रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ रसतरङ्गिणी मृतलोहादिकं यस्मादतिशेते मृतं रसम् । पुटपाकविधानेन पुटं तस्मात्प्रशस्यते ॥३५॥ अथ विशिष्टं प्रयोजनम्—दोषाणां रोगहेतूनाम् , गुणानां=रोगापनयन- शक्तीनाम् । दीपनं = तीव्रगुणता । तदुक्तम्—“रसादिद्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम् । नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः सुपाकं हितमौषधम् ॥ लोहादेरपुनर्भावो गुणा- धिक्यं ततोऽप्यता । नचाप्सु मज्जनं रेखापूर्णता पुटतो भवेत् ॥ पुटाद्रागो लघुत्वञ्च शीघ्रं व्याप्तिश्च दीपनम् ॥ जारितादपि सूतेन्द्रालोहानाधिको गुणः”॥३३-३५॥ भा०टी०—क्योंकि पुट द्वारा पाक करने पर रस, उपरस, धातु आदि में स्थित विभिन्न प्रकार के रोगोत्पादक दोषों का नाश होता है, और भिन्न-भिन्न औषधियों के योग से उनमें (धात्वादि में) रोगनाशक शक्ति की उत्पत्ति होती है । अतः पुटपाक करना आवश्यक होता है । इसके अतिरिक्त पुटपाक द्वारा लोह आदि की भस्म निरुत्थ हो जाती है और उसमें दीपनता (गुणों में तीव्रता) आ जाती है । इसके द्वारा बनी हुई भस्म वारितर हो सकती है । अतः पुट- पाक की आवश्यकता होती है । इसके अतिरिक्त सम्यक् पुटपाक विधान से भी बनी हुई धातु आदि की भस्म कई बार पारद की भस्म की अपेक्षा अधिक गुणकारी सिद्ध होती है ॥३३-३५॥ वक्तव्य—योग्य अग्नि न मिलने पर भस्म कच्ची रह जाती है जो अन्तः- प्रयोग करने पर शरीर की जीवनशक्ति या सेलों को नष्ट करती हैं, जिससे उदर-सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः शीघ्रता तथा अल्प प्रयास द्वारा एक साथ ही तीव्र अग्नि देकर बनाई हुयी औषधियाँ लाभदायक नहीं होती हैं । वैज्ञानिकों का यह मत है कि प्रत्येक पदार्थ आकाश की तरफ ऊपर को डालने पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे पृथ्वी की ओर आता है । पुट देने से पदार्थ की यह अधोगमन शक्ति कम हो जाने से उसकी भस्म आमा- शयादि अंगों में देर तक रहेगी जिससे उसका परिपाक ठीक होकर सूक्ष्मरूप से शरीर में अधिक-से-अधिक मात्रा में शोषित होकर रक्त में मिल सारे शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में होनेवाली विकृति को दूर करने में समर्थ होती है । अतः पुटप्रयोग विधान आयुर्वेदीय रसशास्त्र का एक अद्भुत विज्ञान है । सामान्यपुटक्रमः मूषागते तु लोहादौ पुटनीये विशेषतः । वह्निस्तु स्वानुकूल्येन तथा स्यात्तु पुटक्रमः ॥ ३६ ॥