रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमस्तरङ्गः ८३ करणाय । अद्यत्वे बहवोऽलसा हिंगुलस्य द्विगुणवस्त्रवेष्टितस्य शनैर्ज्वालनद्वारा पारदविश्लेषणामातन्वते, स च लघुरपि प्रकारो रसस्य साकल्येनोर्ध्वपातनस्याभा- वात् नागवङ्गादिदोषांपरिहारकत्वादुपेक्षित आचार्य्यैः,—इत्यवधेयम् ॥३८-४२॥ भा.टी.—सिंगरफ को फरहद के स्वरस से अथवा चांगेरीस्वरस अथवा जम्बीरी नींबू के स्वरस से एक दिन मर्दनकर सुखा करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में डालकर उड़ा लेवैं । इस प्रकार से प्राप्त पारद स्वच्छ और सप्त कञ्चुक रहित हो जाता है । अब इस पारद में १६ वाँ भाग हरिद्राचूर्ण डालकर अथवा नमक और नींबू का रस डालकर दो दिन तक मर्दन करें । मर्दन करने के बाद अच्छी तरह सूख जाने पर इसे चौतह वस्त्र में छान लें । इस शुद्ध पारद को योगों में प्रयोग कर सकते हैं । ऊर्ध्वपातन के लिये कितना बड़ा यन्त्र होना चाहिए इसका निर्णय गुरुपदेशानुसार करना चाहिए । यहाँ पर पारद का मान न होने से यन्त्र मान को भी नहीं लिखा जा सकता है । अथवा केवल नींबू के रस में घोटकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में उड़ा लेने से भी हिंगुल से पारद निकल आता है ॥ ३८-४२ ॥ अथ पारदस्य अष्टौ संस्काराः रसायनप्रयोगेषु रसागमविशारदः । रसराजं प्रयुञ्जीत कर्माष्टकविशोधितम् ॥ ४३ ॥ स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापने तथा । पातनत्रितयञ्चाथ बोधनं सुनियामनम् ॥ ४४ ॥ सुप्रदीपनमित्यष्टौ प्रोक्ताः सर्वोपयोगिनः । संस्कारा रसराजस्य रसशास्त्रविशारदैः ॥ ४५ ॥ अथ पारदस्याष्टौ संस्काराः—रसतन्त्रप्रसिद्धाः सर्वोपयोगिनश्च वर्ण्यन्ते, नाम्नामर्थैरेव तत्त्वमेषां व्याख्यातम् । नामकीर्तनादेव संख्यालाभेऽपि पुनरष्टौ इति कथनं न्यूनाधिकतानिषेधाय । यद्यप्यष्टादशसंस्काराः प्राचीनतन्त्रसिद्धा- स्तथापि न तेषां व्याधावुपयोगोऽतस्त इहोपेक्षिताः परिभाषासौकर्याय, तदेतदाह सर्वोपयोगिन इति ॥ ४३-४५ ॥ भा.टी.—रसशास्त्र के विद्वान् को चाहिए कि वह रसायनप्रयोगों में अष्ट- संस्कार युक्त पारद का प्रयोग करें। स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, त्रिविधपा- तन (ऊर्ध्वपातन, अधःपातन, तिर्यक्पातन), बोधन, नियामन और दीपन—ये आठ संस्कार ही यहाँ पर सर्वोपयोगी होने के कारण बताये जाते हैं ॥४३-४५॥