भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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८० रसतरङ्गिणी अथ द्वितीयशोधनप्रकारः सुखसाधनार्थम्—समसुधारजसा पारदतुल्येन चूर्णकच्छ्लोदेन, ततो द्विगुणवस्त्रान्तर्गलितम् । निस्त्वग्रसोनकल्केन पारदतुल्येन कल्ककृष्णीभावपर्यन्तं युक्त्या मर्दयेत् । स्पष्टमन्यत् । अस्य प्रामाणिकतां बोधयति—श्रीमद्गुरुमुखोद्गीत इति । उक्तञ्चान्यत्रापि—"एकेन लशुनेनापि शुद्धो भवति पारदः । पिष्टो लवणसंयुक्तो मासैकं तप्तखल्वके ॥ आरनालेन चोष्णेन क्षालयेन्मर्दनोत्तरम् । रसं तत्र विलीनंतु शोषयित्वाऽथ पातयेत् ॥” ऊर्ध्वपातनादिनेति शेषः-इति ॥ २७-३० ॥ भा.टी.--पहिले पारद को समभाग चूने के साथ तीन दिन तक मर्दन करके फिर इसे दो तह वस्त्र में छान लें। अब इस छुने हुए पारद को खरल में डालकर इसमें समभाग निस्तुष लहसुन, और पारे से आधा भाग नमक डालकर इनको तब तक मर्दन करें जब तक कि लहसुन का कल्क काला हो जाय। अब इसको शीत जल अथवा काञ्जी से अच्छी तरह धोकर पारद को पृथक् कर लें। इस प्रकार एक ही बार में पारद सर्वथा शुद्ध हो जाता है। यह कई बार का अनुभूत और सरल है। इसके द्वारा प्रयोग निर्माण में बहुत सुविधा होती है ॥ २७-३० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सप्तमलैर्विमुच्यते ॥३१॥ तृतीयःशोधनप्रकारः कुमारिकेत्यादिना--बृहती क्षुद्रभण्टाकी, "क्षुद्रायां क्षुद्रभण्टाक्यां बृहतीति निगद्यते" इति भावप्रकाशात् , न तु कंटकारी, बृहती- कण्टकार्ययोः परस्परं भेदात् । शिष्टं सुगमम् ॥ ३१ ॥ भा.टी.--घीकुआर, चित्रकछाल, लाल सरसों, छोटी भटकटैया और त्रिफलाकषाय के साथ तीन दिन तक मर्दन करके पारद को धोकर साफ कर लेने से भी यह सप्तमल रहित हो जाता है ॥ ३१ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः गुडत्रिकटु यामिनी लवणपञ्चकं पावकः फलत्रिकयवाग्रजौ खलु सुवर्चिकष्टङ्कणः । तथा कितवसर्षपौ खलु समैस्तु विंशांशकैः विशुद्ध्यति विमर्दितो रसवरोऽश्वसंख्यैर्दिनैः ॥३२॥ श्रीमद्गुरुमुखोद्गीतः कृतश्च बहुशो मया । अनुभूतश्च योगेषु प्रकारोऽयं निरूपितः ॥३३॥