लें, अब पारद को पोटली में बाँधकर इसमें लटकाकर तीन दिन तक मन्द-मन्द अग्नि से स्वेदन करें । प्रत्येक दिन उक्त औषधियों का नूतन कल्क लेकर साधारण अग्निताप से पारद का स्वेदन करना चाहिए ॥ ४७-४८ ॥ द्वितीयः स्वेदनप्रकारः त्र्यूषणं मूलकासुर्यौ पटुकाऽर्द्रकवह्नयः । तत्कल्कैः काञ्जिके सूतं स्वेदयेद्दिवसत्रयम् ॥ ४६ ॥ द्वितीयः स्वेदनप्रकारः—त्र्यूषणं त्रिकटु, आसुरी राजिका, पटु सैन्धवम्, वह्निश्चित्रकः ॥ ४६ ॥ भा.टी.—त्रिकटु, मूली, राई, लवण, अदरख तथा चित्रक इन औषधियों के कल्क में काञ्जी मिलाकर पूर्वोक्त विधि से तीन दिन पारद का स्वेदन करना चाहिए ॥ ४६ ॥ तृतीयः स्वेदनप्रकारः पिप्पली मरिचविश्वभेषजे शृङ्गवेरलशुनार्द्रकामयः । मेघनादलवणौ महाबला चुल्लिका लवणमाजशृङ्गिका ॥५०॥ आसुरी खलु गवेधुका वरा प्रक्षिपेद्रसकलांशकं पृथक् । तत्समस्तमथ व्यस्तमेव वा काञ्जिकेन सह मर्दयेद् बुधः ॥५१॥ कल्कतामुपगतेन तेन वै वस्त्रमंगुलिमितं प्रलेपयेत् । निक्षिपेद्रसवरं तदन्तरे स्फोतकेन सुदृढं निरोधयेत् ॥ ५२ ॥