रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयस्तरङ्गः ३१ वक्तव्य—रसरत्नसमुच्चय में इसका लक्षण निम्न प्रकार से बहुत स्पष्ट मिलता है। और "दग्ध” स्थान पर "दुग्ध” पाठ मिलता है "दुग्धषड्गुणगा- राष्ट्रकिट्टाङ्गारशणान्विता । कृष्णमृद्भिः कृता मूषा गरमूषेत्युदाहृता ॥” गोस्तनीमूषा सापिधाना शिखोपेता गोस्तनाकारसन्निभा । सत्त्वद्रावणशुद्ध्यर्था सा मूषा गोस्तनोमता* ॥१५॥ शिखोपेता शिखायुक्ता, ग्रहणसौकर्यार्थ ॥ १५ ॥ भा. टी.—गोस्तन के आकार की एक मूषा बनाकर उसके मुख पर रखने के लिए एक ऐसा पिधान ( ढकन ) बनायें जो नीचे को चौड़ा और ऊपर की तरफ पतला शिखाकार हो । इसे गोस्तनी मूषा कहते हैं। यह मूषा अभ्रक आदि सत्त्वों के द्रावण तथा शुद्धि के काम आती है ॥ १५ ॥ मल्लमूषा सम्पुटाकारतां नीता मल्लद्वितययोजनात् । मल्लमूषा समाख्याता पर्पट्यादिप्रसाधिका ॥ १६ ॥ मल्लद्वितयं = चषकयुगम् । पर्पट्यादिप्रसाधिकेति न स्वर्णपर्पट्यादिसाधन- मत्राभिप्रेतम्, अपि तु विशिष्टो रसः कश्चित् । यथा रसरत्नसमुच्चये त्रैलोक्य- सुन्दरः— “विमर्दिताभ्यां रसगन्धकाभ्यां नीरेण कुर्यादिह गोलकन्तु। भाण्डे नवीने विनिवेश्य पश्चात्तद्गोलकस्योपरि ताम्रपात्रम् ॥ सार्धंमुहूर्त्तं विनिरुध्य धीमानुद्दी- पयेद्दीप्तकृशानुनास्य । अधस्ततः सिद्ध्यति पर्पटीयं नवज्वरारण्यकृशानुमेषः ॥” इति॥ १६ ॥ भा. टी.—दो गोल प्यालों को आपस में जोड़ कर संपुट के रूप में बना लेने को मल्लमूषा कहा जाता है । इसके द्वारा पर्पटीरस आदि रसों को बनाया जाता है ॥ १६ ॥ महामूषा वर्तुला चिपिटा मूले स्थूला चायामविस्तरा । विस्तृतास्या च या मूषा महामूषा तु सा मता ॥१७॥ लोहाभ्रताप्यसत्त्वादेः पुटनार्थं भिषग्वरैः । प्रयुज्यते महामूषा स्थूलमूषा च सा स्मृता ॥१८॥
- इयमेव मूषा रसार्णवे अन्धमूषाख्यया प्रतिपादिता । तथा हि— “अन्धमूषा तु कर्तव्या गोस्तनाकारसन्निभा । पिधानकसमायुक्ता किञ्चिदुन्नत मस्तका” ॥ १ ॥