रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयस्तरङ्गः ३७ सूर्यपुटलक्षणम् द्रव्याणां भावितानान्तु भावनौषधजै रसैः ॥ शोषणां सूर्यतापे यत्तत्सूर्यपुटमुच्यते ॥ ३७ ॥ भा. टी. — आवश्यकतानुसार पुट इस प्रकार देना चाहिए जिससे मूषा या सम्पुट में रखे हुए पुटनीय लोह आदि धातु में दी जानेवाली अग्नि सुविधा के साथ पुटनीय द्रव्य के सर्वांश में ठीक-ठीक रूप से पहुँच सके ॥३६॥ भावना देनेवाली औषधियों के स्वरस कषाय आदि से द्रव्यों को भावित कर या तर करके धूप में रखकर सुखाने को सूर्यपुट कहते हैं । इसीको रौद्रपुट भी कहा जाता है ॥ ३७ ॥ महापुटम् व्यामार्द्धनिम्ने चतुरस्ररूपे हस्तद्वयायाममिते च कुण्डे । वन्योत्पलापूरितगर्भभागे मूषां निदध्यात्पुटनीयपूर्णाम् ॥३८॥ पुनस्तु विन्यस्य वनोत्पलानि सम्पूरयेत्कुण्डमुखं रसज्ञः । सन्दीष्य वह्निं पुटनं ततस्तन्महापुटाख्यं विबुधैः प्रदिष्टम् ॥३९॥ व्यामो नाम विस्तारितबाहुयुगस्य पुंसः दक्षिणहस्तमध्यमाङ्गुल्यग्रभागाद् वामहस्तमध्यमाङ्गुल्यग्रभागपर्य्यन्तं दीर्घता । “चतुरशीत्यङ्गुलो व्यामः” इति कौटिल्यः । 'व्यामो बाह्वोः...रन्तरमि'त्यमरश्च ॥ ३८-३९ ॥ भा. टी. — आधा व्याम ( दोनों हाथों को सीधा फैलाकर जितनी लम्बाई हो उसे व्याम करते हैं ) गहरे और दो हाथ चौड़े गोल गढ़े को महापुट कहा जाता है । इस गढ़े के आधे भाग में जंगली उपले भरकर उन पर द्रव्य सम्पुट रख दें और अवशिष्ट ऊपर के आधे भाग को फिर उपलों से भर दें, फिर इसमें अग्नि देकर पुट दें ॥ ३८-३९ ॥ वक्तव्य—पुटों को जमीन में यदि ईंटों से बनाया जाय तो उनके टूटने का डर नहीं रहता है और अग्नि अच्छी तरह लगती है । पुट में आधे उपले भरकर मूषा या सम्पुट रखकर अग्नि देनी चाहिए । फिर और उपले भरने चाहिये । इससे दोनों तरफ अग्नि एक साथ लगती है । गजपुटम् नृपकरचतुरस्रोत्सेधदैर्घ्ये तु कुण्डे छगणगणभृतार्द्धे मूषिकां स्थापयित्वा । पुटनमिह भवेत्तच्छाणपूर्णोऽद्धेभागे गजपुटमिह तन्त्रे भाषितं तद्रसज्ञैः ॥४०