भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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८४ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—पारद के अठारह संस्कार रसशास्त्र में वर्णित हैं, परन्तु उनमें उक्त आठ संस्कार ही आवश्यक तथा सर्वोपयोगी होने से सर्वत्र विशेष रूप से वर्णन किये गये हैं। अन्यत्र रसप्रधान ग्रन्थों में पारद के अठारह संस्कार इस प्रकार बताये गये हैं। १-स्वेदन, २-मर्दन, ३-मूर्च्छन, ४-उत्थापन, ५-त्रिविधपातन, ६-रोधन, ७-नियमन, ८-सन्दीपन, ९-गगनभक्षण, १०-सञ्चारण, ११- गर्भद्रुति, १२-बाह्यद्रुति, १३-जारण, १४-ग्रास, १५-सारणाकर्म, १६-संक्रा- मण, १७-वेधन, १८-शरीरयोग । संस्कार—पारद के स्वाभाविक अष्ट दोषों की विकृति को दूर करके उसमें एक अद्भुत गुण उत्पन्न करने को संस्कार कहा जाता है—“संस्कारो हि गुणान्तराधानम्” । अतः असंस्कृत पारद में कोई विशेष गुण नहीं होते हैं। इन अठारह संस्कारों में से कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक आठ संस्कार अवश्य करने चाहिए। अठारह संस्कारों में भी प्रथम के आठ संस्कार सुखसाध्य और अवशिष्ट चारण, संक्रामण, ग्रास, सारण आदि कतिपय संस्कार स्पष्टार्थ या निरुक्ति या पारिभाषिक अर्थ के व्यक्त न होने से कष्टसाध्य हैं। संस्कारों की प्रयोजन में भिन्नता होने से अन्यत्र इसके दो भेद किये गये हैं— १-देहकर्मार्थ, २-धातुवादार्थ । शारीरिक रोगों को दूर करने और रसायन तथा वाजीकरणार्थ औषधियों के निर्माण में अष्ट संस्कारयुक्त पारद लिया जाता है। स्वर्ण रजत आदि धातुओं के निर्माणार्थ प्रायः चारणा, जारणा, वेध आदि अठारह संस्कारयुक्त पारद का ग्रहण किया जाता है। “सूतस्यैते च संस्काराः कथिता देहकर्मणि । तथा च दश संस्कारा देहलोहकराः स्मृताः ॥” स्वेदनलक्षणम् दोलायन्त्रे स्थापयित्वा रसेन्द्रं क्षारैरम्लैरौषधैर्वा कषायैः । युक्त्या यत्स्यात्पाचनं स्वेदनं तत् प्राज्ञैरुक्तं दोषशैथिल्यकारि ॥४६॥ स्वेदनलक्षणम्—सुगमम् । तथा च रसवाग्भटः—“क्षाराम्लैरौषधैर्वापि दोला- यन्त्रे स्थितस्य हि । पाचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम्” इति ॥४६॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में क्षारीयद्रव या अम्लीयद्रवों को भरकर अथवा औषधियों को भरकर उसमें पारद को पोटली में बाँधकर युक्तिपूर्वक पकाने को स्वेदन कहा जाता है। इस स्वेदन कर्म से पारद के दोष शिथिल हो जाते हैं ॥ ४६ ॥