भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३८ रसतरङ्गिणी गजपुटन्तु नृपकरचतुरस्रोत्सेधदीर्घं सपादहस्तं सर्वत इत्यर्थः। छागणशङ्काणो वन्योपल इत्यर्थान्तरम् ॥ ४० ॥ भा.टी.—एक गज या सवा हाथ गहरे और चौड़े गढ़े में आधे भाग तक उपलों से भरकर मूषा रख दें और फिर आधे भाग को उपलों से भर कर अग्नि देने को गजपुट कहा जाता है । यही पुट साधारण रूप से अभ्रक लोह आदि द्रव्यों को पुट देने में काम आता है ॥ ४० ॥ वाराहपुटम् कुण्डे त्वरत्निमानेन चतुरस्रे तथोच्छ्रिते । पुटं यद् दीयते तच्च वाराहपुटमुच्यते ॥ ४१ ॥ अरत्निः विस्तृतकनिष्ठिको मुष्टिः ॥ ४१ ॥ भा.टी.--भूमि में एक अरत्नि लम्बा चौड़ा और गहरा एक गढ़ा खोद कर उसके आधे भाग में जंगली उपले भरकर उन पर मूषा को टिकाकर अवशेष भाग को पुनः उपलों से भरकर पुट देने को वाराहपुट कहा जाता है ॥ ४१ ॥ वक्तव्य--हाथ की कोहनी से लेकर सबसे छोटी हाथ की अंगुली तक की लम्बाई को अरत्नि शब्द से लिया जाता है । यह लगभग बीस या इक्कीस अंगुल लम्बी होती है । कुक्कुटकपुटम् वितस्तिद्वयमानेन निम्ने च चतुरस्रके । पुटं यद्दीयते तत्त मतं कुक्कुटकं बुधैः ॥ ४२ ॥ वितस्तिः = द्वादशाङ्गुलः ॥ ४२ ॥ भा.टी.—दो बालिस्त गहरे चौड़े गढ़े में उपले भरकर पुट देने को कुक्कुटपुट कहते हैं ॥ ४२ ॥ वक्तव्य--वितस्ति १२ अंगुल की होतीं है । कोई वैद्य जमीन के ऊपर ही उक्त प्रकार से पुट देने को कुक्कुटपुट कहते हैं । परन्तु जमीन के अन्दर देना अधिक लाभदायक है । कपोतपुटम् वन्योत्पलैरष्टसंख्यैः क्षितौ यद्दीयते पुटम् । रसादीनान्तु सिद्ध्यर्थं तत्कपोतपुटं स्मृतम् ॥ ४३ ॥ क्षितौ इति न विनैव गर्ते, किन्तु ईषदगर्त्तं विधायेत्यर्थः ॥ ४३ ॥