रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—मूषा को कुमुदी, कुमुदिका, क्रोञ्चिका, वह्निमित्रा तथा पाचनी नाम से कहा जाता है अर्थात् मूषा के यह पर्यायवाचक नाम हैं। क्योंकि मूषा उसमें रखकर तपाये या पकाये हुए द्रव्य के दोषों को हर लेती है अतः उसे मूषा कहते हैं। रात्रि में खिलनेवाले कमल पुष्प के समान आकार होने से मूषा को कुमुदी कहते हैं। क्योंकि मूषा को अग्नि मित्र होती है अर्थात् अग्नि में मूषा नहीं जलती है अतः उसे वह्निमित्र कहते हैं। इसमें द्रव्य रखकर पकाया जाता है अतः इसे पाचनी भी कहते हैं ॥ १-३ ॥ वक्तव्य—व्यवहार में मूषा को घरिया कहते हैं यह प्रायः सोनारों के पास सोना चाँदी को गलाने के काम आती है। पिधानम् द्रव्यपूरितमूषादेः द्रव्यपातन्निवृत्तये । आच्छादकं भवेद् यत्तु पिधानं तदिहोच्यते ॥ ४ ॥ द्रव्यपूरितमूषादेरित्यपादाने पञ्चमी। द्रव्यस्य पातः बहिरुच्छलनं, तन्निवर्तकं पिधानकम् ॥ ४ ॥ भा.टी.—मूषा, पुट या हाँडी आदि में द्रव्य भरकर उस द्रव्य को बाहर गिरने से बचाने के लिये अथवा उठाने-रखने में सुविधा के लिए मूषा आदि के मुख पर जो ढक्कन दिया जाता है उसे "पिधा" कहते हैं ॥ ४ ॥ सन्धिलेपनम् मूषादीनां तु यत्सन्धौ किट्टाद्यैः स्याद्विलेपनम् । तत्सन्धिलेपनं ख्यातं तच्चोक्तं सन्धिबन्धनम् ॥ ५ ॥ सन्धिलेपनं व्याख्यासमम् ॥ ५ ॥ भा.टी—मूषा आदि यंत्र और उसके ढक्कन के जोड़ पर छिद्र को बन्द करने के लिये जो लोह कीट्ट, मिट्टी आदि से लेप किया जाता है उसे सन्धि- लेपन या सन्धिबन्धन कहा जाता है ॥ ५ ॥ मूषानिर्माणोचिता मृत्तिका. सशर्करा पाण्डुरा च वह्नितापसहा चिरम् । स्थूला च मृत्तिका या स्यान् मूषार्थं सा मतोत्तमा ॥६॥ सशर्करा स्फुटनभयराहित्यात्, वह्नितापसहा वह्नौ स्फुटनावर्जिता ॥ ६ ॥ भा. टी.—मूषा बनाने के लिये कुछ रेतीली पाण्डुर वर्ण मोटे कणों की देर तक अग्नि सहन करनेवाली मिट्टी अच्छी समझनी चाहिए ॥ ६ ॥