रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 109, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्ग ६७ एक मूषा को सीधा मुख जमीन में गाड़ दें, उसके मुख पर दूसरी मूषा में सत्त्वपातनार्थ द्रव्यों को भरकर और उसके मुख पर एक छिद्रयुक्त शराव टिका- कर औंधामुख करके रख दें । और दोनों मूषा मुखों का सन्धि-बन्धन कर दें । अब लोहारों की भाँति ऊपर की मूषा के चारों तरफ नीचे से ऊपर को चौड़ा कोयलों को रखने का एक आधार ( सोलह अंगुल ऊँचा ) बनावें । इसमें कोयले भर दें । इस आधार के ऊपर की मूषा के कण्ठ प्रदेश के सामने जमीन पर धौंकनी द्वारा हवा देने के लिये एक छिद्र भी बना दें । अब भट्ठी में कोयले डालकर बीच में मूषा रख धौंकनी से धौंककर आवश्यकतानुसार मात्रा में अग्नि को तीव्र करना चाहिए ।
वलभीयन्त्र
एक बृहदाकार गोल लोहे का पात्र या टब बनायें, इसके भीतरी कण्ठप्रदेश पर आमने- सामने दो कड़े बनायें । इसी प्रकार इस पात्र के मुख में आने योग्य दूसरा लोहपात्र बनायें, किन्तु इसके बाह्य कण्ठ प्रदेश पर दो कड़े बनायें । अब बड़े पात्र में कजली भरकर इसके मुख पर दूसरा पात्र अच्छी तरह फँसा देवें और इसमें मूर्च्छित पारद डालकर इसको चूल्हे पर रखकर छः घण्टे की अग्नि दें । यह पारद की मूर्च्छना को दूरकर उसमें पुनः जागृति उत्पन्न करने के लिये प्रयुक्त होता है । इसे वलभी ( कड़ा ) यन्त्र कहते हैं ।