भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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तृतीयस्तरङ्गः २६ सामान्यमूषा शिखित्रकैर्दग्धतुषैः शणेन सलद्दिका दण्डसुकुट्टिता च। या मृत्तिका तद्विहिता तु मूषा सामान्यमूषा कथिता रसज्ञैः ॥७॥ शिखित्रकैर्जलनिर्वापितैरङ्गारैः। लद्दिका घोटकपुरीषम्। दण्डेन मुसला- दिना सामान्यमूषेत्यनुक्तविशेषमूषास्थाने ग्राह्या ॥ ७ ॥ भा.टी.-बुझे हुए कोयले, तुष की राख, सूक्ष्म शण के रेशे और घोड़े की लीद; इन सबको एकत्र मिलाकर मूसली या हथौड़ी से अच्छी तरह कूटकर बनाई हुई मिट्टी के द्वारा निर्माण की हुई मूषा को सामान्य मूषा कहते हैं ॥७॥ वक्तव्य—जहाँ पर किसी मूषा का नाम न दिया हो वहाँ उक्त प्रकार से बनी हुई सामान्य मूषा को काम में लाना चाहिए। वज्रमूषा त्रयो भागा मृदो द्वौ तु शणलद्दिकयोस्तथा। भागो दग्धतुषादेश्च किट्टस्य त्वर्ध एव च ॥८॥ एभिः कृता तु या मूषा वज्रमूषा तु सा मता। प्रयुज्यते विशेषेण सत्त्वपातनकर्मणि ॥ ६ ॥ वज्रमूषा कठिनतायां वज्रतुल्या, यथाभागं मृत्तिकाशणादिक्षेपश्च सुश्ल- क्षणताहेतुः व्यपगतस्फुटनभयो निर्माणसुखश्चेति ॥ ८, ६ ॥ भा.टी.—तीन भाग मिट्टी, एक भाग शण, एक भाग घोड़े की लीद, एक भाग तुष आदि की राख, आधा भाग लोह कीट (मण्डूर); इन सब को एकत्र मिलाकर खूब कूटकर बनाई मूषा को वज्रमूषा कहते हैं। यह मूषा अभ्रक हीरा आदि कठिन द्रव्यों के सत्त्व पातन करने के निमित्त विशेष रूप से व्यवहार में ली जाती है ॥ ८, ६ ॥ वक्तव्य—इस प्रकार से बनी हुई मूषा वज्र के समान दृढ़ होने से वज्र मूषा शब्द से कही जाती है। इसके बनाने में कोई दो भाग शण तथा दो भाग घोड़े की लीद लेते हैं। योगमूषा तुषाद्यैश्च बिडाद्यैश्च कृता चापि विलेपिता। सूतसिद्धिकरी चैषा योगमूषा निगद्यते ॥ १० ॥ सूतसिद्धकरी पारदसाधनकरिका ॥ १० ॥ भा.टी.-तुषभस्म, कोयले, बाँबी की मिट्टी तथा क्षार, अम्ल गन्धक,