रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयस्तरङ्गः ३५ अंगुल) लम्बा और उतना ही चौड़ा गोल हो। अब गढ़े के मध्यप्रदेश में चार अंगुल चौड़ा गोल एक और छिद्र बनायें जिसका मुख बाहर की तरफ तिरछा होना चाहिए। इस तिरछे मुखवाले निम्नगर्त के मुख पर निचले सिरे से ऊपर पृथ्वी तक तिरछी नली लगाकर इन नली का मुख धौंकनी के मुख के साथ अच्छी तरह जोड़ दें। अब कोष्ठ में कोयलों के ऊपर द्रव्ययुक्त मूषा रख के धौंकनी से धौंकें। इसे पातालकोष्ठी कहते हैं। इसके द्वारा मृदुद्रव्यों का सत्त्वपातन आदि कार्य किया जाता है॥ २६-३१॥ वक्तव्य-रसरत्नसमुच्चय में इस कोष्ठी के विषय में इतनी विशेषता लिखी हुई है कि "बीच के छिद्र के ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला मिट्टी का प्याला या फलक रख दिया जाता है।" अथ पुटलक्षणम् रसोपरसलोहादेः पाकमानप्रसापकम्। उत्पलाद्यग्निसंयोगात् यत्तदत्र पुटं स्मृतम्॥३२॥ अथ क्रमप्राप्तं पुटलक्षणमाह-रसः पारदः, उपरसोऽभ्रादयः, लोहाः सुवर्णादयः, तेषां पाको वह्निसंयोगेन गुणान्तरपरिणामः, तस्य मानज्ञापकम्, उत्पलादित्यत्रादिना तुषादिग्रहः॥ ३२॥ आ.टी.-रस उपरस धातु उपधातुओं में से किसको कितनी बार कितनी अग्नि से पकाया गया है इस बात को सूचित करने के लिए जो औषधि को सम्पुट में बन्दकर न्यून या अधिक उपले-तुष आदि की अग्नि दी जाती है उसे "पुट" कहा जाता है॥ ३२॥ वक्तव्य-प्रत्येक उपरस धातु आदि अपनी-अपनी अग्निताप-सहन शक्ति रखता है। उसके अनुसार उसे उतनी ही अग्नि देने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के पुटों की आवश्यकता होती है जिससे कि वह न अधिक नन्यून रूप से पकने पाये। इसी अभिनय को लेकर रसरत्नसमुच्चय में भी लिखा है-"रसादि- द्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम्। नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः, सुपाकं हितमौषधम्॥" पुटप्रयोजनम् अवेद्यतः पुटादेव दोषहानिर्गुणोदयः। रसोपरसलोहानां पुटपाकस्ततः स्मृतः॥ ३३॥ पुटपाकेन लोहादेर्निरुत्थत्वञ्च दीपनम्। अभेद्यारितरत्वञ्च पुटपाकस्ततः स्मृतः॥ ३४॥