भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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चतुर्थस्तरङ्ग ६७ एक मूषा को सीधा मुख जमीन में गाड़ दें, उसके मुख पर दूसरी मूषा में सत्त्वपातनार्थ द्रव्यों को भरकर और उसके मुख पर एक छिद्रयुक्त शराव टिका- कर औंधामुख करके रख दें । और दोनों मूषा मुखों का सन्धि-बन्धन कर दें । अब लोहारों की भाँति ऊपर की मूषा के चारों तरफ नीचे से ऊपर को चौड़ा कोयलों को रखने का एक आधार ( सोलह अंगुल ऊँचा ) बनावें । इसमें कोयले भर दें । इस आधार के ऊपर की मूषा के कण्ठ प्रदेश के सामने जमीन पर धौंकनी द्वारा हवा देने के लिये एक छिद्र भी बना दें । अब भट्ठी में कोयले डालकर बीच में मूषा रख धौंकनी से धौंककर आवश्यकतानुसार मात्रा में अग्नि को तीव्र करना चाहिए ।

वलभीयन्त्र

एक बृहदाकार गोल लोहे का पात्र या टब बनायें, इसके भीतरी कण्ठप्रदेश पर आमने- सामने दो कड़े बनायें । इसी प्रकार इस पात्र के मुख में आने योग्य दूसरा लोहपात्र बनायें, किन्तु इसके बाह्य कण्ठ प्रदेश पर दो कड़े बनायें । अब बड़े पात्र में कजली भरकर इसके मुख पर दूसरा पात्र अच्छी तरह फँसा देवें और इसमें मूर्च्छित पारद डालकर इसको चूल्हे पर रखकर छः घण्टे की अग्नि दें । यह पारद की मूर्च्छना को दूरकर उसमें पुनः जागृति उत्पन्न करने के लिये प्रयुक्त होता है । इसे वलभी ( कड़ा ) यन्त्र कहते हैं ।